मराठा साम्राज्य के जाबाज और निडर सैनिक बाजी प्रभु देशपांडे | Baji Prabhu Deshpande

मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज के शासन काल में Baji Prabhu Deshpande – बाजी प्रभु जनरल और कमांडर थे। जब शिवाजी महाराज पन्हाला किले में अटके हुए थे तब उनकी जान बचाने के लिए बाजी प्रभु देशपांडे ने अपनी जान दाव पे लगा दी थी।

Baji Prabhu Deshpande मराठा साम्राज्य के जाबाज और निडर सैनिक बाजी प्रभु देशपांडे – Baji Prabhu Deshpande

बाजी प्रभु देशपांडे बहुत ही जाबाज और निडर सैनिक थे। बाजी प्रभु ऐसे सैनिक थे जो नामुमकिन को भी मुमकिन बनाने का सामर्थ्य रखते थे।

यह कहानी एक ऐसे सेना अधिकारी की है जिसने अपने करियर की शुरुवात सामंत चंद्रराव मोरे के यहाँ काम कर के की थी। लेकिन चंद्रराव मोरे भोसले परिवार के दुश्मन थे। वो ऐसे सेना अधिकारी थे जो शिवाजी महाराज के यहाँ कप्तान थे और उन्होंने शिवाजी महाराज को बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी थी।

जब शिवाजी महाराज ने चन्द्रराव मोरे को जवाली (रायगड के नजदीक में) के युद्ध में हराया था तब बाजी प्रभु शिवाजी महाराज के रक्षा अधिकारी थे। उस वक्त शिवाजी महाराज ने बाजी प्रभु को हिन्दवी स्वराज की स्थापना करने के लिया मना लिया था और उन्हें अपना मित्र बना लिया था।

अफजल खान के खिलाफ की गयी लड़ाई में बाजी शिवाजी महाराज के अधिकारी थे और अफजल खान के मरने के बाद भी बहुत सारी लड़ाई में जीत दिलाने के लिए बाजी ने पूरी जान लगा दी थी। बाजी प्रभु देशपांडे शिवाजी महाराज के साथ पन्हाला किले पर एक रक्षा अधिकारी के रूप में काम करते थे।

इसीलिए जब विजापुर के सिद्धि जौहर ने पन्हाला पर हमला कर दिया था तब बाजी प्रभु देशपांडे युद्ध में अहम भूमिका निभा रहे थे। जब उन्हें समझ में आया की शिवाजी महाराज और उनके कुछ सैनिको ने पन्हाला छोड़ना चाहिए उस समय बाजी ने उन्हें किले के बाहर निकलने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

उस मुहीम में बाजी मुख्य रक्षा अधिकारी थे। उस बारिश के मौसम में बाजी ने शिवाजी महाराज राजा को शिव काशिद और कुछ 600 सैनिको के साथ पन्हाला किले से बाहर निकलने में मदत की थी।

सिद्धि जौहर की सेना को रोकने में बाजी और उसकी सेना ने पूरी कोशिश की थी। लेकिन सिद्धि जौहर की सेना को एक बात मालूम हो गयी थी की शिवाजी महाराज कुछ सैनिको के साथ विशालगड की तरफ़ जा चूका है। शिव काशिद ने पूरी ताकत से लड़ाई लड़ी थी और जौहर की सेना को रोक के रखा था लेकिन उस लड़ाई में शिव काशिद को अपनी जान देनी पड़ी।

लेकिन उनका बलिदान काम में आया क्यों की जब वो तरफ़ लड़ाई लड़ रहे थे तो दूसरी तरफ़ शिवाजी महाराज विशालगड पर पहुच चुके थे। लेकिन जिस किले पर शिवाजी महाराज जा रहे थे उस किले पर ऐसा मराठी अधिकारी था जो विजापुर के राजा का एकनिष्ट था।

इसीलिए किले पर पहुचने के बाद भी राजा शिवाजी महाराज को विशाल गड के अन्दर जाने के लिए युद्ध करना पड़ सकता था। इसीलिए बाजी प्रभु देशपांडे 600 सैनिको मेसे आधे सैनिक राजा शिवाजी महाराज के साथ दिए थे।

पावनखिंड के युद्ध में युद्ध का सारा दारोमदार बाजी प्रभु पर ही था। जिस तरह से 300 स्पार्टन ने हजारों फारसियो के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी उसी तरह की लड़ाई पावनखिंड के युद्ध में हुई थी।

सुलतान की सेना शिवाजी महाराज राजा का पावनखिंड में पिछा कर रही थी लेकिन उनकी सेना को बिच रास्ते में ही रोकने का काम बाजी प्रभु देशपांडे ने किया था। एक तरफ़ सुलतान की सेना में 12,000 सेना थी तो दूसरी तरफ़ शिवाजी महाराज की सेना में केवल 300 ही पैदल सेना थी।

इस लड़ाई के अंत में शिवाजी महाराज के सारे 300 सैनिक मारे गए थे और सुलतान के 4000 सैनिक मारे गए थे और बाकी के 8000 सैनिक पूरी तरह से घायल हो गए थे।

जब शिवाजी महाराज विशालगड पे पहुच गए थे तो उन्होंने वहासे और सेना भेजी थी और सुलतान की सेना पर हमला कर दिया था। वो हमला इतना भारी था की सुलतान की सेना को पीछे हटना पड़ा था। इस लड़ाई के परिणाम को देखकर सुलतान का वजीर सिद्धि जौहर काफी निराश हो गया था और उसने शिवाजी महाराज के राज्य से अपनी सेना हटा दी थी।

मगर इस लड़ाई में बाजी प्रभु पूरी तरह से घायल हो गए थे लेकिन वो और उनकी सेना उस खिंड में तब तक लड़ते रहे जब तक विशाल गड किले के तीन तोपों की बारूद की आवाज सुनने को ना मिले। जब उन्हें तोप की आवाज तीन बार सुनाई दी तभी उन्हें आनंद हुआ उसके बाद बड़ी ख़ुशी से जिंदगी की आखिरी सास ली।

उस लड़ाई के बाद इस खिंड को पावनखिंड कहा जाता है। बाजी प्रभु के कारण ही राजा शिवाजी महाराज बचे थे और इसी कारण ही हिन्दवी स्वराज की स्थापना हो सकी थी।

शिवाजी महाराज के शासनकल में बहुत सारे सरदार, सैनिक और मंत्री थे। उनके दरबार में एक से बढकर एक सरदार थे जो बहुत शुरवीर थे। उन बहादुर सैनिको में से एक बाजी प्रभु देशपांडे भी थे। वो सभी सरदारों से काफी अलग थे।

वो बहुत बहुत बहादुर सरदार थे। दंडपट्टा चलाने में कोई उनका हाथ नहीं पकड़ सकता था। हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना करने में उनका बलिदान हमेशा याद किया जायेगा।

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