गणेश चतुर्थी पर निबंध और जानकारी | Ganesh Chaturthi Essay and Information

Ganesh Chaturthi Essay

”वक्र तुंड महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभ:। निर्विघ्नं कुरु मे देव शुभ कार्येषु सर्वदा”

हाथी के जैसे विशालकाय जिसका तेज सूर्य की किरणों के समान हैं। वे विघ्नकारी और मंगलकारी है और साथ ही विद्या, युक्ति और प्रबंधन के विलक्षण संयोजक भी हैं जिनके पूजन से भक्तों के न सिर्फ कष्ट हरते हैं बल्कि उन्हें रिद्धि-सिद्धी की प्राप्ति भी होती है और सारी मनोकामनाएं पूरी होती है।

इसलिए गणेश जी की पूजा हिन्दू धर्म में मुख्य पूजा मानी गई है। बिना गणेश पूजन के शादी, विवाह, उत्सव, या कोई भी मंगल काम शुरु नहीं होता है। गणेश जी के पूजन का खास महत्व है। इनके पूजन से भक्तों के सभी कष्टों का निवारण होता है।

Ganesh Chaturthi – गणेश चतुर्थी में भी भगवान गणेश जी का पूजा-अर्चना विधि-विधान से किया जाता है, ये पर्व कब मनाया है और इस त्योहार का क्या महत्व हैं, इस त्यौहार के लिए क्या-क्या तैयारियां की जाती हैं। और गणेश जी की उत्पत्ति की पौराणिक कथाओं के बारे में हम आपको अपने इस आर्टिकल में बताएंगे।

गणेश चतुर्थी पर निबंध और जानकारी – Ganesh Chaturthi Essay and Information

Ganesh Chaturthi Essay
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श्री गणेश चतुर्थी कब मनाई जाती है ? – When is Ganesh Chaturthi Celebrated in India

भारत में हिन्दूओं का मुख्य त्यौहार गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास ( अगस्त या सितंबर ) की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। गणपत गणेश के जन्मोत्सव के रूप में गणेश चतुर्थी का त्योहार पूरे देश में हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

गणेश चतुर्थी में गणेश महोत्सव का आयोजन किया जाता है। जगह-जगह मिट्टी से बनी गणेश जी की सुंदर प्रतिमा की प्रतिष्ठा की जाती है। ये महोत्सव 11 दिन तक या फिर अनंत चतुदर्शी के दिन तक चलता है। कुछ लोग अपने घरों में भी गणेश जी की प्रतिमा रखते हैं और 11 वें दिन गणेश प्रतिमा का धूमधाम से विर्सजन करते हैं।

महाराष्ट्र में गणेश उत्सव बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। गणेश पूजा के दौरान कपूर, लाल चंदन, लाल फूल, नारियल, गुड़, मोदक और दुरवा घास चढ़ाने की प्रथा है। गणेश भगवान माता पार्वती और भगवान शिव के पुत्र हैं। ये बुद्धि और समृद्धि के भगवान माने जाते हैं।

गणेश चतुर्थी के दिन लोग सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और साफ कपड़े पहनकर गणपत गणेश की पूजा-अर्चना करते हैं साथ ही गणपति बप्पा को उनका प्रिय मोदक का भोग लगाते हैं।

भगवान गणेश जी के लिए स्वादिष्ट व्यंजन बनाते हैं और मंत्रोच्चारण कर, गणेश जी की पूजा-अर्चना आरती गाकर करते हैं। हिन्दू धर्म के लोग अपनी रीति-रिवाजों के अनुसार भक्ति गीत भी गाते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

गजानन के पूजन से भक्तों की सभी बाधाएं दूर हो जाती है और कष्टों का निवारण होता है साथ ही जो लोग विनायक जी की आराधना करते हैं उनका जीवन खुशियां से भर जाता है। गणपति बाप्पा को विघ्नहारी भी कहा जाता है क्योंकि गणपति बाप्पा विघ्नहारी और मंगलकारी हैं। उनकी पूजा मातृ से ही भक्तों के सारे विघ्न दूर हो जाते हैं।

”विघ्न हरण, मंगल करण, गणनायक गणराज!

रिद्धि सिद्धि सहित पधारजो, म्हारा पूरण करजो काज !!”

गणेश उत्सव को लेकर खास तैयारी –

गणेश चतुर्थी का त्योहार आने के कई दिन से पहले से ही बाजारों में इसकी रौनक दिखने लगती है। बाजारों में दुकानें सुंदर-सुंदर गणेश प्रतिमाएं से सज जाती हैं। बड़ी संख्या में लोग खासकर महाराष्ट्र में अपने घरों में मूर्ति की स्थापना करते हैं और फिर अनंत चतुर्दशी वाले दिन गणेश प्रतिमा का विर्सजन करते हैं।

गणेश उत्सव की तैयारियों में लोग कई दिन पहले से ही जुट जाते हैं। जगह-जगह भव्य गणेश पंडालों का आयोजन किया जाता है, जिसमें पूरा विधि-विधान के साथ गणेश प्रतिमा स्थापित की जाती हैं।

इन दिनों भंडारों का भी आयोजन करवाए जाते हैं। और खास तरह की साज-सजावट भी होती है इस त्योहार में मानो पूरा माहौल भक्तिमय हो जाता है। गणेश विसर्जन के दौरान भक्ति का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। भक्त गण अपने गणपति जी को समुंदर और नदी में विर्सजित करते हैं इस दौरान

”गणपति बप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया”

के जयकारों के साथ अपने बप्पा को विदाई देते हैं। इस तरह अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश पूजा का समापन होता है।

गणेश पूजन और उपवास रखने से मिलता है 101 गुना फल और सुख-समृद्धि

गणपति बप्पा का जनमोत्सव गणेश चतुर्थी को विनायक चतर्थी के नाम से भी जाना जाता है। जबकि भविष्य पुराण के मुताबिक शिवा, संज्ञा और सुधा यह तीन चतुर्थी होती है इनमें भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को संज्ञा कहते हैं।

ऐसी भी मान्यता है कि इसमें स्नान और उपवास करने से 101 गुना फल मिलता है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मध्यान्ह में भगवान गणेश का जन्म हुआ था इसी कारण यह तिथि महक नाम से भी जानी जाती है। इस दिन भगवान गणपति की पूजा, उपासना व्रत, कीर्तन और जागरण करने से भक्तों को मनवांछित फल की प्राप्ति होती है।

भगवान गणेश जी की पूजन- विधि – Ganesh Pooja Vidhi

गणेश जी का पूजन अगर सही विधि से किया जाए तो भक्तों को मन चाहे फल की प्राप्ति होती है। भगवान गणपति की पूजा आराधना की विधि नीचे लिखी गई है –

  • सबसे पहले स्नान कर लाल वस्त्र पहने क्योंकी लाल कपड़ा भगवान गणेश जी का सबसे ज्यादा प्रिय है।
  • गणेश चतुर्थी की पूजा के लिए एक चौकी पर लाल दुपट्टा बिछा कर उस पर सिंदूर या रोली सज्जित कर आसन बनायें और उसके बीच में गणपति की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें, और गाय के घी से युक्त दीपक जलाएं। पूजा के दौरान गणेश जी का मुख उत्तर या पूर्व दिशा में ही रखें।
  • ओम देवताभ्यो नमः मंत्र के साथ दीपक का पूजन करें। इसके बाद हाथ जोड़कर भगवान गणेश की प्रतिमा के सम्मुख आवाहन मुद्रा में खड़े हो कर उनका आवाहन करें। और फिर भगवान गणेश जी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा करें। आवाहन एवं प्रतिष्ठापन के बाद भगवान गणेश के आसन के सम्मुख पांच पुष्प अञ्जलि में लेकर छोड़े।
  • अब गणेश जी का पंचामृत से अभिषेक करें।
  • पंचामृत में आप सबसे पहले भगवान गणेश जी का अभिषेक पहले दूध से करें, फिर दही से करें, फिर घी से करें और फिर गंगा जल से या शुद्ध जल से करें । इस तरह पंचामृत से गणपति बाप्पा का अभिषेक करें।
  • अभिषेक करने के बाद गजानन को रोली और कलावा चढ़ाए।
  • सिंदूर गणेश जी को बेहद प्रिय है इसलिए गणपति बप्पा को सिंदूर अवश्य चढ़ाएं।
  • भगवान गणेश जी की दो पत्नियां रिद्धि और सिद्धि हैं इसलिए रिद्दि-सिद्धि के रूप में उन्हें दो सुपारी और पान चढ़ाएं।
  • फल, फूल और हरी घास अथवा दूवा चढ़ाए और फूल में गणेश जी को पीला कनेर बेहद प्रिय है, पीला कनेर चढ़ाएं और दूब चढ़ाएं।
  • इसके बाद गणेश जी के सबसे प्रिय मिठाई मोदक (लड्डू ) का भोग लगाएं।
  • इसके बाद सभी परिवारजनों के साथ मिलकर गणेश जी की आरती गाएं।
  • श्री गणेश जी का मंत्रोच्चारण करें और उन्हें 12 नामों का भी उच्चारण करें।
  • भगवान गणपति जी के जयकारे लगाएं।

गणपति जी के 12 नाम और उनके अर्थ – Lord Ganesha Names with Meaning

गणपति बप्पा को अलग-अलग राज्यों में 12 अलग-अलग नामों से जाना जाता है । नारद पुराण में भगवान गणेश जी के 12 नामों का उल्लेख किया गया है जो कि इस प्रकार है –

  • समुख – सुंदर मुख वाले
  • एकदंत – एक दंत वाले
  • कपिल – कपिल वर्ण वाले
  • गजकर्ण – हाथी के कान वाले
  • लंबोदर- लंबे पेट वाले
  • विकट – विपत्ति का नाश करने वाले
  • विनायक – न्याय करने वाले
  • धूम्रकेतू- धुंए के रंग वाले पताका वाले
  • गणाध्यक्ष- गुणों और देवताओं के अध्यक्ष
  • भालचंद्र – सर पर चंद्रमा धारण करने वाले
  • गजानन – हाथी के मुख वाले
  • विघ्नाशक- विघ्न को खत्म करने वाले

गणपति बाप्पा को हाथी की सूंड किसने और क्यों लगाई ? इसकी पौराणिक कहानी – Lord Ganesha Story

गणपति बाप्पा का सिर काटकर हाथी की सूंड किसने और क्यों लगाई इसके पीछे की पौराणिक कथा ये है कि एक बार भगवान शिव की अर्धांग्नी और माता पार्वती जी नहाने जा रही थी।

तभी उन्होनें अपने शरीर के मैल से एक पुतला बनाया और उसमें प्राण डालकर एक सुंदर बालक का रूप दिया। जिससे उस बालक में माता पार्वती का अंश आ गया और वे बालक माता के पुत्र बन गए।

माता पार्वती अपने अंश को द्दार पर खड़ा कर नहाने के लिए ये आदेश देकर चलीं गईं कि वे उनकी आज्ञा के बिना किसी को दरवाजे के अंदर नहीं आने दें।

वह बालक माता के आदेशानुसार दरवाजे पर खड़े होकर पहरेदारी करने लगा। तभी भगवान शंकर आए और अंदर जाने की कोशिश करने लगे लेकिन उस बालक ने भगवान शिव को अंदर प्रवेश नहीं करने देता है।

भगवान शिव के बार-बार कहने पर भी बालक द्धार नहीं छोड़ता है और अपनी माता पार्वती का आदेश कर्तव्यनिष्ठा से निभाता है लेकिन इससे भगवान शंकर क्रोधित हो जाते हैं और अपने त्रिशूल से उस बालक की गर्दन धड़ से अलग कर देते हैं वहीं जब माता पार्वती स्नान कर आती हैं तो और अपने पुत्र का सिर कटा देखती हैं तो वे काफी दुखी हो जाती हैं और रोने लगती हैं तभी भगवान शंकर को पता लग जाता है कि वह बालक उनका पुत्र था।

फिर क्या था भगवान शंकर अपने पुत्र के सिर को जोड़कर फिर से जीवित करने के लिए अपने अपने सेवकों को आदेश देते हैं कि धरतीलोक पर जिस बच्चे की मां, बच्चे की तरफ पीठ करके सो रही हो, उस बच्चे का सिर काट लाना। जब सेवक जाते हैं तो देखते हैं कि एक हाथी का मां अपने बच्चे की तरफ पीठ करके सो रही थी। तभी सेवक उस हाथी के बच्चे का सिर काट लाते हैं। और भगवान शिव को दे देते हैं।

भगवान शंकर उस हाथी के सिर को अपने पुत्र के सिर से जोड़कर उन्हें फिर से जीवित कर देते हैं। इसके साथ ही भगवान शंकर अपने पुत्र को सभी गणों को स्वामी घोषित करते हैं तभी से उस बालक का नाम गणपति रख दिया गया तभी से भगवान गणेश जी पूरे जगत में प्रसिद्ध हो गए और उनकी आराधना की जाने लगी।
गणेश जी के पिता भगवान शंकर ने उन्हें अग्रणी देवता होने का भी वरदान दिया था अर्थात सबसे पहले पूजे जाने वाले देवता। इसलिए कोई भी पूजा भगवान गणेश जी के पूजन के साथ शुरु होती है उनकी पूजा के बिना कोई भी पूजा पूरी नहीं होती है और कोई भी मंगल काम होने से पहले भगवान गणेश जी पूजा होती है।

”निर्विघ्नं कुरुमे देव सर्वकार्येषु सर्वदा”

हिन्दूओं के देव परंपरा में गणेश भगवान सबसे ज्यादा बुद्धिमानी और आराध्य देवता हैं। हिन्दू धर्म का कोई भी मंगल या शुभ काम गणपति बप्पा की वंदना से ही शुरु किया जाता है।

विनायक जी को विघ्नहर्ता और शुभत्व का पर्याय भी माना गया है। सुख और सदबुद्धि की प्राप्ति की लिए गणेश जी की आराधना की जाती है। भगवान गणेश रिद्धि-सिद्धि के स्वामी हैं। आपको बता दें कि भगवान गणेश जी की बड़े-बड़े ऋषियों-मुनियों ने भी आराधना की है।

अगर आप भी चाहते हैं कि आपका घर हमेशा समृद्ध बना रहे और परिवार में खुशहाली आए तो आपको गणेश पूजन जरूर करना चाहिए और अगर आप गणेश जी की आराधना नीचे लिखे गए 5 मंत्रों का जाप कर करें तो निश्चय ही आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी। गणेश पूजा के लिए मंत्र – Ganesh Mantra इस प्रकार हैं –

श्री गणेश मंत्र:
ॐ गं गणपतये नम:
ऋद्धि मंत्र:
ॐ हेमवर्णायै ऋद्धये नम:
सिद्धि मंत्र:
ॐ सर्वज्ञानभूषितायै नम:
लाभ मंत्र:
ॐ सौभाग्य प्रदाय धन-धान्ययुक्ताय लाभाय नम:
शुभ मंत्र:
ॐ पूर्णाय पूर्णमदाय शुभाय नम:

ऐसी मान्यता है कि गणपति बाप्पा की आराधना से सुख, सदबुद्धि और समृद्धि आती है। गणेश जी गज मस्तक उनकी बुद्धिमत्ता व विवेकशीलता का प्रतीक है। वे हमें सीख देते हैं कि कठिन से कठिन बाधाओं को विवेकशीलता से दूर किया जा सकता है।

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