Bhagini Nivedita Biography | भगिनी निवेदिता जीवन परिचय

भगिनी निवेदिता – Bhagini Nivedita Biography

Bhagini Nivedita – भगिनी निवेदिता का जन्म मार्गरेट एलिज़ाबेथ नोबेल के नाम से हुआ। वे एक स्कॉट-आयरिश सामाजिक कार्यकर्त्ता, लेखिका, शिक्षक और स्वामी विवेकानंद की भक्त थी। उन्होंने अपना सारा जीवन समाजसेवा में लगा दिया।

Bhagini Nivedita

Bhagini Nivedita Biography – भगिनी निवेदिता जीवन परिचय

पूरा नाम    – मार्गारेट एलिजाबेथ सॅम्युअल नोबल
जन्म        – 28 अक्तुबर 1867
जन्मस्थान – डंगनॉन टायरान (आयर्लंड)
पिता        – सॅम्युअल रिचमंड नोबल
माता        – मेरी इसाबेल नोबल
शिक्षा       – हॅलीफ़ॅक्स विश्वविद्यालय मे उनकी शिक्षा हुयी।
विवाह      – अविवाहीत

मार्गरेट एलिज़ाबेथ नोबेल का जन्म 28 अक्टूबर 1867 को आयरलैंड के दूंगानॉन गाव में हुआ था। उनकी माता का नाम मैरी इसाबेल और पिता का नाम सैमुअल रिचमंड नोबेल था। नोबेल का वंशज स्कॉटिश था लेकिन पिछले 5 दशको से वे आयरलैंड में ही रह रहे थे। उनके पिता एक महान पुजारी थे, जिन्होंने भगिनी निवेदिता को कई महत्वपूर्ण गुण सिखाये जैसे ”मानवता की पूजा करना ही भगवान् की पूजा करने के बराबर है”। जब भगिनी निवेदिता एक साल की थी तभी सैमुअल मैनचेस्टर, इंग्लैंड चले गये। उस समय किशोर निवेदिता अपनी नानी के साथ हैमिलटन, आयरलैंड में रहने लगी थी। जब वह 4 साल की थी तभी वह अपने पिता के साथ रहने लगी थी।

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मार्गरेट के पिता सैमुअल का देहांत 1877 को हुआ, उस समु भगिनी केवल 10 साल की थी, तभी मार्गरेट की सारी जिम्मेदारिय उनकी नानी ने उठाई। मार्गरेट ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लन्दन के चर्च बोर्डिंग स्कूल से प्राप्त की। बाद में वे और उनकी बहन हैलिफैक्स कॉलेज में पढने लगे। उस कॉलेज की प्रधानाध्यापिका ने उन्हें जीवन में उपयोगी कई महत्वपूर्ण बातो एवम बलिदान के बारे में सिखाया। निवेदिता कई विषयों का अभ्यास करती थी, जिनमे कला, म्यूजिक, फिजिक्स, साहित्य भी शामिल है। वे 17 साल की उम्र से ही बच्चो को पढ़ाने लगी। प्रथमतः उन्होंने केस्विक में बच्चो को पढ़ाने का काम किया। और बाद में उन्होंने खुद की इच्छा से एक विशाल स्कूल की स्थापना की जिसका मुख्य उद्देश गरीब लड़के-लडकियों को शिक्षित करना था और समाज का आंतरिक और शारीरिक रूप से विकास करना था। भगिनी निवेदिता एक प्रभावशाली लेखिका भी थी जो किसी समाचार पत्र के लिए लेख लिखती थी। और उनके इस तरह के महान कार्य से जल्द ही उनका नाम पुरे लन्दन में प्रसिद्द हो गया। वे अपने समुदाय को छोड़कर दुसरे समुदाय की धार्मिक किताबो को भी पढ़ती थी।

उनके पिता से, उनके महाविद्यालयीन प्रोफेसर से उन्होंने कई मूल्यवान शिक्षा प्राप्त की जैसे, “मानवता की सेवा करना ही भगवान की सेवा करने के बराबर है”। वे शुरू में एक स्कूल शिक्षक के रूप में काम करने लगी और बाद में उन्होंने एक खुद की स्कूल स्थापित की। बाद में उन्होंने वेल्श यूथ के साथ विवाह करने का दावा भी किया लेकिन सगाई के कुछ ही दिनों बाद वेल्श की मृत्यु हो गयी।

भगिनी निवेदिता 1895 में लन्दन में स्वामी विवेकानंद से मिली और 1898 में कलकत्ता, भारत की यात्रा भी की। जब भगिनी ने 25 मार्च 1898 में स्वामीजी के सामने ब्रह्मचर्या की प्रतिज्ञा ली तभी स्वामी विवेकानंद ने ही उन्हें निवेदिता का नाम दिया (जिसका अर्थ, “भगवान् को समर्पित” है)। नवम्बर 1898 में, उन्होंने कलकत्ता के बागबाजार में एक स्कूल की स्थापना की। वहा निवेदिता उन लडकिय को पढ़ना चाहती जिन्हें कई लोग प्राथमिक शिक्षा से भी दूर रखते थे।1899 में कलकत्ता में प्लेग के आपात में उन्होंने गरीब मरीजो की सेवा भी की।

उस समय स्थापित रामकृष्ण मिशन का निवेदिता के साथ गहरा संबंध था। राष्ट्रिय आन्दोलन में उनके सक्रीय रूप से सहयोग के कारण वे स्वामी ब्रह्मानंद के अध्यक्षता में स्थापित रामकृष्ण मिशन से अलग हो गयी। शारदा देवी के साथ उनका ब्नहोत लगाव था, जो रामकृष्ण मिशन में रामकृष्ण की सहयोगी थी। इन सभी बातो का भगिनी निवेदिता के जीवन पर बहोइत प्रभाव पड़ा, क्यू की बाद में यही रामकृष्ण मिशन स्वामी विवेकानंद द्वारा चलाया गया, जिनका भगिनी निवेदिता बहोत सम्मान करती थी। भगिनी निवेदिता की मृत्यु 13 अक्टूबर 1911 को दार्जिलिंग में हुई। उनके स्मारक पर ये लिखा गया है की,

“यहाँ भगिनी आराम कर रही, जिन्होंने अपना सबकुछ भारत को दे दिया था”

इतिहास में गरीब लड़के-लडकियों को पढ़ाने का महान कार्य भगिनी निवेदिता ने किया था। उन्होंने उस समय विद्यार्थियों को कई महत्वपूर्ण बाते सिखाई, और हमेशा लोगो को मानवता की पूजा करने के लिए प्रेरित किया। आज भी लोग उनके जीवन की मिसाल देते रहते है। निच्छित ही भगिनी निवेदिता का जीवन किसी विशाल समुद्र जितना बड़ा रहा होगा। जिसमे ज्ञान ही ज्ञान भरा हुआ हो। हमें भी उनके जीवन से कुछ सीखना चाहिये और हमेशा हमारे सहकर्मियों की, मित्रो की और रिश्तेदारों की मदद करते रहना चाहीये और एक दुसरे को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहना चाहिये।

Bhagini Nivedita Works – एक नजर में भगिनी निवेदिता का जीवनकाल

  • 1884 मे उन्होंने शिक्षिका के रूप में नोकरी की, और अध्यापन का कार्य करने लगी।
  • 1892 मे विम्बल्डन मे ‘रस्किन स्कुल’ इस नाम के स्कुल की स्थापना की। वहा नये प्रकार की शिक्षा मिलती थी।
  • 1895 मे स्वामी विवेकानंद इंग्लंड गये तब उनके चिंतन से और नये जमाने को बहोत उपयुक्त ऐसे विचारो से भरे व्याख्यान से मार्गारेट नोबल प्रभावित हुयी।
  • 28 जनवरी 1898 को मार्गारेट नोबल भारत आयी। आगे 25 मार्च 1898 को स्वामी विवेकानंद ने उनको विधी के साथ ‘ब्रम्हचारिणी’ व्रत की दिक्षा देकर उनका नाम ‘निवेदिता’ ऐसा रखा। और वो आगे चल के मार्गारेट नोबल इन्होंने सच कर दिखाया। इसी साल कोलकता मे ‘निवेदिता बालिका विद्यालय’ की स्थापना उन्होंने की।
  • 1899 मे कोलकता मे आये हुये प्लेग के रोग के महामारी मे उन्होंने खुदकी जान जोखीम में डालकर मरिजोकी सेवा की।
  • रामकृष्ण मिशन को मदत मिलाके देने के लीये उन्होंने इंग्लंड, फ्रान्स, अमेरिका आदी देशो मे यात्रा की।
  • 1902 मे पूणा मे जाके देश के लीये शहादत स्वीकार किये हुये चाफेकर बंधू के माता के चरण स्पर्श करके उनके कदमो की धुल उन्होंने अपने सिर पर लगाई।
  • 1905 को बनारस यहा हुये  राष्ट्रीय कॉग्रेस के अधिवेशन में उन्होंने हिस्सा लिया।

ग्रंथसंपत्ती  –
* द मदर,
* हिंट्स ऑन नॅशनल एज्युकेशन इन इंडिया,
* वेब ऑफ़ द इंडियन लाईफ,
* रिलिजिएन और धर्मा,
* सिव्हिल और नॅशनल आइडियल्स इत्यादी।

मृत्यु  :- 13 अक्तुबर 1911 को दार्जिलिंग (पं. बंगाल) यहा उनका स्वर्गवास हुवा।

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