26/11 का गुन्हेगार “अजमल कसाब” | Ajmal Kasab History in Hindi

मोहम्मद अजमल आमिर कसाब – Ajmal Kasab एक पाकिस्तानी आतंकवादी और इस्लामिक समूह लश्कर-ए-तैबा का सदस्य था। साथ ही 2008 में भारत के महाराष्ट्र राज्य के मुंबई में हुए आतंकी हमले में वह भी शामिल था। उस हमले में कसाब एकमात्र जिंदा आतंकी था जिसे पुलिस पकड़ पाई।

26/11 का गुन्हेगार अजमल कसाब – Ajmal Kasab History in Hindi

Ajmal Kasab

अजमल कसाब प्रारंभिक जीवन  – Ajmal Kasab Early life

कसाब का जन्म पाकिस्तान में पंजाब के ओकरा जिले के फरीदकोट गाँव में हुआ। उनके पिता का नाम अमीर शाहबान कसाब और माँ का नाम नूर इलाही था। उनके पिता नाश्ते की गाड़ी चलाते थे और उनका बड़ा भाई अफज़ल लाहोर में मजदूरी का काम करता था। उनकी बड़ी बहन रुकैया हुसैन की शादी हो चुकी है और वह उसी गाँव में रहती थी। उनकी छोटी बहन सुरैया और भाई मुनीर अपने माता-पिता के साथ फरीदकोट में रहते है। उनका परिवार कसाब समुदाय से संबंध रखता है।

शुरू-शुरू में कसाब भी अपने भाई के साथ लाहौर में काम करने लगा लेकिन बाद में वह फरीदकोट वापिस आ गया। 2005 में अपने पिताजी से लड़ने के बाद उसने घर छोड़ दिया। कहा जाता है की ईद के दिन उसने अपने पिताजी से नए कपडे दिलाने के लिए कहा था लेकिन उसके पिताजी से पैसो की कमी से कपडे लेने से इंकार कर दिया और इससे कसाब को काफी गुस्सा आया था। इसके बाद कसाब अपने दोस्त मुज़फ्फर लाल खान के साथ मिलकर छोटे-मोटे अपराध करने लगा और फिर हथियारों की चोरी भी करने लगा। कुछ समय बाद लश्कर-ए-तैबा का सदस्य बनने के बाद 21 दिसम्बर 2007 को वे रावलपिंडी में हथियार खरीदते हुए पाए गये और उन्होंने वहाँ लश्कर-ए-तैबा के पोस्टर भी बाटे।

मुंबई पुलिस के डिप्टी कमिश्नर और प्रश्नकर्ता ने बातचीत के बाद बताया था की कसाब काफी असभ्य हिंदी बोलता है और अंग्रेजी का उसे एक शब्द भी नही पता। कसाब के अनुसार उनके पिता की वजह से ही वह लश्कर-ए-तैबा में शामिल हुआ, ताकि पैसे कमाकर वह अपने परिवार की जरूरतों को पूरा कर सके। लेकिन उसके पिता ने भी गैरकानूनी तरीको से कमाए गये पैसे लेने से इंकार कर दिया था। कहा जाता है की लश्कर-ए-तैबा के वरिष्ट कमांडर जाकी-उर-रहमान कसाब के आक्रमण में शामिल होने की वजह से उनके परिवार को 1,50,000 रुपये दिया करते थे। एक और जानकारी के अनुसार कहा जाता है की कसाब द्वारा की जा रही आतंकी गतिविधियों के बदले में लश्कर-ए-तैबा के लोग उसके परिवार को 1,00,00 रुपये दिया करते थे, जबकि दुसरे सूत्रों के अनुसार उसे 4000 US$ मिलते थे।

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कथित तौर पर कसाब 24 लोगो के उस समूह में शामिल था जिन्हें पाकिस्तान के आजाद कश्मीर के मुज़फ्फराबाद के पर्वतो में रिमोट कैंप में ट्रेनिंग दी गयी थी। ट्रेनिंग का कुछ भाग मंगला डैम जलाशय में भी पूरा किया गया।

26/11 के मुंबई आतंकी हमले में शामिल होना – 26/11 Mumbai Attack

2008 में जब कसाब ने अपने साथी इस्माइल खान के साथ मिलकर छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर आक्रमण किया तब वह CCTV में दिखाई दे रहा था। कसाब ने उस समय गुस्से में आकर पुलिस से यह भी कहा था की वह इस्लामाबाद में हुए मेरियट होटल के आक्रमण को दोहराना चाहता है और ताज होटल को ख़त्म करना चाहता है।

कसाब ने 25 साल के अपने साथी खान के साथ मिलकर छत्रपति शिवाजी टर्मिनस रेल्वे स्टेशन पर हमला किया। इसके बाद उन्होंने कामा हॉस्पिटल में पुलिस की गाड़ी पर भी प्राणघातक हमला किया, जिसमे मुंबई पुलिस के वरिष्ट अधिकारी (महाराष्ट्र ATS चीफ हेमंत करकरे, एनकाउंटर स्पेशलिस्ट विजय सलास्कर और मुंबई पुलिस के कमिश्नर अशोक कामटे) यात्रा कर रहे थे।

बन्दुक की इस लढाई में कसाब ने सभी को बुरी तरह से मार गिराया। इसके बाद कसाब ने मेट्रो सिनेमा में प्रवेश किया और वहाँ भी लोगो पर प्राणघातक हमले किये। कसाब ने उस समय बुलेट प्रूफ जैकेट पहना हुआ था। इसके बाद वे विधान भवन गये जहाँ उन्होंने कई गोलियाँ चलायी। इसके बाद उनकी गाड़ी का टायर पंक्चर होने की वजह से उन्होंने सिल्वर स्कुड़ा लॉरा चुरायी और गिरगाव चौपाटी की तरफ चल दिए।

इसके बाद तक़रीबन 10.00 बजे डी.बी. मार्ग पुलिस को पुलिस कण्ट्रोल रूम से यह सन्देश मिला की, दो हथियारों से युक्त आतंकियों ने छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर हमला कर दिया है। इसके बाद डी.बी. मार्ग के 15 पुलिसकर्मीयो को चौपाटी पर भेजा गया, ताकि मरीन ड्राइव पर वे डबल बैरिकेड लगा सके। इसके बाद पुलिस ने दोनों पर गोलियों की बरसात की और इस शूटआउट में खान मारा गया लेकिन इसका कसाब पर कोई असर नही पड़ा वह लगातर लोगो को मारते ही चला जा रहा था। इसके बाद असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर तुकाराम ओमब्ले ने कसाब की गाड़ी पर लाठीचार्ज और गोलिमारी भी की। जिसके चलते मुंबई पुलिस कसाब को रंगेहाथो पकड़ने में सफल रही।

शुरू में गोली लगने के बाद ऐसा माना गया की कसाब मर चूका है लेकिन जब एक पुलिस अधिकारी ने पाया की वह साँस ले रहा है तो उसे तुरंत नायर हॉस्पिटल ले जाया गया। दुसरे आतंकवादियों की लाश देखकर कसाब वहाँ डर गया था और डॉक्टर से कहने लगा, “मै मरना नही चाहता।” डॉक्टर ने भी उसका इलाज यह कहकर की किया की उसके शरीर पर गोली का कोई निशान या घाव नही है।

ठीक होने के बाद कसाब ने पुलिस को बताया की उसे यह कहकर ट्रेनिंग दी गयी थी की उसे “अंतिम साँस तक मारते ही रहना है”, लेकिन बाद में हॉस्पिटल में पुलिस के साथ हुई बातचीत में उसने बताया की, “अब वह और जिंदा नही रहना चाहता” और उसने पुलिस से प्रार्थना भी की के वह उसे मार दे ताकि पाकिस्तान में उसका परिवार सुरक्षित रह सके। सूत्रों के अनुसार कसाब को अपने किये पर कोई पछतावा नही था, उसने बताया की उसने जो कुछ भी किया बिल्कुल सही किया और इसके लिए उसे किसी प्रकार की कोई शर्मिंदगी नही है। साथ ही उसने यह भी बताया की आक्रमण करने के बाद उन्होंने वहा से भागने की भी योजना बना रखी थी।

कसाब ने प्रश्नकर्ताओ को यह भी बताया की इस पुरे आक्रमण के दौरान कराची के लश्कर-ए-तैबा के हेडक्वार्टर से उनका आतंकी समूह लगातार बने हुए था, वे वौइस्-ओवर-इंटरनेट के माध्यम से बाते किया करते थे।

CCTV में दिखाई गयी फुटेज के अनुसार छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर कसाब AK-47 के साथ, पीछे बैग लगाकर घूम रहा था। दिसम्बर 2008 के अंत तक, उज्जवल निकम की नियुक्ती पब्लिक प्रासीक्यूटर के रूप में कसाब को बचाने के लिए की गयी और जनवरी 2009 को एम.एल. टहलियानी की नियुक्ती इस केस के जज के रूप में की गयी।

इसके बाद भारतीय इन्वेस्टिगेटर ने कसाब के खिलाफ 25 फरवरी 2009 को 11,000 पन्नो की चार्जशीट दाखिल की। लेकिन चार्जशीट मराठी और इंग्लिश में लिखी हुई होने की वजह से कसाब उसे पढने के लिए उसका उर्दू रूपांतरण चाहता था। चार्जशीट में उसपर मर्डर, साजिश और भारत के खिलाफ युद्ध करने जैसे कई संगीन अपराध लगाए गये। असल में 15 अप्रैल 2009 को कसाब पर ट्रायल जारी किया गया लेकिन उसके वकील ने इसे पोस्टपोंड कर दिया।

17 अप्रैल 2009 को अब्बास काज़मी की नियुक्ती नई डिफेन्स काउंसिल में होने के बाद इसे पुनः शुरू किया गया और तभी प्रॉसिक्यूशन ने कसाब के खिलाफ बनाई गयी चार्ज लिस्ट भी जमा की, जिसमे उसपर 166 लोगो के मर्डर का आरोप लगाया गया। 6 मई 2009 को कसाब ने दलील की के उनपर लगाए गये चार्ज में से 86 अपराधो में वह दोषी नही है। इसी महीने में उनके खिलाफ एक चश्मदीद गवाह भी मिला, जिसने उन्हें लोगो पर फायरिंग करते हुए देखा था। इसके बाद जिन डॉक्टर्स ने उसका इलाज किया था, उन्होंने भी कसाब को पहचान लिया। और 2 जून 2009 को कसाब ने जज को बताया की उसे मराठी भाषा भी समझमे आती है।

जून 2009 में, स्पेशल कोर्ट ने 22 फरार आरोपियों के खिलाफ नॉन-बेलेबल वार्रेंट जारी किया, जिनमे जमात-उद्द-दवा के मुख्य हफीज सईद और लश्कर-ए-तैबा के मुख्य जाकी-उर-रहमान लकवी शामिल है। 20 जुलाई 2009 को कसाब ने अपने गैर दोषी होने की याचिका वापिस ले ली और उसने मान लिया की वह सभी अपराधो में दोषी है।

जबकि 18 दिसम्बर 2009 को वह अपने बयान से मुकर गया और दावा किया की उसपर अत्याचार करके गुनाह कबूल करवाया जा रहा है। बल्कि उसने कोर्ट में बयान दिया की वह आक्रमण के 20 दिन पहले ही मुंबई आया था और जब पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया, तब वह केवल जुहूँ बीच पर घूम रहा था। अंत में लम्बे समय से चले आ रहे केस का अंतिम ट्रायल 31 मार्च 2010 को हुआ और 3 मई को कसाब को मर्डर, साजिश और भारत पर आक्रमण करने के इल्जाम में दोषी करार दिया गया। 6 मई 2010 को उसे मौत की सजा दी गयी थी।

जस्टिस रंजना देसाई और जस्टिस रणजीत मोरे से बने बॉम्बे हाई कोर्ट बेंच ने मौत की सजा के खिलाफ जाकर कसाब की अपील सुन ली और 21 फरवरी 2011 को कोर्ट के ट्रायल में दिए गये फैसले को ही सही करार दिया। इसके बाद 30 जुलाई 2011 को कसाब सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया में गया और उसने उसपर लगाए अपराधो और सुनाई गयी सजा का विरोध किया।

अंततः 29 अगस्त 2012 को कसाब मुंबई हमले का दोषी करार दिया गया और सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया ने उसे मौत की सजा सुनाई।

कसाब की क्षमादान की याचिका राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 5 नवम्बर 2012 को अस्वीकार कर दी। 7 नवम्बर को ही गृहमंत्री सुशीलकुमार शिंदे ने अपील के अस्वीकार होने की घोषणा की थी। उसी दिन महाराष्ट्र राज्य सरकार ने कसाब पर कठोर करवाई करने की भी याचना की। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने क्रियान्वयन के लिए 21 नवम्बर की तारीख निश्चित की और यह जानकारी भारत सरकार ने पाकिस्तानी विदेशी कार्यालय में भी भेज दी।

यह सब कुछ गुप्त रूप से किया गया था, कसाब को 12 नवम्बर को ही उसके क्रियान्वयन की तारीख बताई गयी थी, जिसके बाद उसने सरकारी अधिकारियो से प्रार्थना भी की थी की वे इस जानकारी को उनकी माँ तक पंहुचा दे। 18-19 नवम्बर की रात वरिष्ट जेल अधिकारी ने आर्थर रोड जेल, मुंबई में कसाब का डेथ वार्रेंट उसीके सामने पढ़ा, जिसने उसे यह भी बताया की उसकी क्षमादान की याचिका को भी अस्वीकार किया गया है। इसके बाद कसाब को उसके डेथ वार्रेंट पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया, जो उसने आसानी से कर दिए। इसके बाद गुप्त रूप से उसे भरी सुरक्षाकर्मीयो के साथ पुणे जे येरवडा जेल में स्थानांतरित किया गया, 19 नवम्बर की सुबह कसाब पुणे के येरवडा जेल में आ चूका था।

इसके बाद राष्ट्रिय राजनेता बाला साहेब ठाकरे की मृत्यु के बाद लोगो का ध्यान भी कही और आकर्षित हो गया था। आर्थर रोड जेल के ऑफिसर ने मुंबई से पुणे की यात्रा के बाद बताया था की, “यात्रा के दौरान कसाब नें किसी तरह की कोई तकलीफ नही दी। कसाब को जब पता चला की भारत के राष्ट्रपति ने भी उनकी क्षमा याचिका को अस्वीकार कर दिया है, तो उसे यकीन हो गया था की अब उसके बचने के कोई आसार नही बचे है। कहा जाता है की अपने अंतिम कुछ दिनों में भी कसाब की आँखों से एक बूंद आँसू नही निकला।“

उस समय केवल येरवडा के जेल अधीक्षक को ही कसाब के वहाँ होने की खबर थी। कसाब को जब येरवडा लाया गया था तब उसे विशेष जेल में रखा गया और किसी को भी इस बात की जानकारी नही दी गयी थी। कसाब के क्रियान्वयन के कुछ मिनटों पहले ही जब पूछा गया की किसे फाँसी पर लटका रहे है, तभी जवाब में कसाब का नाम सुनने मिला था।

पुलिस अधिकारियो के अनुसार कसाब की मौत ही 26/11 के मुंबई हमले में शहीद हुए जवानों को दी गयी सच्ची श्रद्धांजलि थी।
– महाराष्ट्र गृहमंत्री आर.आर.पाटिल

कहा जाता है की क्रियान्वयन के कुछ समय पहले तक कसाब एकदम शांत था और प्रार्थना कर रहा था। गृहमंत्री शिंदे की घोषणा के अनुसार 21 नवम्बर 2012 को 7.30 AM मिनट पर उसे फाँसी पर लटकाया गया।

फाँसी देने के बाद अंत में कसाब को येरवडा जेल में दफनाया गया। फाँसी के बाद कसाब के शरीर को मुस्लिम रिवाजो से दाह-संस्कार करने के लिए मौलवी को सौपा गया।

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