अंडमान और निकोबार द्वीप पर बना “सेलुलर जेल” | Andaman Cellular Jail ( Kala pani )

Cellular Jail – सेलुलर जेल को काला पानी जेल – Kala pani Jail के नाम से भी जाना जाता है, यह भारत के अंडमान और निकोबार – Andaman Nicobar द्वीप पर बना एक औपनिवेशिक जेल है। इस जेल का उपयोग ब्रिटिशो द्वारा राजनितिक कैदियों को दूरस्थ द्वीपसमूह पर कैद करने के लिए किया जाता था। भारत जब आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहा था तब बहुत से स्वतंत्रता सेनानियों जैसे बटुकेश्वर दत्त, योगेश्वर शुक्ला और विनायक दामोदर सावरकर को इस जेल में रखा गया था। आज जेल के परिसर को राष्ट्रिय स्मारक की उपाधि दी गयी है।

अंडमान और निकोबार द्वीप पर बना “सेलुलर जेल” | Andaman Cellular Jail ( Kala pani )

Cellular Jail

सेलुलर जेल का इतिहास – Cellular Jail History

जेल परिसर का निर्माण 1896 से 1906 के बीच किया गया था, और 1857 में सेपॉय विद्रोह के बाद से ही अंडमान द्वीप का उपयोग ब्रिटिशो द्वारा कैदियों को कैद करने के लिए किया जाने लगा था।

1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम ने अंग्रेजी सरकार को चौकन्ना कर दिया। व्यापार के बहाने भारत आये अंग्रेजो को भारतीय जनमानस द्वारा यह पहली कड़ी चुनौती थी, जिसमे समाज के लगभग सभी वर्ग शामिल थे।

दिल्ली में हुए युद्ध के बाद अंग्रेजो को आभास हो चूका था की उन्होंने युद्ध अपनी बहादुरी और रणकौशलता के बल पर नही बल्कि षड्यंत्रों, जासूसों, गद्दारी से जीता था। अपनी इन कमजोरियों को छुपाने के लिए जहाँ अंग्रेजी इतिहासकारों ने 1857 के स्वाधीनता संग्राम को सैनिक ग़दर मात्र कहकर इसके प्रभाव को कम करने की कोशिश की, वही इस संग्राम को कुचलने के लिए भारतीयों को असहनीय व अस्मरणीय यातनाये भी दी।

एक तरफ लोगो को फांसी दी गयी, पेड़ो पर सामूहिक रूप से लटका कर मृत्यु दण्ड दिया गया व तोपों से बांधकर दागा गया, वही जिन लोगो से अंग्रेजी सरकार को ज्यादा खतरा महसूस हुआ, उन्हें ऐसी जगह भेजा गया जहाँ से जीवित वापस आने की बात तो दूर किसी अपने-पराये की खबर तक मिलने की कोई उम्मीद भी नही थी। अंतिम मुघल सम्राट बहादुर शाह जफ़र को अंग्रेजी सरकार ने रंगून भेज दिया, जबकि इसमें भाग लेने वाले अन्य क्रांतिकारियों को काले पानी की सजा बतौर अंडमान भेज दिया गया।

विद्रोह के दब जाने के कुछ समय बाद ही ब्रिटिशो ने बहुत से विद्रोहियों को मार डाला। उनमे से भी जो जिन्दा बच गये उन्हें अंडमान की जेल में आजीवन कारावास की सजा सुना दी गयी। अप्रैल 1868 में कराची से और 733 विद्रोहियों को यहाँ लाया गया था। 1863 बंगाल गिरिजाघर स्थापना में हेनरी फिशर कोर्ब्य्न ने यहाँ अंडमानी लोगो के घर विकसित किए थे।

अंग्रेजी सरकार द्वारा भारत के स्वतंत्रता सैनानियों पर किए गए अत्याचारों की मूक गवाही में इस जेल की नींव 1897 में रखी गई थी। इस जेल के अंदर 694 कोठरियां हैं। इन कोठरियों को बनाने का उद्देश्य बंदियों के आपसी मेल जोल को रोकना था। आक्टोपस की तरह सात शाखाओं में फैली इस विशाल कारागार के अब केवल तीन अंश बचे हैं। कारागार की दीवारों पर वीर शहीदों के नाम लिखे हैं। यहां एक संग्रहालय भी है जहां उन अस्त्रों को देखा जा सकता है जिनसे स्वतंत्रता सैनानियों पर अत्याचार किए जाते थे।

कैदी:

जेल में कैद करते समय राजनितिक और क्रांतिकारी कैदियों को एक-दुसरे से अलग रखा जाता था। अंडमान में जेल की देखरेख के लिए ब्रिटिश सरकार ने अच्छा-खासा बंदोबस्त कर रखा था।

सेलुलर जेल में कैद बहुत से कैदियों में ज्यादातर स्वतंत्रता सेनानी ही थे। जेल के कुछ प्रसिद्ध कैदियों में फजल-ए-हकखैराबादी, दीवान सिंह कालेपानी, योगेन्द्र शुक्ला, मौलाना अहमदुल्लाह, मोलवी अब्दुल रहीम सादिकपूरी, बटुकेश्वर दत्त, मौलवी लियाकत अली, बाबाराव सावरकर, भाई परमानंद, षडान चन्द्र चटर्जी, सोहन सिंह, वामन राव जोशी, विनायक दामोदर सावरकर, और नंद गोपाल शामिल है।

बहुत से कैदी जैसे उपेन्द्र नाथ बनर्जी, बरिन्द्र कुमार घोष, और बिरेन्द्र चन्द्र सेन इत्यादि ने अलीपुर केस (1908) दर्ज करने की कोशिश भी की थी। सावरकर बंधुओ को 2 साल तक पता नही चला की वे एक ही जेल में है, क्योकि उन्हें दो अलग-अलग कोठरियों में कैद करके रखा गया था।

मार्च 1868 में 238 कैदियों ने भागने की कोशिश की थी। लेकिन अप्रैल तक वे सभी पकडे गये। जिनमे से एक ने आत्महत्या कर दी और बचे हुए कैदियों में से 87 कैदियों को वॉकर ने फांसी की सजा सुना दी थी।

इसके बाद मई 1933 में जेल अधिकारियो को आकर्षित करने के लिए कैदियों ने भूख हड़ताल करना शुरू की। जिनमे 33 कैदियों ने कैदियों के साथ किये जा रहे अमानवीय व्यवहार का विरोध किया और भूख हड़ताल पर बैठ गये। उनमे से महावीर सिंह, मृत्यु जबरदस्ती खिलाने की वजह से हुई थी और मोहन किशोर नामदास, मोहित मोइत्रा की मृत्यु भूख हड़ताल से हुईं थी। इसके बाद महात्मा गांधी और रबिन्द्रनाथ टैगोर ने इसमें हस्तक्षेप किया। इसके बाद सरकार ने सेलुलर जेल में कैद सभी राजनितिक कैदियों को 1937-38 में रिहा करने का आदेश जारी किया।

आर्किटेक्चर:

सेलुलर जेल का निर्माणकार्य 1896 में शुरू हुआ और 10 साल बाद 1906 में पूरा हुआ। सेलुलर जेल के नाम से प्रसिद्ध इस कारागार में कुल 698 बैरक तथा 7 खंड थे, जो सात दिशाओ में फैलकर पंखुड़ीदार फुल की आकृति का एहसास कराते थे। इसके बीच में एक बुर्जयुक्त मीनार थी और हर खंड में तीन मंजिले थी। यह आज भी विवाद का ही विषय है की इसे अंग्रेजो ने क्यों बनवाया था। इतिहास में तो केवल इतना ही लिखा गया है की भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के मद्देनजर अंग्रेज सरकार सकते में आगयी थी, जिसके कारण उन्हें शायद ऐसा कदम उठाना पड़ा था।

जापानियों का कब्ज़ा:

1942 में जापान साम्राज्य के लोगो ने अंडमान पर आक्रमण कर दिया और ब्रिटिशो को वहां से बाहर निकाल दिया। इसके बाद सेलुलर जेल ब्रिटिश कैदियों का घर बन चुकी थी। इस समय में सुभाष चन्द्र बोस भी इस द्वीप पर आये थे।

1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह जेल पुनः ब्रिटिशो के नियंत्रण में आ चुकी थी।

आज़ादी के बाद:

भारत की आज़ादी के बाद जेल के दो खंडो को तबाह कर दिया गया। बल्कि बहुत से भूतपूर्व कैदियों ने इसका विरोध भी किया था और राजनितिक नेता भी इसे इतिहास धरोहर के रूप में सुरक्षित रखना चाहते थे। इसीलिए 1969 में इसे राष्ट्रिय स्मारक में परिवर्तित कर दिया गया।

1963 में सेलुलर जेल के परिसर में गोविंद बल्लभ पन्त हॉस्पिटल की स्थापना की गयी। वर्तमान में यह 500-पलंगो का एक विशाल अस्पताल है जहाँ 40 से भी ज्यादा डॉक्टर मरीजो की सेवा करते है।

10 मार्च 2006 को जेल ने अपने निर्माण की शताब्दी पूरी की। इस अवसर पर बहुत से प्रसिद्ध कैद्यो को भारत सरकार ने सम्मानित किया था।

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