राष्ट्रपति भवन का इतिहास | Rashtrapati Bhavan History In Hindi

Rashtrapati Bhavan – राष्ट्रपति भवन भारत सरकार के राष्ट्रपति का सरकारी आवास है। सन 1950 तक इसे वाइसरॉय हाउस कहा जाता था। तब यह तत्कालीन भारत के गवर्नर जनरल का आवास हुआ करता था। यह नई दिल्ली के हृदय क्षेत्र में स्थित है। इस महल में 340 कक्ष हैं और यह विश्व में किसी भी राष्ट्राध्यक्ष के आवास से बड़ा है। वर्तमान भारत के राष्ट्रपति, उन कक्षों में नहीं रहते, जहां वाइसरॉय रहते थे, बल्कि वे अतिथि-कक्ष में रहते हैं। भारत के प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल श्री सी राजगोपालाचार्य को यहां का मुख्य शयन कक्ष, अपनी विनीत नम्र रुचियों के कारण, अति आडंबर पूर्ण लगा जिसके कारण उन्होंने अतिथि कक्ष में रहना उचित समझा। उनके उपरांत सभी राष्ट्रपतियों ने यही परंपरा निभाई। यहां के मुगल उद्यान की गुलाब वाटिका में अनेक प्रकार के गुलाब लगे हैं और यहाँ कि जन साधारण के लिए, प्रति वर्ष फरवरी माह के दौरान खुलती है। इस भवन की खास बात यह है कि इस भवन के निर्माण में लोहे का नगण्य प्रयोग हुआ है।

Rashtrapati Bhavan
Rashtrapati Bhavan

राष्ट्रपति भवन का इतिहास – Rashtrapati Bhavan History In Hindi

दिल्ली दरबार के वर्ष 1911 में भारत की राजधानी को तत्कालीन कलकत्ता से स्थानांतरित कर दिल्ली लाने का निर्णय लिया गया। यह निर्णय 12 दिसंबर को जॉर्ज पंचम द्वारा घोषित किया गया। इस योजना के तहत गवर्नर जनरल के आवास को प्रधान और अती विशेष दर्जा दिया गया। ब्रिटिश वास्तुकार सर एड्विन लैंडसियर लूट्यन्स को, जो कि नगर योजना के प्रमुख सदस्य थे, इस इमारत स्थल की अभिकल्पना का कार्यभार सौंपा गया। इसके मूल योजना के अनुसार, कुछ ऐसा बनाना था, जो कि पूर्वीय और पाश्चात्य शैली का मिश्रण हो। कुछ लोगों की राय में यह महल परंपरागत शैली का होना चाहिये था, जो कि प्राचीन यूनानी शैली में होता। लेकिन यह भारत में स्पष्टतः पाश्चात्य शक्ति प्रदर्शन होता, जो कि अमान्य था। वहीं दूसरी ओर कई लोगों का मत था, कि यह पूर्णातया भारतीय शैली का हो। इन दोनों के मिश्रण के कई अनुपात भी प्रस्तावित थे। तब वाइसरॉय ने कहा, कि महल परंपरागत होगा। यही वह अभिकल्पना थी, जो कि मूर्त रूप में आज खड़ी है। यह महल लगभग उसी रूप में बना, जो कि लूट्यन्स ने बेकर को शिमला से 14 जून 1912 को भेजा था। लूट्यन्स की अभिकल्पना वृहत रूप से परंपरागत थी, जो कि भारतीय वास्तुकला से वर्णमेल, ब्यौरे, इत्यादि में अत्यधिक प्रेरित थी, साथ ही वाइसरॉय के आदेश के अनुसार भी थी। लूट्यन्स और बेकर, जिन्हें वाइसरॉय हाउस और सचिवालयों का कार्य सौंपा गया, उन्होंने आरम्भ में काफी सौहार्द से कार्य किया, लेकिन बाद में झगड़े भी। बेकर को इस भवन के आगे बने दो सचिवालयों की योजना का कार्य दिया गया था। आरम्भिक योजनानुसार वाइसरॉय हाउस को रायसिना की पहाड़ी के ऊपर बना कर दोनों सचिवालय नीचे बनाने थे। बाद में सचिवालयों को 400 गज पीछे खिसकाकर पहाड़ी पर ही बनाना तय हुआ। लूट्यन्स की योजनानुसार यह भवन अकेला ऊंचाई पर स्थित होता, जिसे कि सचिवालयों के कारण अपने मूलयोजना से पीछे सरकना पड़ा, साथ ही आगे दोनों सचिवालय खड़े हो गये, जिससे कि वह दृष्टि में कूछ दब गया। यही उनके विवाद का कारण था। इस महल के पूर्ण होने पर लूट्यन्स ने बेकर से अच्छी लड़ाई की, क्योंकि यकीनन वाइसरॉय हाउस का दृश्य, सड़क के उच्च कोण के कारण बाधित हो गया था।

लूट्यन्स ने इस विवाद को बेकरलू (वाटरलू के युद्ध के सन्दर्भ में) के स्तर का माना। लेकिन भरपूर प्रयास के बावजूद इसे बदलवा नहीं पाया। वह चाहता था, कि भवन से नीचे तक एक लम्बी ढ़ाल पर सड़क आये, जिससे कि भवन का दृश्य ना बाधित हो, एवं दूर से भी दृश्य हो। सन 1914 में बेकर और लूट्यन्स सहित बनी सड़क की ढ़ाल 25 में 1 हो, जो बाद में केवल 22 में 1 बनी। इससे अधिक खड़ी ढ़ाल भवन के दॄश्य को और बाधित करती। लूट्यन्स यह जानता था, कि यह ढ़ाल भी इसके दृश्य को पूर्णतया नहीं दिखा पायेगी। तब उसने इसे कम कराने का निवेदन किया। सन 1916 में इम्पीरियल दिल्ली समिति ने लूट्यन्स के इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया। लूट्यन्स ने तब भी यही समझा कि बेकर सरकार को खुश करके और पैसे बनाने में अधिक लगा था, ना कि अच्छी श्रेणी की वास्तु रूपांकन में ध्यान केद्रित करने में। लूट्यन्स ने भारत और इंगलैंड की बाइस वर्षों में लगभग प्रतिवर्ष यात्रा की, दोनों स्थानों की वाइसरॉय इमारत बनाने हेतु। उसे लॉर्ड हार्डिंग के बजट नियंत्रण के कारण इमारत के आकार को कई गुणा छोटा भी करना पड़ा। लॉर्ड हार्डिंग ने यद्यपि खर्चे नियंत्रित कर कीमत घटाने के निर्देश दिये थे। तथापि वह चाहते थे, कि कूछ निश्चित मात्रा में तो इमारत में वैभव दर्शन हों ही।

भारतीय रूपांकन:-

इमारत के ऊपर भारतीय स्थापत्यकला का एक अभिन्न अंग है छोटे गुम्बदनुमा ढांचे – छतरी. इमारत में विभिन्न भारतीय डिज़ाइन डाले और जोड़े गये। इनमें ढेरों गोलाकार परत/कुण्ड रूपी घेरे हैं, जो कि भवन के ऊपर लगे हैं और जिनमें पानी के फौव्वारे भी लगे हैं, वे भारतीय स्थापत्य के अभिन्न अंग हैं। यहां परंपरागत भारतीय छज्जे भी हैं, जो कि आठ फीट दीवार से बाहर को निकले हुए हैं और नीचे पुष्पाकृति से सम्पन्न हैं। ये भवन को सीधी धूप के खिड़कियों में पड़ने से और मानसून में वर्षा के जल और फुहार को जाने से रोकते हैं। छत के ऊपर बनीं कई छतरियां, भवन की छत के उस भाग को, जहां मुख्य गुम्बद नहीं बना है, वहां के सपाट दृश्य होने से रोकतीं हैं। लूट्यन्स ने कई भारतीय शैली के नमूनों को उपयुक्त स्थानों पर प्रयुक्त किया है, जो कि काफी प्रभावशाली हैं। इनमें से कुछ हैं, बाग में बने नाग स्तंभों पर बने सजे धजे हाथी और छोटे खम्भों पर लगे हुए बैठे हुए सिंह, ब्रिटिष शिल्पकार चार्ल्स सार्जियेन्ट जैगर, जो कि अपने बनाये कई युद्ध स्मारकों के लिये जाने जाते हैं। लाल बलुआ पत्थर से बनी जालियां भी भारतीय स्थापत्य से प्रेरित थीं।

भवन संग चार पैन्डेन्ट रूप में घंटी बनी है जो कि भारतीय हिन्दू धर्म के मंदिरों का एक अनिवार्य अंग हैं। प्रत्येक स्तंभ के प्रत्येक ऊपरी कोण पर एक घंटी बनी है। यह कथित था, कि क्योंकि ये घंटियां शांत हैं। इसलिये भारत में ब्रिटिश राज्य समाप्त नहीं होगा। प्रासाद के सामने की ओर कोई खिड़की नहीं है। लूट्यन्स ने भवन में कुछ व्यक्तिगत प्रभाव भी डाले हैं, जैसे कि उद्यान की दीवार में एक स्थान और स्टेट कक्ष में दो रोशनदान, जो कि चश्में जैसे प्रतीत होते हैं। यह भवन मुख्यतः 1929 में, बाकी नई दिल्ली के साथ ही, पूर्ण हो गया था और इसका आधिकारिक उद्घाटन सन 1931 में हुआ था। यह एक रोचक तथ्य है, कि यह भवन सत्रह वर्शःओं में पूर्ण हुआ और सत्रह वर्ष ही ब्रिटिश राज्य में रह पाया, अपने निर्माण पूर्ण होने के अठ्ठारहवें वर्ष में ही, यह स्वतंत्र भारत में आ गया। 1947 में, भारतीय स्वतंत्रता के बाद, तत्कालीन वाइसरॉय वहां रहते रहे और अंततः 1950 में भारतीय गणतंत्रता के बाद से यहां भारतीय गणतंत्र के राष्ट्रपति रहने लगे और इसका नाम बदल कर राष्ट्रपति भवन हो गया। इसका गुम्बद, लूट्यन्स के अनुसार रोमन पैन्थेयन से प्रेरित बताया गया था। वैसे यह मूलतः मौर्य काल में बने सांची स्तूप, सांची, मध्य प्रदेश से व्युत्पन्न है। यहां यूरोपियाई और मुगल स्थापत्यकला के घटक भी हैं। सम्पूर्णतः यह भवन अन्य ब्रिटिश इमारतों से एकदम भिन्न है। इसमें 355 सुसज्जित कक्ष हैं। इसका भूक्षेत्र फल 200000 वर्ग फीट (19000 वर्ग मीटर) है। इस भवन में 700 मिलियन ईंटें और 3.5 मिलियन घन फीट (85000 घन मीटर) पत्थर लगा है, जिसके साथ लोहे का न्यूनतम प्रयोग हुआ है।

स्थिति:-

राष्ट्रपति भवन – Rashtrapati Bhavan का मुख्य प्रवेश द्वार है द्वार संख्या 35, जो कि प्रकाश वीर शास्त्री एवेन्यु ( 22 नवंबर 2002 में नॉर्थ एवेन्यु से बदला हुआ नाम) पर स्थित है। इन्होंने अपने संसद सदस्य के कार्यकाल में यहां सेवा की थी, एवं उत्तर प्रदेश से थे।

विशेष:-

भारत का राष्ट्रपति भवन – Rashtrapati Bhavan, विश्व के किसी भी राष्ट्रपति आवास से कहीं बड़ा है। यहां की गुलाब वाटिका, जो कि मुगल उद्यान का एक अंश है, में अनेकों प्रकार के गुलाब लगे हैं, जो कि जन साधारण हेतु, प्रति वर्ष फरवरी माह के दौरान खुलती है। इस भवन के निर्माण में लोहे का नगण्य प्रयोग हुआ है। इस प्रासाद/महल में 340 कक्ष हैं।

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