कोंदावीदु किले का इतिहास | Kondaveedu Fort History

कोंदावीदु किला – Kondaveedu Fort

कोंदावीदु किला आंध्रप्रदेश के गुंटूर जिले में आता है। इस किले को बनाने के लिए केवल एक राजा का योगदान नहीं रहा बल्कि इस किले को बनाने के लिए बहुत सारे राजा महाराजा ने योगदान दिया है।

इस किले को बनाने के लिए कई साल लग गए। साथ ही इस किले के बाजु में भगवान श्री कृष्ण मंदिर भी बनवाया गया है। जिसे गोपिनाथवामी मंदिर नाम से सभी जानते है।

Kondaveedu Fort

कोंदावीदु किले का इतिहास – Kondaveedu Fort History

कोंदावीदु किले का निर्माण अनापोथा रेड्डी ने सन 1250 में किया था और इस किले को और भी बड़ा बनाने में काकतीय का बड़ा योगदान है। लेकिन बाद में इस किले पर प्रोलाया वेमरेड्डी ने कब्ज़ा कर लिया और उसने सन 1323 में अपनी अद्दंकी को छोड़कर कोंदावीदु को राजधानी बनाया।

इसके बाद में कोंदावीदु किला एक के बाद एक विजयनगर के राजा, गजपति, गोलकोंडा के सुलतान और सबसे आखिरी में फ्रेंच और ब्रिटिश के हातो में चला गया।

जिनका यहाँ पर शासन था उन सब की इस प्रान्त और किले को लेकर विभिन्न योजनाये थी। मगर यहापर जितने भी हिन्दू शासक थे उन सभी ने इस किले और यहाँ के प्रान्त के भले के लिए ही योजनाये बनायीं। लेकिन मुस्लीम बादशाहों ने यहाँ के प्रान्त के विकास के लिए कुछ भी काम नहीं किया।

सन 1323 में वारंगल और आंध्रप्रदेश का बहुत सारा हिस्सा दिल्ली के तुग़लक के कब्जे में चला गया था। उनके इस लुट पुटकी योजनाओ में कारण लोग परेशान होने लगे थे जिसके कारण हिन्दू राजा मुसुनुरी नायक ने मुस्लिमो को वारंगल से निकाल दिया था और इस मुहीम में रेड्डी भी शामिल थे।

कोंदावीदु के रेड्डी सबसे पहले वारंगल राजा के यहाँ सामंत हुआ करते थे। यहापर मिले शिलालेख के कारण एक बात समझ में आती है की वो कोरुकोंदा रेड्डी के समकालीन थे और उन्होंने अपनी राजधानी अद्दंकी से बदलकर कोंदावीदु में स्थित कर दि थी।

इस वंश का संस्थापक प्रोलाया रेड्डी था और वो प्रोला का बेटा था। अभी के विजयवाड़ा और गुंटूर में उन्होंने करीब सौ साल (1328-1428) तक शासन किया था।

उनका पहला राजा प्रोलाया वैमा रेड्डी जिसने सन 1353 तक शासन किया था और उसने अपने समय में कई सारे किले बनवाये थे जिसके चलते उसका राज्य काफी मजबूत और ताकतवर बन गया था। जो किले उसने बनवाये थे उनमेसे कोंदावीदु का किला भी था।

बाद में फिर उसने अपनी राजधानी गुंटूर के अद्दंकी से हटाकर कोंदावीदु बना ली थी। इसके बाद में इस प्रान्त पर बहमनी (1458), विजयनगर के राजा (1516), क़ुतुबशाही (1531,1537 और 1579), औरंगजेब की मुग़ल सेना ने 1687, फ्रेंच (1752), असफजाही राजा और सबसे आखिरी में ब्रिटिश (1766 और 1788 ) ने शासन किया था।

कोंदावीदु किले की वास्तुकला – Architecture of Kondavidu Fort

इस किले को बहुत ही सुन्दरता से बनवाया गया। जिस वास्तुकला में इसे बनवाया गया वो बहुत ही सुन्दर वास्तुकला का प्रतिक है।

कोंदावीदु किले में कुल 24 गढ़ है और इसके चारो ओर 30 छोटी छोटी पहाड़िया है, तब इस किले पर गजपति का शासन था। यह किला बड़ी ही उचाई पर होने की वजह से काफी मनमोहक दिखता है।

इस किले में कुल 21 स्तूप है जो की दिखने में काफी सुन्दर है। यहाँ ओर भी देखनेलायक कई चीजे है जैसे की मंदिर, लोगो के रहने के घर, स्तंभ और कई सारे प्रवेश द्वार। कोंदावीदु किले के नजदीक में ट्रेकिंग करने के लिए भी जगह है।

यहापर के कुछ शिलालेख को पढने के बाद हमें यह भी समझमे आता है की यह किला किसने, कब और कैसे बनवाया था। जब कभी भी आप गुंटूर जिले में आएंगे तो इस किले को जरुर देखना चाहिए।

इस किले के निचे गोपिनाथवामी का मंदिर है और यहाँ मंदिर भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। इस मंदिर को केवल एक ही पत्थर से बनाया गया है।

इस किले को हिन्दू और मुस्लीम दोनों के भी वास्तुकला में भी बनाया गया है। कोंदावीदु किले में एक मस्जिद भी बनायीं हुई है और ऐसा भी कहा जाता है की इस मस्जिद को मंदिर के अवशेष से बनाया गया था।

इस कोंदावीदु किले की सबसे खास बात यह है की इसमें लोगो की पानी की जरुरत पूरी करने के लिए कुवा किया गया है। मगर यहापर केवल एक कुवा नहीं बल्की पुरे तीन कुवे बनाये गए है।

इन कुवे के पानी का लोग इस्तेमाल करते है। इस किले एक और खास बात यह है की इसमें एक बड़ी मस्जिद है।

मगर इस मस्जिद के बारे ऐसा भी कहा जाता है जिस जगह पर आज यह मस्जिद है, उसी जगह पर पहले मंदिर हुआ करता था। उसी मंदिर के अवशेष पर ही इस मस्जिद को बनाया गया है।

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