“तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आज़ादी दूंगा” भाषण | Subhash Chandra Bose Speech

देश में जब आजादी की लड़ाई तेज हो चुकी थी तब हर कोई अपने-अपने अंदाज में इस लढाई में शामिल हो रहे था। लेकिन् अब सबको आजादी चाहियें थी हिंदुस्तान की आजादी! “तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आज़ादी दूंगा” ये शब्द आज़ादी के संघर्ष के समय में भारतीय युवाओ का नारा बने हुए थे। महात्मा गांधी, जिन्हें अहिंसा पर भरोसा था, नेताजी सुभाषचंद्र बोस उनसे बिल्कुल विपरीत थे। बोस अलग तरह से ब्रिटिशो से लढना चाहते थे। उनके द्वारा कहा गया यह भाषण बाद में इतिहासिक बन गया और लाखो युवा उनके इस भाषण से प्रेरित हुए थे। उन्होंने आज़ादी की लढाई के लिये आजाद हिन्द सेना की स्थापना भी की थी। आइये आज हम उनके पुरे भाषण को जानते है- Subhash Chandra Bose Speech Give Me Blood : तुम मुझे खून दो और मै तुम्हे आज़ादी दूंगा।

Subhash Chandra Bose Speech Give Me Blood
Subhash Chandra Bose Speech

“तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आज़ादी दूंगा” भाषण – Subhash Chandra Bose Speech Give Me Blood

नेताजी ने यह भाषण 1944 में बर्मा में इंडियन नेशनल आर्मी में दिया था। :-

दोस्तों! बारह महीने पहले पूर्वी एशिया में भारतीयों के सामने ‘संपूर्ण सैन्य संगठन’ या ‘ज्यादा बलिदान’ का कार्यक्रम पेश किया गया था। आज मैं आपको पिछले साल की हमारी उपलब्धियों का हिसाब दूंगा और आने वाले साल की हमारी मांगें आपके सामने रखूंगा। लेकिन ऐसा करने से पहले मैं आपको एक बार फिर यह एहसास कराना चाहता हूँ कि हमारे पास आजादी हासिल करने का कितना सुनहरा अवसर है।

अंग्रेज एक विश्वव्यापी संघर्ष में उलझे हुए हैं और इस संघर्ष के दौरान उन्होंने कई मोर्चो पर मात खाई है। इस तरह शत्रु के काफी कमजोर हो जाने से आजादी के लिए हमारी लड़ाई उससे बहुत आसान हो गई है, जितनी वह पाँच साल पहले थी। इस तरह का अनूठा और ईश्वर-प्राप्त अवसर सौ वर्षो में एक बार आता है।

इसीलिए अपनी मातृभूमि को ब्रिटिश गुलामी से छुड़ाने के लिए हमने इस अवसर का पूरा फायदा उठाने की कसम खाई है।

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हमारे संघर्ष की सफलता के लिए मैं इतना ज्यादा आशावादी हूँ, क्योंकि मैं सिर्फ पूर्व एशिया के 30 लाख भारतीयों के प्रयासों पर निर्भर नहीं हूँ। भारत के अंदर एक विराट आंदोलन चल रहा है और हमारे लाखों देशवासी आजादी हासिल करने के लिए अधिकतम दु:ख सहने और बलिदान देने के लिए तैयार हैं।

दुर्भाग्यवश, सन् 1857 के महान् संघर्ष के बाद से हमारे देशवासी निहत्थे हैं, जबकि दुश्मन हथियारों से लदा हुआ है। आज के इस आधुनिक युग में निहत्थे लोगों के लिए हथियारों और एक आधुनिक सेना के बिना आजादी हासिल करना नामुमकिन है। ईश्वर की कृपा और उदार नियम की सहायता से पूर्वी एशिया के भारतीयों के लिए यह संभव हो गया है कि एक आधुनिक सेना के निर्माण के लिए हथियार हासिल कर सकें।

इसके अतिरिक्त, आजादी हासिल करने के प्रयासों में पूर्वी एशिया के भारतीय एकता में बंधे हुए हैं और धार्मिक और अन्य भिन्नताओं का, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने भारत के अंदर हवा देने की कोशिश की, यहाँ पूर्वी एशिया में नामोनिशान नहीं है। इसी की वजह से आज परिस्थितियों का ऐसा आदर्श मिलाप हमारे पास है, जो हमारे संघर्ष की सफलता के पक्ष में है – अब जरूरत सिर्फ इस बात की है कि अपनी आजादी की कीमत चुकाने के लिए भारतीय स्वयं आगे आएं। ‘संपूर्ण सैन्य संगठन’ के कार्यक्रम के अनुसार मैंने आपसे जवानों, धन और सामग्री की मांग की थी।

जहाँ तक जवानों का संबंध है, मुझे आपको बताने में खुशी हो रही है कि हमें पर्याप्त संख्या में रंगरूट मिल गए हैं। हमारे पास पूर्वी एशिया के हर कोने से रंगरूट आए हैं – चीन, जापान, इंडोचीन, फिलीपींस, जावा, बोर्नियो, सेलेबस, सुमात्रा, मलाया, थाईलैंड और बर्मा से।……..

आपको और अधिक उत्साह एवं ऊर्जा के साथ जवानों, धन तथा सामग्री की व्यवस्था करते रहना चाहिये, विशेष रूप से आपूर्ति और परिवहन की समस्याओं का संतोषजनक समाधान होना चाहिये। हमें मुक्त किए गए क्षेत्रों के प्रशासन और पुनर्निर्माण के लिए सभी श्रेणियों के पुरुषों और महिलाओं की जरूरत होगी।

हमें उस स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए, जिसमें शत्रु किसी विशेष क्षेत्र से पीछे हटने से पहले निर्दयता से ‘घर-फूंक नीति’ अपनाएगा तथा नागरिक आबादी को अपने शहर या गाँव खाली करने के लिए मजबूर करेगा, जैसा उन्होंने बर्मा में किया था। सबसे बड़ी समस्या युद्धभूमि में जवानों और सामग्री को पहुंचाने की है।

यदि हम ऐसा नहीं करते तो हम मोर्चो पर अपनी कामयाबी को जारी रखने की आशा नहीं कर सकते, न ही हम भारत के आंतरिक भागों तक पहुंचने में कामयाब हो सकते हैं।

आपमें से उन लोगों को, जिन्हें आजादी के बाद देश के लिए काम जारी रखना है, यह कभी नहीं भूलना चाहिये की पूर्वी एशिया – विशेष रूप से बर्मा – हमारे संघर्ष का आधार है। यदि यह आधार मजबूत नहीं है तो हमारी लड़ाकू सेनाएं कभी विजयी नहीं होंगी। याद रखिये कि यह एक ‘संपूर्ण युद्ध है – केवल दो सेनाओं के बीच युद्ध नहीं है। इसीलिए, पिछले पूरे एक साल से मैंने पूर्व में ‘संपूर्ण सैन्य संगठन’ पर इतना जोर दिया है।

मेरे यह कहने के पीछे कारण है कि आप घरेलू मोर्चे पर और अधिक ध्यान दें, एक और भी कारण है। आने वाले महीनों में मैं और मंत्रिमंडल की युद्ध समिति के मेरे सहयोगी युद्ध के मोर्चे पर और भारत के अंदर क्रांति लाने के लिए भी – अपना सारा ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं।

इसीलिए हम इस बात को पूरी तरह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि आधार पर हमारा कार्य हमारी अनुपस्थिति में भी सुचारु रूप से और बिना किसी रूकावट के चलता रहे। साथियों एक साल पहले, जब मैंने आपके सामने कुछ मांगें रखी थीं, तब मैंने कहा था कि यदि आप मुझे ‘संपूर्ण सैन्य संगठन’ दें तो मैं आपको एक ‘एक दूसरा मोर्चा’ दूंगा। मैंने अपना वह वचन निभाया है। हमारे अभियान का पहला चरण पूरा हो गया है। हमारी विजयी सेनाओं ने सेनाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर शत्रु को पीछे धकेल दिया है और अब वे हमारी प्रिय मातृभूमि की पवित्र धरती पर बहादुरी से लड़ रही हैं।

अब जो काम हमारे सामने हैं, उन्हें पूरा करने के लिए कमर कस लें। मैंने आपसे जवानों, धन और सामग्री की व्यवस्था करने के लिए कहा था। मुझे वे सब भरपूर मात्रा में मिल गए हैं। अब मैं आपसे कुछ और चाहता हूं। जवान, धन और सामग्री अपने आप विजय या स्वतंत्रता नहीं दिला सकते। हमारे पास ऐसी प्रेरक शक्ति होनी चाहिये, जो हमें बहादुर व उचित कार्यो के लिए प्रेरित करें। सिर्फ इस कारण कि अब विजय हमारी पहुँच में दिखाई देती है।

आपका यह सोचना कि आप जीते-जी भारत को स्वतंत्र देख ही पाएंगे, आपके लिए एक घातक गलती होगी। यहाँ मौजूद लोगों में से किसी के मन में स्वतंत्रता के मीठे फलों का आनंद लेने की इच्छा नहीं होनी चाहिये। एक लंबी लड़ाई अब भी हमारे सामने है।

आज हमारी केवल एक ही इच्छा होनी चाहिये – मरने की इच्छा, ताकि भारत जी सके, एक शहीद की मौत करने की इच्छा, जिससे स्वतंत्रता की राह शहीदों के खून बनाई जा सके।

साथियो! आज मैं आपसे एक ही चीज माँगता हूँ, सबसे ऊपर मैं आपसे अपना खून माँगता हूँ। यह खून ही उस खून का बदला लेगा, जो दुश्मन ने बहाया है। खून से ही आजादी की कीमत चुकाई जा सकती है। तुम मुझे खून दो और मैं तुम से आजादी का वादा करता हूं।

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3 COMMENTS

  1. इनके बारे में कई प्रकार की भ्रांतियां समाज में फैली हुई है…
    आपकी पोस्ट से काफी स्पष्टीकरण होता है

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