श्री शांता दुर्गा मंदिर का इतिहास | Shanta Durga Temple

Shanta Durga Temple

श्री शांता दुर्गा मंदिर गोवा राज्य में पणजी से 33 किमी की दुरी पर पोंडा तहसील के कवलेम गाव में है।

Shanta durga temple

श्री शांता दुर्गा मंदिर का इतिहास – Shanta Durga Temple

सल्सेते के कुलोसिम (केलोशी) के असली मंदिर को पोर्तुगिजोने सन 1566 में तोड़ डाला था।

अभी का जो मंदिर हमें दिखाई देता है वो सातारा के मराठा शासक छत्रपती शाहू महाराज सन 1738 में बनवाया था। मंत्री नारोराम रेगे मंत्री सातारा के छत्रपती शाहू के दरबार मे 1723 में मंत्री थे।

उन्होंने ही सातारा के शाहू महाराज से देवी के नए मंदिर के निर्माण के लिए महाराज से पैसे जमा करवाए थे और उसमे से ही 1730 में मंदिर के निर्माण का काम शुरु कर दिया था। उनके कारण ही कवलेम के गाव में देवी का मंदिर एक जायदाद बन चुकी है।

पुरानो के अनुसार एक बार भगवान शिव और विष्णु के बिच में बहुत बड़ा युद्ध हो गया था। उस युद्ध ने कुछ समय बाद बहुत ही उग्र रूप धारण कर लिया था। तब ख़ुद ब्रह्म देव ने देवी पार्वती से युद्ध को रोकने की प्रार्थना की थी।

इसीलिए देवी पार्वती को देवी शांतादुर्गा का रूप धारण करना पड़ा और उन दोनों का युद्ध रोकना पड़ा।

फिर देवी शांतादुर्गा ने उनका युद्ध बंद कर दिया और भगवान विष्णु को उनके दाहिने हाथ के बाजु में किया और भगवान शिव को बाये बाजु में कर दिया था और ऐसे उन दोनों का युद्ध समाप्त हो सका।

देवी शांतादुर्गा के दोनों हाथों में नाग है जो भगवान विष्णु और शिव को दर्शाते है।

कुछ स्थानिक कथा के अनुसार कहा जाता है की केलोशी की देवी शांतादुर्गा एक बार सलसत्ते तहसील के गाव संखवाल में कालांतक राक्षस को मारने चली गयी गयी थी। क्यु की वो राक्षस उस गाव के ब्राह्मणों को बहुत तकलीफ देता था।

उस राक्षस को मारने के बाद देवी को विजया नाम से भी जाने लगा था। इसीलिए संखवाल गाव में शांतादुर्गा और लक्ष्मीनरसिम्हा मंदिर के साथ देवी विजयादुर्गा का भी मंदिर है।

लेकिन जब पोर्तुगिजो ने आक्रमण कर दिया था तो उस समय इस मंदिर को पोंडा तहसील के केरिम गाव ले जाना पड़ा।

देवी आदिमाया दुर्गा के इस अवतार को श्रीशांतादुर्गा देवी कहते है। मंदिर के गर्भगृह में देवी शांतादुर्गा की चार हाथों वाली बहुत ही सुन्दर मूर्ति है और मंदिर में भगवान शिव और भगवान विष्णु की छे इंच की छोटी छोटी मुर्तिया भी है।

श्री शांतादुर्गा देवी भगवान शिव की पत्नी है और उनकी बड़ी भक्त भी है। इसीलिए जब भी देवी की पूजा की जाती है तब भगवान शिव की भी पूजा की जाती है।

मंदिर के गर्भगृह में देवी के मूर्ति के बाजु में ही भगवान शिव की काले पत्थर में बनाई हुई छे इंच की मूर्ति भी है। जब जलाभिषेक किया जाता है तब देवी और भगवान शिव की पूजा की जाती है।

देवी की असली मूर्ति 1898 में पठान लोगों ने चुराई थी। 1901 में श्री लक्ष्मण कृष्णाजी गायतोंडे ने देवी की नै मूर्ति बनाई थी और उसे 19 मार्च 1902 को स्थापित किया गया। और उस दिन जो मूर्ति मंदिर में स्थापित की गयी थी वो आज भी मंदिर में है।

देवी के मूर्ति के बाजु में जो शिवलिंग है उसकी लगातार जलाभिषेक के साथ पूजा करने से लिंग का आकार हरसाल छोटा होता जा रहा है।

इसीलिए श्री शांतादुर्गा मंदिर के प्रसाद कौलसे अनुमति लेने के बाद नया शिवलिंग बनाने का काम मुंबई के मूर्तिकार रामचंद्र सुन्दर को दे दिया था।

वेद और मंत्रो का पठन करके शिवलिंग को 27 नवम्बर 1965 को मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी 1887 के दिन स्थापित किया गया और पुराने लिंग को पूरी धार्मिक विधि के साथ समुन्दर में बहा दिया गया।

श्री शांता दुर्गा मंदिर की वास्तुकला – Shanta durga temple Architecture

मंदिर के परिसर का इलाका पहाड़ी की निचे के इलाके में आता है और मंदिर के चारो तरफ़ झाडी ही झाड़ी है। मंदिर के तीनो दिशा में अन्य देवता के तीन छोटे छोटे मंदिरे देखने को मिलते है।

यह मंदिर पूरी तरह से पिरामिड के छप्पर और गुबंद से बना हुआ है और मंदिर का लाल सफ़ेद रंग के कारण तो मंदिर की सुंदरता में और बढ़ोतरी दिखाई देती है।

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