मशहूर संगीतकार आर.डी.बर्मन की जीवनी | RD Burman Biography in Hindi

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RD Burman – राहुल देव बर्मन एक भारतीय फिल्म स्कोर संगीतकार थे, जिन्हें भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में मौलिक संगीत निर्देशक के नाम से भी जाना जाता था।

RD Burman
मशहूर संगीतकार आर.डी.बर्मन की जीवनी – RD Burman Biography in Hindi

1960 से 1990 तक बर्मन ने तक़रीबन 331 फिल्मो के लिए संगीत स्कोर की रचना की थी। हिंदी फिल्म उद्योग में वे संगीतकार के रूप में ज्यादा सक्रीय थे और अपनी कुछ रचनाओ को उन्होंने मौखिक रूप में भी बनाया है। बर्मन ने मुख्यतः आशा भोसले (उनकी पत्नी) और किशोर कुमार के साथ काम किया है और ऐसे बहुत से गानों को गाया है, जिनसे वे प्रसिद्ध हुए। लता मंगेशकर द्वारा गाये हुए बहुत से गीतों की रचना उन्होंने ही की है। वर्तमान पीढ़ी के संगीत निर्देशकों पर उनका काफी प्रभाव पड़ा है और आज भी उनके गीत भारत में प्रसिद्ध है।

बर्मन का जन्म बॉलीवुड संगीतकार सचिन देव बर्मन और उनकी गीतकार पत्नी मीरा देव बर्मन के बेटे के रूप में कलकत्ता में हुआ। शुरू में उनकी नानी ने उनका उपनाम तुब्लू रखा था, लेकिन फिर बाद में वे अपने उपनाम पंचम के नाम से ज्यादा प्रसिद्ध हुए। सूत्रों के अनुसार, उनका उपनाम पंचम इसलिए रखा गया था क्योकि बचपन में जब भी वे रोते थे तो संगीत के पाँचवे सुर (पा) की आवाज़ निकलती थी। उनकी मातृभाषा बंगाली थी, और बंगाली में पंचम का अर्थ पाँच से होता है। दुसरे सूत्रों के अनुसार उनका नाम पंचम इसलिए रखा गया था क्योकि वे पाँच अलग-अलग प्रकार में रोते थे। इसके पीछे की एक और कल्पना यह भी है की जब दिग्गज भारतीय अभिनेता अशोक कुमार ने नवजात राहुल को पा शब्द को बार-बार दोहराते हुए देखा तो उन्होंने उनका उपनाम पंचम रख दिया था।

बर्मन ने पश्चिम बंगाल में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। उनके पिता सचिन देव बर्मन मुंबई में आधारित फिल्म इंडस्ट्री, बॉलीवुड के प्रसिद्ध संगीत निर्देशक थे। जब आर.डी. बर्मन केवल 9 साल के ही थे तभी उन्होंने अपने पहले गीत की रचना की थी, जिसका नाम था ऐ मेरी टोपी पलट के आ, इस गीत का उपयोग उनके पिता ने फिल्म फंटूश (1956) में किया था। सर जो तेरा टकराये गीत के तराने की रचना भी आर.डी. बर्मन ने बचपन में ही की थी, उनके पिता ने इसका उपयोग गुरु दत्ता की फिल्म प्यासा (1957) में किया था।
मुंबई में बर्मन ने उस्ताद अली अकबर खान (सरोद) और समता प्रसाद (तबला) से प्रशिक्षण लिया था। वे सलिल चौधरी को अपना गुरु मानते थे। उन्होंने अपने पिता का असिस्टेंट बनकर और कभी-कभी ऑर्केस्ट्रा में हार्मोनिका बजाकर भी सेवा की है।

जिन फिल्मो में बर्मन में म्यूजिक असिस्टेंट की भूमिका अदा की थी, उन फिल्मो में मुख्य रूप से चलती का नाम गाडी (1958), कागज़ का फूल (1959), तेरे घर के सामने (1963), बंदिनी (1963), जिद्दी (1964), गाइड (1965) और तीन देवियाँ (1965) शामिल है। अपने पिता की हिट रचना ‘है अपना दिल तो आवारा’ के लिए बर्मन ने माउथ ऑर्गन भी बजाय था, जिसका उपयोग फिल्म सोलवा साल (1958) में किया गया।
1959 में गुरु दत्त के असिस्टेंट द्वारा निर्देशित फिल्म ‘राज’ में बर्मन ने संगीत निर्देशक के रूप काम किया था। जबकि, यह फिल्म कभी पूरी बन ही नही पायी। गुरु दत्त और वहीदा रहमान फिल्म के बोल शैलेन्द्र ने लिखे थे। इसके बंद होने से पहले बर्मन ने फिल्म के लिए दो गाने रिकॉर्ड किये थे। जिसका पहला गाना गीता दत्त और आशा भोसले ने मिलकर गाया था और दुसरे गाने को शमशाद बेगम ने मौखिक रूप से गाया था।

स्वतंत्र संगीत निर्देशक के रूप में बर्मन की पहली रिलीज़ हुई फिल्म छोटे नवाब (1961) थी। जब प्रसिद्ध बॉलीवुड कॉमेडियन महमूद ने छोटे नवाब प्रोड्यूस करने की ठानी, तब सबसे पहले उन्होंने बर्मन के पिता सचिन देव को संगीत देने के लिए प्रार्थना की। जबकि सचिन देव बर्मन ने इसे अस्वीकार किया और सलाह दी की वे उस समय अनुपलब्ध है। इस मीटिंग में, महमूद ने देखा की राहुल तबला बजा रहा था और तभी उन्होंने आर.डी. बर्मन को ही फिल्म छोटे नवाब का संगीत निर्देशक बनाया। बर्मन ने बाद में महमूद के साथ घने संबंध भी स्थापित किये और महमूद की फिल्म भूत बंगला (1965) में उन्होंने कैमिओ रोल भी निभाया था।

प्रारंभिक सफलता –

फिल्म संगीत निर्देशक के रूप में बर्मन की पहले सफल फिल्म तीसरी मंजिल (1966) रही। इसके लिए बर्मन ने गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी को उनके नाम की सिफारिश नासिर हुसैन के पास करने का श्रेय दिया था, जो फिल्म के प्रोड्यूसर और लेखक थे। विजय आनंद ने भी कहा है की नासिर हुसैन से पहले उन्होंने ही बर्मन के लिए संगीत सेशन की व्यवस्था की थी। तीसरी मंजिल में कुल छः गाने थे, इन सभी गानों को मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा है और मोहम्मद रफ़ी ने गाया है। इनमे से चार गानों को उन्होंने आशा भोसले के साथ गाया था, जिनसे बाद में बर्मन ने शादी कर ली थी। इसके बाद नासिर ने बर्मन और गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी को अपने आने वाली छः फिल्मो के लिए साईन कर लिया था, जिनमे मुख्य रूप से बहारो के सपने (1967), प्यार का मौसम (1969) और यादो की बारात (1973) जैसी फिल्मे शामिल है। बर्मन की पड़ोसन (1968) फिल्म के संगीत के लिए काफी तारीफ़ की गयी थी। इस दौरान वे अपने पिता के असिस्टेंट के पद पर भी कार्यरत थे, जिनके साथ इसके बाद उन्होंने ज्वेल थीफ (1967) और प्रेम पुजारी (1970) जैसी फिल्मे की है।

आराधना (1969) फिल्म के किशोर कुमार के सुपरहिट गीत ‘मेरे सपनो की रानी’ का श्रेय उनके पिता को दिया जाता है, ऐसी अफवाह फैली थी की यह बर्मन की रचना है। इसी फिल्म का एक और गीत ‘कोरा कागज़ था यह मन मेरा’ भी उन्ही की रचना थी। ऐसा माना जाता है की जब एस. डी. बर्मन की फिल्म के संगीत की रिकॉर्डिंग के समय तबियत ख़राब हुई थी, तब आर.डी. बर्मन ने ही इसे अपने हाँथो में लेकर पूरा किया। इस तरह उन्हें फिल्म का एसोसिएट कंपोजर बनाया गया था।

लोकप्रियता का जन्म –

1970 में बर्मन राजेश खन्ना की फिल्मो में किशोर कुमार के गीतों के साथ काफी प्रसिद्ध हुए। 1970 में शक्ति सामंता द्वारा निर्देशित फिल्म कटी पतंग (1970) एक म्यूजिकल सुपरहिट फिल्म साबित हुए, और यही उनके सफलता की शुरुवात भी थी। इस फिल्म का गीत ‘यह शाम मस्तानी’ और ‘यह जो मोहब्बत है’ को किशोर कुमार ने गाया था, जो काफी कम समय में ही लोकप्रिय बन चुके थे। किशोर कुमार के अलावा, बर्मन ने मोहम्मद रफ़ी, आशा भोसले और लता मंगेशकर द्वारा गाये हुए बहुत से गीतों की भी रचना की है।

1970 में बर्मन ने देव आनंद की फिल्म हरे कृष्णा (1971) के लिए संगीत की रचना की। इस फिल्म का एक गीत ‘दम मारो दम’ आशा भोसले ने गाया, जो उस समय हिंदी फिल्म म्यूजिक में सुप्रसिद्ध साबित हुआ। लेकिन फिल्मकार देव आनंद ने दम मारो दम के पुरे गाने को फिल्म में नही लिया, क्योकि उन्हें दर था के कही यह गाने फिल्म में अतोशयोक्ति के समान ना लगे। उसी साल बर्मन ने अमर प्रेम के लिए संगीत की रचना की। इनमे से लता मंगेशकर का गाना ‘रैना बीती जाए’ को हिंदी फिल्म म्यूजिक में शास्त्रीय संगीत मणि की उपमा दी गयी। 1971 में बर्मन की सुपरहिट रचनाओ में बुड्ढा मिल गया का ‘रात कलि एक ख्वाब मे’ और कारवाँ फिल्म का ‘पिया तु अब तो आजा’ शामिल है। फिल्म कारवाँ में संगीत की रचना के लिए उनका पहली बार फिल्मफेयर अवार्ड के लिए नामनिर्देशन किया गया था।

1972 में बर्मन ने बहुत सी हिट फिल्मो के लिए संगीत की रचना की, जिनमे मुख्य रूप से सीता और गीता, रामपुर का लक्ष्मण, मेरे जीवन साथी, बॉम्बे तो गोवा, अपना देश और परिचय शामिल है। इसके बाद यादो की बारात (1973), आप की कसम (1974), शोले (1975) और आँधी (1975) में भी उनकी सफलता का दौर जारी था। इसके बाद उन्होंने छोटी डाक्यूमेंट्री फिल्म माँ की पुकार के लिए 1975 में संगीत की रचना की। इसके बाद उनके पिता एस. डी. बर्मन कोमा में चले गये और बर्मन ने फिल्म मिली (1975) में उनके अधूरे संगीत को पूरा किया।

फिल्म हम किसीसे कम नही (1977) में बर्मन द्वारा रचित ‘क्या हुआ तेरा वादा’ गीत के लिए मोहम्मद रफ़ी को बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर का राष्ट्रिय फिल्म अवार्ड मिला था। इसके बाद उन्होंने बहुत सी फिल्मो के लिए लोकप्रिय संगीत की रचना की, उन फिल्मो में मुख्य रूप से कसमे वादे (1978), घर (1978), गोलमाल (1979) और ख़ूबसूरत (1980) शामिल है। 1981 में उन्होंने फिल्म रॉकी, सत्ते पे सत्ता और लव स्टोरी के लिए लोकप्रिय संगीत की रचना की थी।

प्लेबैक सिंगर कुमार सानु को उनका पहला ब्रेक बर्मन ने ही फिल्म यह देश (1984) में कमल हसन की आवाज़ देकर दिया था। अभिजीत को भी उनका मुख्य ब्रेक बर्मन ने ही आनंद और आनंद (1984) में दिया था। जबकि काफी समय पहले ही उन्होंने अपना डेब्यू कर लिया था, लेकिन फिर भी हरिहरण ने उन्हें पहली बात कविता कृष्णामूर्ति के साथ में गाये फिल्म बॉक्सर (1984) के गीत ‘है मुबारक आज का दिन’ में जाना था, जिसे बर्मन ने ही कंपोज़ किया था। 1985 में मोहम्मद अज़ीज़ ने बर्मन के तहत ही फिल्म शिवा का इंसाफ (1985) में डेब्यू किया था।

राजेश खन्ना, किशोर कुमार और आर.डी. बर्मन की तिकड़ी ने तक़रीबन 32 फिल्मो में एकसाथ काम किया है और यह सभी फिल्मे और उनके गीत लोकप्रिय हुए थे। यह तीनो आपस में अच्छे दोस्त भी थे, आर.डी. बर्मन ने राजेश खन्ना की 40 फिल्मो के लिए संगीत की रचना की है।

शादी –

बर्मन की पहली पत्नी रीता पटेल थी, जिनसे वे दार्जिलिंग में मिले थे। रीता उनकी फैन ने अपने दोस्तों से बर्मन से मिलने की शर्त लगायी थी। उन्होंने 1966 को शादी की और 1971 में उनका तलाक हो गया था। परिचय (1972) फिल्म का गाना मुसाफिर हूँ यारों की रचना बर्मन ने तब की थी जब अलग होने के बाद वे होटल में रह रहे थे।

इसके बाद बर्मन ने 1980 में आशा भोसले के साथ शादी कर ली। साथ में उन्होंने बहुत से सुपरहिट गीतों को रिकॉर्ड किया और बहुत से लाइव प्रदर्शन भी किये। जबकि अपने जीवन के आखिरी समय में वे दोनों साथ में नहीं रह पाए। इसके बाद बर्मन को अपने जीवन में आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। उनकी माँ मीरा की मृत्यु उनकी मृत्यु के 13 साल बाद 2007 में हुई थी, अपने बेटे की मृत्यु से कुछ समय पहले ही उनकी माँ अल्जेईमर से पीड़ित थी। उन की मृत्यु से कुछ समय पहले ही वह अपने पुराने घर पर रहने लगी थी।

अंतिम दिन –

1980 में उन्होंने बप्पी लहरी और दुसरे डिस्को संगीतकारो के साथ ज्यादा काम किया। इसके बाद बहुत से फिल्मकारों का उनपर से भरोसा उठ गया था, क्योकि बॉक्स ऑफिस पर एक के बाद एक उनकी रचनाये फ्लॉप साबित हो रही थी। नासिर हुसैन ने भी तीसरी मंजिल (1966) के बाद उन्हें अपनी अगली फिल्म क़यामत से क़यामत तक (1988) के लिए साईन नही किया था। हुसैन ने प्रेस में यह कहते हुए बर्मन की रक्षा की थी की, वे ज़माने को दीखता है (1982) और मंजिल मंजिल (1984) में कमजोर संगीत रखना चाहते थे। उन्होंने यह भी कहा था की इस संगीतकार को फिल्म ज़बरदस्त (1985) की रिकॉर्डिंग के समय में कमजोर चरण से गुजरना पड़ा था। लेकिन इस फिल्म के फ्लॉप होने के बाद, हुसैन ने निर्देशन करना छोड़ दिया और उनके उत्तराधिकारी मंसूर खाने ने दुसरे संगीतकारों को आमंत्रित किया। सुभाष घई ने भी बर्मन को फिल्म राम लखन (1989) में संगीत की रचना करने का वादा किया था। लेकिन फिर उन्होंने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को इसके संगीत रचना का काम दे दिया, जो पहले बर्मन के ऑर्केस्ट्रा में ही कार्यरत थे।

1986 में बर्मन ने इजाज़त के लिए संगीत सचना, उनकी यह रचना उनके द्वारा की गयी सर्वश्रेष्ट रचनाओ में से एक है। इजाजत में के चारो गानों को आशा भोसले ने गाया था, जिन्हें गुलजार ने लिखा था। गीत मेरा कुछ समान के लिए गैर अन्त्यानुप्रासवाले बोल बनाने के लिए आलोचकों ने उनकी काफी प्रशंसा की थी। इसके लिए आशा भोसले (बेस्ट फीमेल प्लेबैक) और गुलजार (बेस्ट लिरिक्स) को राष्ट्रिय अवार्ड से सम्मानित भी किया गया, जबकि बर्मन को कुछ नही मिला। 1988 में बर्मन को ह्रदय विकास आया था और एक साल बाद ही लन्दन के दी प्रिंसेस ग्रेसी हॉस्पिटल में उन्हें बाईपास सर्जरी करानी पड़ी थी। इस समय में, उन्होंने बहुत से तरानों (ट्यून) की रचना की, जिन्हें कभी रिलीज़ नही किया गया। 1989 में उन्होंने विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म परिंदा के लिए संगीत की रचना की थी। इसके बाद फिल्म गैंग के लिए उन्होंने एक गीत ‘छोड़ के ना जाना’ की रचना की, जिसे आशा भोसले ने गाया था। लेकिन उनकी अचानक हुई मृत्यु के चलते इस फिल्म को रिलीज़ होने में काफी समय लगा, इसके बाद निर्देशन ने फिल्म के संगीत के लिए अनु मलिक को साईन किया। उनके द्वारा साईन की गयी अंतिम फिल्म प्रियदर्शन की मलयालम फिल्म ठेन्मविन कोम्बाथ थी, लेकिन फिल्म के लिए संगीत की रचना करने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गयी। 1942: ए लव स्टोरी (1994) के संगीत को उनकी मृत्यु के बाद रिलीज़ किया गया और वह काफी हद तक सफल भी रहा। जिसके लिए उन्होंने अपना तीसरा और अंतिम फिल्मफेयर अवार्ड भी जीता। लता मंगेशकर के अनुसार उनकी मृत्यु युवावस्था में नाखुश रहते हुए हुयी थी।

अवार्ड और सम्मान –

बॉलीवुड सिनेमा में संगीत के भविष्य की रचना के लिये बर्मन बहुत सी संगीत संस्थाओ से भी जुड़े हुए थे। उन्हें तीन फिल्मफेयर अवार्ड से नवाजा जा चूका है, जिनमे से एक उन्हें उनकी मृत्यु के बाद दिया गया था।

फिल्मफेयर अवार्ड –

जीत –

• 1983 – बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर – सनम तेरी कसम
• 1984 – बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर – मासूम
• 1995 – बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर – 1942 : ए लव स्टोरी

नामनिर्देशन –

• 1972 – बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर – कारवाँ
• 1974 – बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर – यादों की बारात
• 1975 – बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर – आप की कसम
• 1976 – बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर – खेल खेल में
• 1976 – बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर – शोले
• 1976 – बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर – ‘महबूबा महबूबा’ फिल्म शोले
• 1977 – बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर – महबूबा
• 1978 – बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर – हम किसीसे कम नही
• 1978 – बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर – किनारा
• 1979 – बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर – शालीमार
• 1981 – बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर – शान
• 1982 – बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर – लव स्टोरी
• 1984 – बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर – बेताब
• 1985 – बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर – जवानी
• 1986 – बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर – सागर

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