आखिर क्या होता है आपातकाल?

Emergency in India

भारत में आपातकाल, भारतीय राजनीति का वो काला अध्याय है जिसने भारतीय राजनीति को हिलाकर रख दिया था और तो और आजादी के बाद भी भारत की जनता को भारत सरकार की ही गुलामी का दंश झेलना पड़ा था।

क्योंकि भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्घारा आपातकाल की घोषणा के बाद से ही जनता के सारे मौलिक अधिकारों को छीन लिया गया था। इतना ही नहीं आपातकाल के समय सरकार जो चाहती थी सिर्फ और सिर्फ वही होता था। कुछ प्रमुख अखबारों को ही खबरें प्रकाशित करने की अनुमति दी गई थी, सरकार के मुताबिक ही खबरें प्रकाशित होती थी।

दिग्गज और अनुभवी विपक्षी नेताओं और सरकार के खिलाफ बोलने वाले नेताओं को जेल के सलाखों के पीछे डाल दिया गया था यानि कि पूरी तरह से भारतीय लोकतंत्र की मान्यताओं का हनन करते हुए इंदिरा गांधी ने भारत में आपातकाल लागू किया था।

26 जून 1975 को भारत में आपातकाल की घोषणा की गई थी। जबकि देश से 21 मार्च 1977 तक पूरे 21 महीने बाद आपातकाल हटाया गया था। ये वो दौर था जब भारतीय लोकतंत्र की मूल्यों की पूरी तरह से धज्जियां उड़ती रहीं।

आपातकाल के दौरान हर तबके के लोगों को दबाने की कोशिश की गई थी। आखिर क्या है आपातकाल, क्यों पड़ी आपातकाल की जरूरत, भारतीय संविधान में आपातकाल का वर्णन, भारत में आपातकाल की मुख्य बातें समेत इससे जुड़े तमाम महत्वपूर्ण तथ्यों बारे में हम आपको अपने इस लेख में बता रहे हैं:

Emergency in India

आखिर क्या होता है आपातकाल? – What is Emergency in India?

आपातकाल भारतीय संविधान में एक ऐसा प्रावधान है, जिसका इस्तेमाल तब किया जाता है, जब देश को किसी आंतरिक, बाहरी या आर्थिक रूप से किसी तरह के खतरे की आशंका होती है यानि कि इन तीन परिस्थितियों में सरकार द्धारा आपातकाल की घोषणा की जा सकती है।

लेकिन अगर सरकार इस अपने निजी फायदे के लिए लागू करती है तो निश्चय ही इससे देश की जनता के मौलिक अधिकारों का हनन होता है और लोकतंत्र के मूल्यों की धज्जियां उड़ती हैं। और भारत में इसे सरकार ने अपने निजी फायदे के लिए लागू किया जिसका खामियाजा उस समय लोगों को भुगतना पड़ा था।

क्यों पड़ती है आपातकाल की जरूरत – Why the Need for Emergency

भारतीय संविधान में आपातकाल लागू करने का अधिकार केन्द्र सरकार को दिया गया है। लेकिन संविधान निर्माताओं ने आपातकाल जैसी स्थिति की कल्पना ऐसे वक्त को ध्यान में रखकर की थी।

जिसमें देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा खतरे में हो। इसके तहत कुछ ऐसे प्रावधान बनाए गए थे जिसके तहत केंद्र सरकार बिना किसी रोक टोक के देश के हित के लिए गंभीर फैसले ले सकती हो।

वहीं अगर आपको उदाहरण के तौर पर समझाए तो मान लीजिए कि अगर कोई पड़ोसी देश अपने देश पर हमला करता है, तो हमारी सरकार को जवाबी हमले के लिए संसद में किसी भी तरह का बिल पास न कराना पड़े क्योंकि हमारे देश में संसदीय लोकतंत्र है।

इसलिए हमारे देश को किसी भी देश से युद्ध करने के लिए पहले संसद में बिल पास कराना होता है। लेकिन जब भी देश में अचानक हमला हो और किसी अन्य विकल्पों को निपटने को मौका नहीं मिले तो ऐसी आपात स्थितियों के लिए संविधान में कुछ प्रावधान हैं, जिसके तहत केंद्र सरकार के पास ज्यादा शक्तियां आ जाती हैं और केंद्र सरकार अपने हिसाब से फैसले ले सकती है।

आपको बता दें कि केन्द्र सरकार को शक्तियां देश को आपातकालीन स्थिति से बाहर निकालने के लिए मिलती हैं।

भारतीय संविधान में आपातकाल – Emergency in Indian Constitution

भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा संविधान है। संविधान निर्माताओं ने कई देशों के संविधानों से रिसर्च कर इसका निर्माण किया है। इसके अलावा इसमें कई ऐसे प्रावधान है जो अलग-अलग देशों में लिए गए हैं।

आपको बता दें कि भारतीय संविधान में आपातकाल की चर्चा संविधान के 18 वें हिस्से में आर्टिकल 352 से 360 के बीच की गई है। भारतीय संविधान में यह प्रावधान वेइमार संविधान (1919 से 1933) से लिया गया है।

आपको बता दें कि भारतीय संविधान में तीन रह के आपातकाल का उल्लेख किया गया है।

जिसमें राष्ट्रीय आपाातकाल यानि कि नेशनल इमरजेंसी, राष्ट्रपति शासन यानि के स्टेट इमरजेंसी और आर्थिक आपातकाल यानि कि इननॉमिक इमरजेंसी शामिल हैं।

नेशनल इमरजेंसी का जिक्र  संविधान में आर्टिकल 352 के तहत किया गया है। इसका ऐलान बेहद कठिन परिस्थितियों में किया जा सकता है। इसका ऐलान युद्ध, बाहरी आक्रमण राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर किया जा सकता है। आपातकाल के दौरान सरकार के पास तो असीमित अधिकार हो जाते हैं, जिसका इस्तेमाल वह किसी भी रूप में कर सकती है, लेकिन आम नागरिकों के सारे अधिकार छीन लिए जाते हैं।

जबकि राष्ट्रपति शासन का संविधान में जिक्र आर्टिकल 356  के तहत किया गया है। राजनीतिक संकट को देखते हुए संबंधित राज्य में राष्ट्रपति आपात स्थिति का ऐलान कर सकते हैं। जब किसी राज्य की राजनीतिक संवैधानिक व्यवस्था फेल हो जाती है या राज्य, केंद्र की कार्यपालिका के किन्हीं निर्देशों का अनुपालन करने में असमर्थ हो जाता है, तो इस स्थिति में ही राष्ट्रपति शासन लागू होता है।

आर्थिक आपातकाल का उल्लेख आर्टिकल 360 के तहत किया गया है। आर्थिक आपात की घोषणा राष्ट्रपति उस वक्त कर सकते हैं। जब देश में  आर्थिक संकट जैसे विषम हालात पैदा होते हैं सरकार दिवालिया होने के कगार पर आ जाती है या फिर भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त होने की कगार पर आ जाती है।

26 जून 1975 को जब भारत में लागू हुआ आपातकाल – Emergency in India 1975

26 जून 1975 को जब भारत की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने भारत में आपातकाल की घोषणा की थी। यह भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का काला दिवस माना जाता है।

आपको बता दें कि इंदिरा गांधी ने आपातकालीन की घोषणा करते वक्त अपने संदेश में कहा था कि भाइयों, बहनों…राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है और इसका आतंकित होने का कोई कारण नहीं है। जिसे सुनने के बाद पूरा देश सद में आ गया था और देश में हाहाकार मच गया था। यह आपातकाल 21 मार्च 1977 तक जारी रहा था। वहीं भारत में  आपातकाल लागू करने का इंदिरा गांधी का फैसला उनकी जिंदगी में लिया गया सबसे बड़ा फैसला था।

आपातकाल के फैसले के बाद मानो भारत में लोकतांत्रिक अधिकारों का जमकर हनन हुआ था। दरअसल इस फैसले के बाद सरकार की आलोचना करने वाले कई नामी राजनेताओं को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया था। यही नहीं भारतीय मीडिया से भी उसे लिखने और बोलने का अधिकार छीन लिया गया था।

सरकार जो चाहती थी सिर्फ वही खबरें प्रकाशित होती थी, पूरी तरह से प्रेस को सेंसर कर दिया गया था। यही नहीं आजादी के बाद भी आम नागरिकों की स्वतंत्रता में कई तरह के रोक लगा दिए गए वहीं जो लोग आपातकाल के दौर से गुजरे वह इस समय के दर्द को समझ सकते है।

भारत में इंदिरा गांधी के खिलाफ बढ़ने लगी अशांति – Emergency Crisis

आपको बता दें कि साल 1973 से 1975 से समस्त भारत में इंदिरा गांधी की राजनीतिक रणनीतियों के खिलाफ भारत में अशांति बढ़ने लगी थी । चारों तरफ इंदिरा गांधी के खिलाफ विरोध की गूंज सुनाई दे रही थी।

दरअसल इस दौरान गुजरात का नव-निर्माण आंदोलन से से यहां की राज्य शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई थी। इसके अलावा विद्यार्थियों के आंदोलन की वजह से राज्य सरकार को केन्द्र सरकार में मिला दिया गया था। वहीं साल 1975 में बिहार संघर्ष समिति को जयप्रकाश नारायण का बड़े स्तर पर सहयोग मिला था।

इस दौरान जय प्रकाश नारायण ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का ऐलान किया था। जिसके तहत विद्यार्थियों, किसानों और आम मजदूरों को एक साथ लाया गया था। उस समय रेलवे कर्मचारियों की मांगों को भी इंदिरा गांधी की सरकार ने नहीं माना और उन्हें निर्मम तरीके से दबाने की कोशिश की।

यही नहीं रेलवे कर्मचारियों को गिरफ्तार कर उनके परिवार वालों को रेलवे क्वाटर से तक बाहर निकाल दिया गया था जिसके बाद से इंदिरा गांधी को काफी आलोचना झेलनी पड़ी थी।

भारत में आपातकाल की घोषणा के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था के खराब होने का हवाला भी इंदिरा गांधी ने दिया। सरकार का कहना था कि सूखा और तेल संकट से भारतीय अर्थव्यवस्था खराब हो गई थी इसके अलावा सरकार का यह भी कहना था कि देश के अंदर हो रहे हड़ताल और प्रतिवाद से सरकार काम नहीं कर पा रही है।

वहीं उस दौरान इंदिरा गांधी को उनके बेटे संजय गांधी और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्य मंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने देश में आंतरिक आपातकाल लागू करने की सलाह दी। जबकि इंदिरा गांधी ने अपने मंत्रिमंडल तक से इस विषय पर कोई चर्चा नहीं की और भारत में आपातकाल लागू करने का फैसला ले लिया।

आपातकाल के दौरान कई दिग्गज नेताओं को किया गिरफ्तार

आपातकाल की घोषणा करने के बाद इंदिरा गांधी की सरकार ने उनकी आलोचना करने वाले नेताओं को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया। जिनमें विजयराजे सिंधिया, जयप्रकाश नारायण, राज नारायण, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, जीवतराम कृपलानी, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, अरूण जेटली, सत्येन्द्र नारायण सिन्हा, गायत्री देवी समेत अन्य तत्कालिक जननेताओं का गिरप्तार किया गया।

इसके अलावा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और जमात-ए इस्लामी जैसी संस्थाओं पर सरकार ने बैन लगा दिया और कई कम्यूनिस्ट नेताओं को भी गिरफ्तार किया।

आपातकाल के दौरान चुनाव संबंधी नियमो को संशोधित किया गया इंदिरा गांधी की अपील को सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार करवाया गया ताकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उनके रायबरेली संसदीय क्षेत्र से चुनाव रद्द किए जाने के फैसले को बदल दिया जाए।

साफ है कि आपातकाल की घोषणा केवल निजी फायदों और सत्ता बचाने के लिए की गई थी। वहीं आपातकाल लगाने के जिन कारणों को इंदिरा गांधी सरकार ने अपने ‘श्वेतपत्र’ में बताया, वे नितांत अप्रासंगिक हैं।

इस तरह से इमरजेंसी भारत की राजनीति के इतिहास का काला अध्याय रहा है। जिसे उस दौर से गुजरे लोगों से बेहतर और कोई नहीं समझ सकता है।

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शिवांगी अग्रवाल , जिन्हें मीडिया में करीब साढ़े 5 साल का अनुभव है । वे मीडिया की जानी-मानी संस्थान न्यूज 18 न्यूज चैनल से भी लगभग 2 साल जुड़ी रही हैं । इसके अलावा वे इलैक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के दैनिक जागरण समेत कई और संस्थानों में भी काम कर चुकी हैं । उन्होनें मीडिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थान जामिया-मिलिया-इस्लामिया से मास कम्युनिकेशन की डिग्री भी प्राप्त की है ।

8 COMMENTS

    • शिवांगी मैम…मैं बड़े हर्ष के साथ कहना चाहता हूँ कि…किसी भी विषय पर आपकी रिसर्च बहुत अच्छी होती है…जिससे हम जैसे पाठक को बहुत कुछ सिखने को मिलता है…मैं उम्मीद करता हूँ कि आप आगे भी अपने अनुभव रिसर्च के साथ हम तक पहुँचाती रहेंगी… साथ ही मैं उपर वाले दुआ करूँगा कि..देवी समान आप जैसी बेटी का जन्म हर घर में हो…वो माता पिता और वो परिवार धन्य है जिनसे आप जुड़ी है

      • शुक्रिया सुजीत राजपूत जी। यह जानकर बेहद खुशी हुई कि आपको हमारा ये पोस्ट अच्छा लगा। आप लोगों के कमेंट से हमारा मनोबल बढ़ता है। हमारी कोशिश रहेगी कि हम आगे भी इस तरह के ज्ञानवर्धक पोस्ट अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध करवाते रहेंगे। कृपया आप हमारी वेबसाइट से जुड़े रहिए।

        • मैम आपके सभी पोस्ट हमारे लिए महत्वपूर्ण है…मैं आपसे अगली पोस्ट की जल्द उम्मीद करता हूँ.

    • धन्यवाद सोनिया जी हमारा ये पोस्ट पढ़ने के लिए। हम आगे भी आपको इस तरह के पोस्ट उपलब्ध करवाते रहेंगे। भारत में आपातकाल का दौर, हमेशा बुरे वक्त की याद दिलाता है वहीं इमरजेंसी की वजह भारतीय राजनीति भी कलंकित हुई है।

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