बेगम हज़रत महल का इतिहास | Begum Hazrat Mahal In Hindi

Begum Hazrat Mahal

बेगम हज़रत महल का इतिहास / Begum Hazrat Mahal In Hindi

बेगम हज़रत महल ज्यादातर अवध की बेगम के नाम से भी जानी जाती है. वह नवाब वाजीद अली शाह की पहली पत्नी थी. उन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी पर आक्रमण किया था. अपने पति के कलकत्ता से निर्वासन के बाद, बेगम ने अवध राज्य के सारे कारोबार और अधिकारों को अपने हातो में लिया और साथ ही लखनऊ पर भी अपना अधिकार जमा लिया. बाद में उन्होंने उनके बाद अपने बेटे राजकुमार बिरजिस को अवध का वाली (शासक) बनाने की ठानी थी. लेकिन एक छोटे शासन काल के बाद ही उन्हें अपने राज्य को छोड़ना पड़ा. बाद में उन्हें नेपाल में शरण मिली और 1879 में उनकी मृत्यु हो गयी.

बेगम हजरत महल जीवनी

बेगम हजरत महल प्रथम जिसका नाम मुहम्मदी खानुम था, उनका जन्म भारत में अवध राज्य के फैजाबाद में हुआ था. पेशे से वह दरबार की रखैल मानी जाती थी और उन्हें शाही हरम खावासिन में भेजा गया, क्योकि उनके माता-पिता ने उसे एक शाही दलाल को बेचा और बाद में उनका नाम परी रखा गया और वह महक परी के नाम से प्रसिद्ध हुई. बाद में औध के राजा के अपनाने पर वह बेगम बनी, और उन्हें “हजरत महल” का शीर्षक दिया गया. और कुछ समय बाद ही उन्होंने एक बेटे बिरजिस कद्र को जन्म दिया.

1856 में ही ब्रिटिशो ने औध को हड़प लिया और वाजीद अली शाह को कलकत्ता छोड़कर जाना पड़ा. अपने पति के कलकत्ता छोड़कर जाने के बाद, तलाक लेने की बजाये बेगम ने अवध की सारी जिम्मेदारी अपने हातो में ली, जो आज भारत के उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा भाग माना जाता है. और अग्रजो से लढी पर जीता ना सकी.

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बेगम हजरत महल मृत्यु :

अंत में अंग्रेजों से हार के बाद बेगम हजरत महल नेपाल के आश्रयस्थल में रहने लगी । शुरवात में तो नेपाल के जंग बहादुर उन्हें वहा रहने से मना कर दिया पर बाद में उन्हें शरण दे दी. उसके बाद बेगम हजरत महल पूरा जीवन नेपाल में ही व्यतीत किया और वही 1879 में उनकी मृत्यु हो गयी और जामा मस्जिद के काठमांडू मैदान में उनके शव को दफनाया गया था.

बेगम हजरत महल स्मारक :

बेगम हजरत महल दरबार मार्ग के नजदीक घंटाघर के जामा मस्जिद के पास काठमांडू के मध्य भाग में स्थित है. बाद में इसे जामा मस्जिद सेंट्रल समिति की निगरानी में रखा गया था.

15 अगस्त 1962 को पुराने विक्टोरिया पार्क, हज़रतगंज, लखनऊ में आज़ादी की पहली लड़ाई में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिये उन्हें सम्मानित किया गया था. उनकी याद में उन्हें सम्मानित करते हुए बाद में पार्क का नाम बदलकर उन्ही के नाम पर रखा गया था. नाम बदलने के साथ-साथ यहाँ एक संगमरमर का स्मारक भी बनाया गया. बेगम हजरत महल पार्क में रामलीला, दशहरा और लखनऊ महोत्सव जैसे समारोहों का आयोजन भी किया जाता है.

10 मई 1984 को भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया. लखनऊ में 1857 की क्रांति का नेतृत्व बेगम हजरत महल ने किया था. अपने नाबालिक पुत्र बिरजिस कादर को गद्दी पर बिठाकर उन्होंने अंग्रेजी सेना का स्वयं मुकाबला किया. उनमे संगठन की अभुतपूर्व क्षमता थी और इसी कारण अवध के जमींदार, किसान और सैनिक उनके नेतृत्व में आगे बढ़ते रहे.

बेगम हज़रत महल ने जब तक संभव हो सके तब तक अपनी पूरी ताकत से अंग्रेजो का मुकाबला किया. अंततः उन्हें हथियार डाल कर नेपाल में शरण लेनी पड़ी. उनके इस सहस को देखते हुए 20 वी शताब्दी में अनेक महिलाये उनसे प्रेरित हुई और आगे बढ़ी.

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