Short Moral Stories In Hindi | जैसा बोओंगे वैसा पाओंगे

Short Moral Stories In Hindi

जैसा बोओंगे वैसा पाओंगे / Short Moral Stories In Hindi

दोस्तों, ये कहावत तो आपने बहोत बार सुनी होंगी और पढ़ी होंगी की “जैसा बोओंगे वैसा पाओंगे” लेकीन इस कहावत के पीछे का अर्थ बहोत कड़वा है. वो कैसे ? मै आपको इस कहानी / Short Moral Stories In Hindi के जरिये समझाता हु.

एक गांव में एक व्यापारी रहता था. उसका नाम था दानी लेकीन वो उसके नाम के बिलकुल उल्टा था. मतलब न तो वो स्वंय दान देता था और न ही अपने परिजनों को दान करने देता था. जब भी कोई  भिक्षुक या साधु उसके, दहलीज पर भिक्षा मांगने आता. तो वो उनका अपमान करके उन्हें कह देता आगे बढ़ो और इतना सा कह कर उन्हें टाल देता था.

दानी या धर्मी  तो वो था ही नहीं. हाँ  पर बदमाशी, अधर्म अवथ्य करता था. उसकी गांव में किराने की दुकान थी. वो जो भी किरण सामान गाववालों को बेचता उसमें मिलावट करके बेचता था. गाववाले लोग वो मिलावट वाली अशुध्द सामग्री खाकर अक्सर बीमार रहते थे.

दानी का एक पूत्र था. उसका नाम था गणेश. वो हमेशा अपने पिताजी को मिलावट करते समय देखता. लेकीन उसने एक बार अपने पिताजी से पूछा की, – पिताजी आप सामुग्री में मिलावट क्यों करते हो ? तब उस दानी ने उसे कहा की, – “बेटा, शुद्ध सामग्री हानीकारक होती है. इससे गाववाले बीमार हो जायेंगे, इसलिय मै मिलावट करके बेचता हु.” इस तरह उसने अपने बेटे गणेश को भी मिलावट का नाम सिखा दिया. मगर गणेश ने इसका उपयोग उल्टा किया मतलब दानी अक्सर अपने घर के लिये जो भी शुद्ध सामग्री निकालता है. उसमे मिलावट नहीं रही. गणेश सोचता की अगर हम ये शुद्ध सामग्री खायेंगे तो उससे तो हम बीमार पड़ जायेंगे. तो वो घर में आये सामग्री में मिलावट कर देता था. इस के बारे में दानी को पता भी नहीं चलता था. क्योंकि गणेश मिलावट तो  कर देता था लेकीन बताता  किसी को भी नहीं था.

इस के कारण दानी अपने घर के लिये शुद्ध सामग्री निकलता मगर खाता मिलावट वाली सामुग्री उसे इसका एहसास खाते समय होता लेकीन वो सोचता की मैंने तो शुद्ध सामग्री निकाली थी लेकिन ये तो मिलावट वाली लग रही है. इसके ये चोरी के कारन वो पूछ भी नहीं सकता क्योंकि उसे विश्वास नहीं था की उसके खाने में भी मिलावट हो सकती है. वही मिलावट वाला खाना खाकर एक दिन दानी इतना बीमार हो गया की बिस्तर से उठना भी मुश्कील हो गया. अब वो बिस्तर पे ही पडे पडे भोजन करता दुध पिता था. बीमार दानी को दुध देने की जिम्मेदारी हमेशा उसके बेटे गणेश पर आती थी उसने बचपन से जो देखा उसके अनुसार दुध पूरी तरह शुद्ध है मतलब उसमे मिलावट नहीं की गई है. वह सोचता की अगर ये शुद्ध दुध पिताजी को दिया तो वो और अधिक बीमार हो जायेंगे. ये सोच के साथ वह पहले आधा गिलास दुध स्वंय पी जाता और आधे दुध में पानी मिलाकर दानी को दे देता.

दानी जब दुध पिता था तब दानी को समझ में आता की दुध बहोत पतला इसमे पानी की मात्रा अधिक है, मगर तत्काल इससे असहमत भी हो जाता क्योंकि दुध घर का होता था और वो घर के लिये बिना मिलावट वाला दुध निकालता था तब पानी मिलाने का सवाल ही नहीं उठता था. मगर उसे संदेश हो गया. एक दिन उसके दुध पिने का समय हुवा तो उसने खिड़की से पूत्र को देखा तो वो उसका काम देखकर दंग रह गया. बेटा आधा दुध तो पी लेता था और आधे में पानी मिलाकर पिता के पास आया. और पिताजी को दिया. दानी ने उससे कहा की, बेटा गणेश क्या घर में और दुध नहीं है ? क्यों नही. घर में पुरे पाच लीटर दुध रखा है, गणेश ने जवाब दिया. दानी बोला – फिर  तुम्हे दुध पीना था तो उसमे  से क्यों नही पिया मेरा दुध पीकर उसमे  पानी क्यों मिलाया ? पूत्र ने कहा – की पिताजी आप ही तो कहते है न की कोनसी भी शुद्ध सामग्री हानिकारक होती है मगर माँ आपके दुध में पानी नहीं मिलाती थी. मैंने सोचा की आपको शुद्ध दुध देने से आपकी बिमारी और बढेंगी. आपकी बिमारी ने बढ़े यही सोचकर तो मैंने आपको  शुद्ध दुध न देते हुये उसमे मिलावट करना उचित समझा.

बुरी शिक्षा का परिणाम दानी ने देख लिया था. तब से उसने मिलावट नहीं करने की शिक्षा दी. और अपने दुकान से गाववालो को शुद्ध सामग्री भी देने लगा. और इतना ही नहीं उसके दहलीज पर जो भी आता उन्हें भोजन अवश्य देता, और वो भी शुद्ध.

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