जाकिर हुसैन का जीवन परिचय – Dr. Zakir Hussain Biography

Dr. Zakir Hussain – जाकिर हुसैन भारत के तीसरे राष्ट्रपति थे, उनका कर्यकालिन समय 13 मई 1967 से अपनी मृत्यु 3 मई 1969 तक रहा है। हुसैन देश के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति और साथ ही राष्ट्रपति होते हुए मरने वाले पहले राष्ट्रपति थे। साथ ही भारत के सबसे कम कर्यकालिन समय वाले राष्ट्रपति भी थे। राष्ट्रपति बनने से पहले उन्होंने 1957 से 1962 तक बिहार का गवर्नर बने रहते हुए और 1962 से 1967 तक भारत का उपराष्ट्रपति बने रहते हुए सेवा की।

जाकिर हुसैन जामिया मिलिया इस्लामिया के सह-संस्थापक भी थे और 1928 से उन्होंने इसका वाईस चांसलर बने रहते हुए सेवा की थी। हुसैन के नेतृत्व में जामिया भारतीय स्वतंत्रता अभियान से अच्छी तरह जुड़ भी गया था। 1963 में उन्हें भारत के सर्वोच्च अवार्ड भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।

Dr. Zakir Hussain

जाकिर हुसैन का परिवार – Dr. Zakir Hussain family

अपने माता-पिता की सात संतानों में से जाकिर हुसैन एक थे: बड़े भाईयो में भूतपूर्व शिक्षक यूसुफ़ हुसैन और महमूद हुसैन शामिल है। उनके पारिवारिक लोगो में अकादमिक मसूद हुसैन और पाकिस्तान स्टेट टेलीविज़न के भूतपूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर अनवर हुसैन शामिल है। उनके पोते का नाम सलमान खुर्शीद है, जो कांग्रेस पार्टी के राजनेता है और भारत के भूतपूर्व विदेश मंत्री भी थे।

जाकिर हुसैन के पिता फ़िदा हुसैन खान की मृत्यु तभी हो गयी थी जब वे 10 साल के थे और जब वे 14 साल के हुए तभी 1911 में उनकी माँ की भी मौत हो गयी। जाकिर ने इतावाह की इस्लामिया हाई स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा पूरी की और फिर उन्होंने मुहम्मदन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज (वर्तमान अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी) से आगे की पढाई पूरी की, वहा वे विद्यार्थी सेना के एक प्रसिद्ध लीडर थे। इसके बाद 1926 में बर्लिन यूनिवर्सिटी से उन्होंने अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। 1915 में 18 साल की उम्र में उन्होंने शाह जहाँ बेगम से निगाह किया और उनकी दो बेटियाँ, सईदा खान और साफिया रहमान भी है।

जाकिर हुसैन का जन्म तेलंगना के हैदराबाद में खेश्गी समुदाय के पश्तून परिवार में हुआ, जो धीरे-धीरे बाद में उत्तर प्रदेश के कैमगनी से जुड़ गये, जहाँ वे बड़े हुए।

जाकिर हुसैन का जीवन परिचय – Dr Zakir Hussain Biography

जाकिर हुसैन जब केवल 23 साल के ही थे जब उन्होंने कुछ विद्यार्थियों और शिक्षको के साथ मिलकर नेशनल मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना की, सबसे पहले इसकी स्थापना 29 अक्टूबर 1920 को अलीगढ में की गयी और बाद में 1925 में इसे नयी दिल्ली के करोल बाग में स्थानांतरित किया गया और इसके बाद पुनः 1 मार्च 1935 को इसे नयी दिल्ली के जामिया नगर में स्थानांतरित किया गया और इसका नाम भी जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी रखा गया।

इसके बाद हुसैन बर्लिन की फ्रेडरिक विलियम यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पीएचडी की उपाधि पाने के लिए जर्मनी चले गये। जर्मनी में हुसैन की मुलाकात उर्दू कवी अस्सदुल्लाह खान “ग़ालिब” (1797-1868) से भी हुई।

इसके बाद जामिया मिलिया इस्लामिया का नेतृत्व करने के लिए वे भारत वापिस आए, जिस समय में यह बंद होने की कगार पर खड़ा था उस समय 1927 को हुसैन की इसकी कमान संभाली। इसके बाद अगले 21 सालो तक वे इसी पद पर रहते हुए संस्था की सेवा करते रहे और इसी संस्था की मदद से उन्होंने ब्रिटिश राज के खिलाफ लढने वाले भारतीयों की भी सहायता की।

Dr. Zakir Hussain महात्मा गांधी और हकीम अजमल खान की राह पर चलते थे। इसी समय में उन्होंने खुद को भारत में शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने में व्यस्त किया और भारत में शिक्षा के अधिकारों किओ बढ़ाने के लिए वे जगह-जगह कार्यक्रम करने लगे थे। उस समय में हुसैन मुख्य शैक्षणिक विचारको में से एक थे और साथ ही उन्होंने उन्होंने आधुनिक भारत के सपने भी देख रखे थे।

उन्होंने देश और जामिया मिलिया इस्लामिया की सेवा करने के लिए कई बार अपने सुखो का बलिदान भी दिया। उनके राजनैतिक विचार भी हमेशा महात्मा गाँधी की राह पर चलने वाले ही थे, वे शुरू से ही मोहम्मद अली जिन्ना के विरोधी थे।

भारत की आज़ादी के कुछ समय बाद ही, जाकिर हुसैन उस समय अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर बने , जिस समय में विभाजन के तूफ़ान भारत पर मंडरा रहा था। 1948 से 1956 तक हुसैन ने कई नाजुक मौको पर यूनिवर्सिटी को बड़ी अच्छी तरह से संभाल कर रखा और उनके नेतृत्व में ही इस यूनिवर्सिटी ने देश भर में अपनी पहचान बनाई। वाईस चांसलर के रूप में अपना कार्यकाल ख़त्म करने के कुछ समय बाद ही उनका नामनिर्देशन 1956 में भारतीय संसद के अप्पर हाउस के सदस्य के रूप में किया गया। लेकिन बिहार राज्य का गवर्नर बनने के लिए उन्होंने 1957 में इस पद को छोड़ दिया था।

1957 से 1962 तक बिहार राज्य का गवर्नर बनके और 1962 से 1967 तक भारत का उपराष्ट्रपति बनके सेवा करने के बाद, 13 मई 1967 को जाकिर हुसैन की नियुक्ती भारत के राष्ट्रपति के रूप में की गयी। अपने उद्घाटन भाषण में उन्होंने कहा था की, पूरा भारत उनका घर है और यहाँ के लोग ही उनका परिवार है। उनके अंतिम दिनों में बैंको के राष्ट्रीयकरण का विषय उग्रता से चर्चा में था। इसके बाद अंततः 9 अगस्त 1969 को एक्टिंग प्रेसिडेंट मोहम्मद हिदायतुल्लाह ने बिल को मंजूरी दे ही दी।

3 मई 1969 को हुसैन की मृत्यु हो गयी, राष्ट्रपति भवन में मरने वाले वे पहले राष्ट्रपति थे। नयी दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया कैंपस में उन्हें उनकी पत्नी के साथ (जिनकी मृत्यु कुछ साल बाद हुई) दफनाया गया था।

इलायांगुदी में उच्चमाध्यमिक शिक्षा की सुविधाओ को शुरू करने का श्रेय उन्हें दिया जाता है और इसी वजह से 1970 में वहाँ उन्ही के नाम का एक कॉलेज भी शुरू किया गया। अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के इंजीनियरिंग कॉलेज का नाम भी उन्ही के नाम पर रखा गया है।

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