Meera Bai in Hindi | संत मीराबाई का जीवन परिचय

 Meera Bai

Sant Meera Bai – श्री कृष्ण की दीवानी के रूप में मीराबाई को कौन नहीं जानता। मीरा बाई 16 वी शताब्दी की हिन्दू आध्यात्मिक कवियित्री और भगवान कृष्णा की भक्त थी। लोगो के अनुसार संत मीराबाई – Meera Bai एक आध्यात्मिक कवियित्री थी और उत्तर भारतीय हिन्दू परंपरा के अनुसार वह एक भक्ति संत थी।

संत मीराबाई – Meera Bai दिन-रात कृष्णा भक्ति में ही लीन रहती और कृष्णा को ही अपना पति मानती थी। भगवान कृष्ण के रूप का वर्णन करते हुए संत मीराबाई हजारो भक्तिमय कविताओ की रचना की है।

संत मीरा बाई की श्री कृष्ण के प्रति उनका प्रेम और भक्ति, उनके द्वारा रचित कविताओं के पदों और छंदों मे साफ़ देखने को मिलती है। वहीं श्री कृष्ण के लिए मीरा बाई ने कहा है।

“मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो ना कोई

जाके सर मोर-मुकुट, मेरो पति सोई”

संत मीरा बाई कहती हैं, मेरे तो बस ये श्री कृष्ण हैं।

जिन्होंने गोवर्धन पर्वत को उठाकर गिरधर नाम पाया है।

जिसके सर पे ये मोर के पंख का मुकुट है, मेरा तो पति सिर्फ यही है।”

श्रीकृष्ण की अनन्य प्रेमिका- मीराबाई – Meera Bai in Hindi

Meera Bai images
Meera Bai

नाम – मीरा बाई
जन्म तिथि – 1498
जन्म स्थान – गाँव कुडकी, जिला पाली, जोधपुर, राजस्थान
पिता का नाम – रतन सिंह
माता का नाम – वीर कुमारी
पति का नाम – महाराणा कुमार भोजराज (Husband of Meerabai)
ससुराल – मेवाड़, चित्तौड़
मृत्यु – 1557, द्वारका में।
कार्यक्षेत्र –  कवियित्री, महान कृष्ण भक्त

मीराबाई का जीवन परिचय – Meerabai Story

कृष्ण प्रेम में लीन रहने वाली और लोगों को कृष्ण भक्ति से परिचित कराने वाली महान अध्यात्मिक कवि और संत मीराबाई का जन्म 1498 ई. में राजस्थान के मेवाड़ के चौकड़ी के एक राजघराने में हुआ था। इनके पिता राजा रत्नसिंह थे। मीराबाई अपने बचपन से ही श्री कृष्ण की भक्ति में रंग गईं थी।

इनके बचपन में ही इनकी माता का देहान्त हो गया था।  जिसके बाद उन्होंने अपना ज्यादातर समय अपने दादा राव दूदा जी के पास व्यतीत किया। आपको बता दें कि मीराबाई के दादा जी बेहद धार्मिक एवं लोकप्रिय व्यक्ति थे। वे बेहद ईमानदार थे जिसकी वजह से हर कोई उनसे मोहित हो जाता था। वहीं इनका गहरा प्रभाव महान कवियत्री मीराबाई – Meerabai  पर भी पड़ा।

विवाह योग्य होने पर मीराबाई का विवाह चितौड़ के महाराजा राणा सांगा के बड़े पुत्र भोजराज (Husband of Meerabai) के साथ करवाया गया। लेकिन उनके विवाह के महज 7 साल बाद ही उनके पति भोजराज की मृत्यु हो गई। और मीराबाई पर युवावस्था में दुखों का पहाड़ा टूट पड़ा। बादमे बाबर की इस्लामिक सेना से युद्ध के दौरान ही उनके पिता और ससुर की भी मृत्यु हो गयी।

उनके ससुर की मृत्यु के बाद विक्रम सिंह मेवाड़ के शासक बने थे। प्रसिद्ध लेखो के अनुसार उनके उनके ससुराल वालो ने कई बार मीरा को फाँसी देने की कोशिश भी की थी, जहर पिलाने की और जहर का गिलास देते समय कहते थे की यह मधु (अमृत) है और उन्हें फूलो से भरी बास्केट में साँप डालकर भेजते थे। संचरित्र लेखन के अनुसार, मीरा को कभी भी इन सारी चीजो से कोई हानि नही हुई।

दुसरे पुरातात्विक तत्वों के अनुसार विक्रम सिंह ने मीरा को खुद ही डूबने के लिये भी कहा था, उनके कहने पर मीराबाई ने ऐसा करने की कोशिश भी की थी लेकिन उन्होंने स्वयं को पानी के उपर ही तैरता हुआ पाया।

इसलिए उन्होंने खुद को पूरी तरह से श्री कृष्ण भक्ति में समर्पित कर लिया और फिर घर छोड़ने का फैसला लिया। इसके बाद वे भगवान श्री कृष्ण की गोकुल नगरी वृंदावन चलीं गईं। उधर उन्हें लोगों की खूब प्यार और सम्मान मिलता था।

लोग उन्हें देवीस्परूप मानकर उनका सम्मान करते थे। इसी दौरान मीरा बाई हिन्दी साहित्य के महान कवि तुलसीदास जी को भी पत्र लिखा था –

स्वस्ति श्री तुलसी कुलभूषण दूषन- हरन गोसाई।

बारहिं बार प्रनाम करहूँ अब हरहूँ सोक- समुदाई।।

घर के स्वजन हमारे जेते सबन्ह उपाधि बढ़ाई।

साधु- सग अरु भजन करत माहिं देत कलेस महाई।।

मेरे माता- पिता के समहौ, हरिभक्तन्ह सुखदाई।

हमको कहा उचित करिबो है, सो लिखिए समझाई।।

मीराबाई के पत्र का जबाव तुलसी दास ने इस तरह दिया था –

जाके प्रिय न राम बैदेही।

सो नर तजिए कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेहा।।

नाते सबै राम के मनियत सुह्मद सुसंख्य जहाँ लौ।

अंजन कहा आँखि जो फूटे, बहुतक कहो कहां लौ।।

मीराबाई के गुरु रविदास जी – Meera bai ke Guru

भक्तियुग की महान कवियत्री मीराबाई और गुरू रविदास जी की मुलाकात हुई या नहीं हुई। इसके बारे में कोई ठोस प्रमाण तो नहीं है। लेकिन इतिहासकार मानते हैं कि संत रविदासजी मीरा बाई के अध्यात्मिक गुरु थे। वहीं मीराबाई ने खुद भी अपने पदों में बार-बार गुरु रविदास जी को अपना गुरु बताया है।

“खोज फिरूं खोज वा घर को, कोई न करत बखानी।

सतगुरु संत मिले रैदासा, दीन्ही सुरत सहदानी।।

वन पर्वत तीरथ देवालय, ढूंढा चहूं दिशि दौर।

मीरा श्री रैदास शरण बिन, भगवान और न ठौर।।

मीरा म्हाने संत है, मैं सन्ता री दास।

चेतन सता सेन ये, दासत गुरु रैदास।।

मीरा सतगुरु देव की, कर बंदना आस।

जिन चेतन आतम कह्या, धन भगवान रैदास।।

गुरु रैदास मिले मोहि पूरे, धुर से कलम भिड़ी।

सतगुरु सैन दई जब आके, ज्याति से ज्योत मिलि।।

मेरे तो गिरीधर गोपाल दूसरा न कोय।

गुरु हमारे रैदास जी सरनन चित सोय।।”

इससे तो जाहिर है कि मीराबाई ने गुरु रविदास को अपना गुरु माना था। और मीराबाई गुरु रविदास की विधिवत शिष्या बनीं और उन्होनें रविदास से ही सबद, संगीत व तंबूरा, बजाना सीखा था। मीराबाई ने भी अधिकर भैरव राग का ही इस्तेमाल किया है।

मीराबाई की साहित्यिक देन – Meera Bai Books

श्री कृष्ण की अन्नय प्रेमिका और महान अध्यात्मिक कवियत्री मीराबाई की भाषाशैली में राजस्थानी, ब्रज और गुजराती का मिश्रण है।

इसके अलावा पंजाबी, खड़ीबोली, पुरबी इन भाषा का भी मिश्रण दिखता है। मीराबाई की रचनाएं बेहद भावपूर्ण है। जो भी उनकी रचनाओं को पढ़ता है या फिर उनके भजनों को सुनता है। वह पूरी तरह उनमें डूब जाता है।

वहीं उनका रचनाओं और उनके भजनों (Meera bai Bhajan) में उनका श्री कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम दिखता है, भक्ति-भजन ही इनकी काव्य रचना है, इनकी हर पंक्ति में सच्चे प्रेम से परिपूर्ण है। इसके साथ ही उनके कुछ पदों में उनके दुखों का प्रतिबिंब भी गहराई  से दिखता है।

वहीं गुरु का गौरव, भगवान की तारीफ, आत्मसर्मपण ऐसे विषय भी मीराबाई के पदों में है। मीराबाई की श्री कृष्ण के प्रति भक्ति की प्रेमपूर्ण शैली की वजह से लोग आज भी इनकी पंक्तिया उतनी ही तन्मयता से गाते है।

आपको बता दें कि पूरे भारत में मीराबाई और उनके पद ज्ञात है। इसके अलावा मराठी में भी उनके पदों का अनुवाद हुआ है।

इनकी समस्त रचनाओं में इनके हृदय का प्रेम देखने को मिलता है। इनके द्धारा लिखी गई रचनाएं नीचे लिखी गईं हैं –

  • नरसी जी का मायरा
  • राग गोविन्दा
  • गीत गोविंन्द का टिका
  • राग सोरठ के पद
  • मीराबाई की मलार
  • गरबा गीत
  • राग विहाग

प्रसिद्ध कृति –

“मीरा पदावली”

मीराबाई के पद – Meerabai ke Pad

बसो मेरे नैनन में नंदलाल।

मोहनी मूरति, साँवरि, सुरति नैना बने विसाल।।

अधर सुधारस मुरली बाजति, उर बैजंती माल।

क्षुद्र घंटिका कटि- तट सोभित, नूपुर शब्द रसाल।

मीरा प्रभु संतन सुखदाई, भक्त बछल गोपाल।।

मीराबाई की मृत्यु – Meerabai Death

कुछ विद्वानों का मानना हैं कि कुछ समय के लिए मीराबाई वृन्दावन से द्वारिका रहने के लिए चली गई थी। जिसके बाद 1560 में वे भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति के साथ समा गईं।

मीराबाई अपनी कृष्ण भक्ति और रचनाओं और भजन के लिए काफी लोकप्रिय हुईं। वहीं उनका श्री कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम को आज भी याद किया जाता है।  इसके अलावा उनके गीत या भजन आज भी लोग गाते हैं। मीरा के कई पद हिन्दी फ़िल्मी गीतों का हिस्सा भी बने।

“जिन चरन धरथो गोबरधन गरब- मधवा- हरन।।

दास मीरा लाल गिरधर आजम तारन तरन।।“

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