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धोलावीरा का इतिहास और जानकारी | Dholavira history in Hindi

Dholavira – धोलावीरा पश्चिम भारत के गुजरात राज्य में कुटच जिले के भचाऊ तालुका के खादिरबेट गाँव की जगह है। यह गाँव राधनपुर से 165 दूर है। स्थानिक लोग इसे कोटडा टिम्बा भी कहते है, क्योकि इस जगह पर प्राचीन इंडस घाटी सभ्यता और हड़प्पा शहर के खंडहर पड़े हुए है।

हड़प्पा साम्राज्य की पाँच विशाल जगहों में से यह एक है और साथ ही इंडस घाटी सभ्यता – हड़प्पा संस्कृति से संबंध रखने वाली भारत की प्रमुख आर्कियोलॉजिकल जगहों में से एक है। उस समय इस गाँव को सबसे विशाल शहर माना जाता था। यह कुटच के रण में कुटच के रेगिस्तानी वन्य जीव के पास खादिर जमीन पर बसा हुआ है।

Dholavira शहर कुल 120 एकर में फैला हुआ है। यह जगह 2650 BCE से स्थापित है, लेकिन बाद में इसका महत्त्व कम होने लगा था। इसके कुछ समय बाद यहाँ रहना और कुछ भी करना बिल्कुल वर्जित था।

Dholavira history Hindi

धोलावीरा का इतिहास और जानकारी | Dholavira history in Hindi

इस जगह की खोज 1967-8 में जे.पी. जोशी ने की थी, जो डी.जी. के ए.एस.आय. थे और उस समय यह जगह हड़प्पा की मुख्य जगहों में से एक थी। 1990 से आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया ने यहाँ कई उत्खनन किये, जिनसे यह पता चला की “धोलावीरा ने ही इंडस घाटी सभ्यता को नयी दिशा प्रदान की थी” ।

हड़प्पा से जुडी दूसरी मुख्य जगहों में हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, गनेरीवाला, राखिगढ़ी, कालीबंगन, रूपनगर और लोथल शामिल है।

उत्खनन का कार्य आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया ने आर.एस.बिष्ट के नेतृत्व में 1989 में उत्खनन का काम शुरू किया था। और इसके साथ-साथ 1990 से लेकर 2005 तक यहाँ कुल 13 बार उत्खनन किया गया था।

उत्खनन करने से यहाँ शहरी विकास भी हुआ और उत्खनन के दौरान हीरे, मोती, जानवरों की हड्डियों, मिट्टी और पीतल के बर्तन और कयी बहुमूल्य रत्न और चीजे भी मिले। आर्कियोलॉजिकल सर्वे के अनुसार दक्षिण गुजरात, सिंध और पंजाब और पश्चिम एशिया का मुख्य व्यापार स्थान धोलावीरा ही था।

वास्तुकला और सामग्री संस्कृति –

माना जाता है की हड़प्पा शहर लोथल से भी पुरानी जगह Dholavira है, यह शहर आयताकार आकार में बसा हुआ है और तक़रीबन 54 एकर में फैला हुआ है। कहा जाता है की यहाँ बसने वाले लोग अपने साथ पूरी संस्कृति लेकर ही आये थे। जब धोलावीरा शहर नया-नया बसा ही था तब वहाँ के लोग मिट्टी के पत्थर बनाते थे, पत्थर तोड़ते थे और शंख आदि के मनके बनाते थे।

इस समय के लोगो ने अपने घरो को बनाने के लिये भी मिट्टी से बनी ईंटो का उपयोग किया था। देख जाये तो धोलावीरा एक किले, मध्य शहर और निचले शहर से मिलकर बना हुआ है। आज के आधुनिक महानगरों जैसी पक्की गटर व्यवस्था पांच हजार साल पहले धोलावीरा में थी। पूरे नगर में धार्मिक स्थलों के कोई अवशेष नहीं पाये गए थे।

इस प्राचीन महानगर में पानी की जो व्यवस्था की गई थी, वह अद्दभुत थी। बंजर जमीन के चारो ओर समुद्र का पानी फैला हुआ था।

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