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महान कवी जयशंकर प्रसाद की जीवनी

Jaishankar Prasad

Jaishankar Prasad – जयशंकर प्रसाद, जिन्हें एक महान कवि के रूप में कौन नहीं जानता। उन्होंने न सिर्फ हिन्दी साहित्य में अपना अति महत्वपूर्ण योगदान दिया, बल्कि अपनी रचनाओं और नाटकों के माध्यम से युग परिवर्तन कर दिया।

कवी-आलोचक महादेवी वर्मा कहती है : जब मैं अपने महान कवियों की बात करती हु, तो जयशंकर प्रसाद – Jaishankar Prasad का चित्र निश्चित ही मेरे दिमाग में सबसे पहले आता है. ऐसा लगता है जैसे –

“हिमालय के बिच में एक पेड़ गर्व से खड़ा हो। गगनचुम्बी होने की वजह से बर्फ़बारी, बारिश और तपती धुप भी उनपर हमला करती है। जहा पानी भी बहोत कम है ऐसा लगता है जैसे पानी उस पेड़ की जड़ो के बिच लुका-छुपी खेल रहा हो। लेकिन भरी बर्फ़बारी, वर्षा और तेज़ धुप में भी वह पेड़ ऊंचाइयों पर गर्व से खड़ा है।”

महान कवी जयशंकर प्रसाद की जीवनी – Jaishankar Prasad

Jaishankar Prasad

पूरा नाम (Name)महाकवि जयशंकर प्रसाद
जन्म (Birth)30 जनवरी, 1890 ई.
जन्मस्थान (Birthplace)वाराणसी, उत्तर प्रदेश
मृत्यु (Death)15 नवम्बर, साल 1937 (आयु- 48 वर्ष)
मृत्यु स्थान (Deathplace)वाराणसी, उत्तर प्रदेश
विवाह (Wife)पहली पत्नी – विंध्यवाटिनी, दूसरी पत्नी- कमला देवी
पुत्र (Son)रत्नशंकर
कर्म-क्षेत्र (Occupation)उपन्यासकार, नाटककार, कवि
मुख्य रचनाएं (Poem)चित्राधार, कामायनी, आँसू, लहर, झरना,
एक घूंट, विशाख, अजातशत्रु, आकाशदीप,
आँधी, ध्रुवस्वामिनी, तितली और कंकाल

जयशंकर प्रसाद एक अच्छे कवि के रूप में ही नहीं बल्कि एक अच्छे नाटककार, कथाकार, उपन्यासकार और निबंधकार के रूप में भी मशहूर थे। इसके साथ ही उन्हें छायावादी युग के महान लेखक के तौर पर भी जाना जाता था। यही नहीं उन्हें हिन्दी के छायावादी युग के 4 मुख्य स्तंभों में से एक माना जाता है, जिन्होंने हिन्दी काव्य में छायावाद की स्थापना की थी।

यही नहीं उन्होंने एक साथ कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में हिन्दी साहित्य को एक नई दिशा प्रदान की और भारतीय हिन्दी साहित्य को गौरन्वित किया।

आपको बता दें कि जयशंकर प्रसाद हिन्दी साहित्य के छायावादी युग के चार मुख्य कवियों में से भी एक थे, जिनमें महान दिग्गज लेखक सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा शामिल है। आपको बता दें कि द्धिवेदी युग के बाद छायावाद युग की शुरुआत की गई थी, इस युग को साल 1918 से 1936 तक माना जाता है।

नाटन लेखन में कड़ी भाषा के जनक भारतेंदु के बाद वे एक नई धारा का प्रवाह करने वाले युगप्रवर्तक नाटककार रहे हैं, जिनके नाटक को पाठकों द्धारा आज भी खूब पसंद किया जाता है। आपको यह भी बता दें कि  इन्होंने अपनी रचनाओं में नाटक सबसे ज्यादा लिखे हैं। इन्हें “कामायनी” पर मंगला प्रसाद पारितोषिक भी प्राप्त हुआ है।

इसके अलावा कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में भी छायावाद युग के महान लेखक जयशंकर प्रसाद जी ने कई यादगार कृतियां दी हैं। इसके साथ ही कथा साहित्य के क्षेत्र में उनके द्धारा दिए गए योगदान महत्वपूर्ण हैं। भावना-प्रधान कहानी लिखने वाले लेखकों की सूची में जयशंकर प्रसाद का नाम सबसे ऊपर है। महज 48 साल के अल्प जीवन में उन्होंने हिन्दी की सभी विद्याओं पर रचनाएं लिखी। लेखन के अलावा उनकी रुचि खेलकूद में भी थी।

आपको बता दें कि जयशंकर प्रसाद शतरंज के एक अच्चे खिलाड़ी भी थे| अपने बाकी के समय में उन्हें बाग-बगीचे की देखभाल करना खाना बनाना भी काफी पसंद था। वे गंभीर स्वभाव के व्यक्तित्व थे, जिनके बारे में हम आपको अपने इस लेख में बताने जा रहे हैं –

जय शंकर प्रसाद का जन्म और प्रारंभिक जीवन – Jai Shankar Prasad Jeevan Parichay

30 जनवरी, साल 1890 को उत्तरप्रदेश के काशी (वाराणसी) में एक जाने-माने वैश्य परिवार में हिन्दी साहित्य के महान लेखक जयशंकर प्रसाद का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम देवीप्रसाद साहू था जो कि वाराणसी के एक बेहद प्रतिष्ठित नागरिक और तंबाकू व्यापारी के रुप में मशहूर थे।

तंबाकू बनाने के कारण उन्हें सुंघनी साहू के नाम से भी जाना जाता था। देवी प्रसाद साहू दयालु प्रवृत्ति के व्यक्ति थे, उनकी दानशीलता के चर्चे दूर-दूर तक हुआ करते थे। जयशंकर प्रसाद का बचपन काफी सुख-सुविधाओं में बीता था क्योंकि उनका परिवार एक संपन्न परिवार था जिसमें धन-वैभव की किसी तरह की कोई कमी नहीं थी, यही वजह है कि जयशंकर प्रसाद को अपने बचपन में किसी तरह की कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा।

इसके साथ ही आपको यह भी बता दें कि जयशंकर प्रसाद का बचपन जब खुशीपूर्वक बीत रहा था तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई और उनके ऊपर दुख का पहाड़ टूट पड़ा और बाल्यकाल में ही उनके ऊपर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया था। वहीं जब वे अपने पिता के निधन के दुख से उभरे ही थे कि उनके ऊपर से उनकी मां और बड़े भाई का साया भी उठ गया और महज 17 साल की छोटी से उम्र में जयशंकर प्रसाद जिम्मेदारियों के बोझ तले दब गए।

जयशंकर प्रसाद जी की शिक्षा – Jaishankar Prasad Education

जयशंकर प्रसाद जी को प्रारंभिक शिक्षा उनके घर पर ही दी गई। उनके लिए घर पर ही संस्कृत, हिन्दी, फारसी और उर्दू के शिक्षक भी नियुक्त किए गए थे। हालांकि कुछ समय के बाद उन्होंने स्थानीय कीन्स कॉलेज में भी एडमिशन लिया लेकिन यहां पर वे आठवीं क्लास तक ही पढ़ सके।

आपको बता दें कि जयशंकर प्रसाद एक अध्वसायी व्यक्ति थे और नियमित रुप से अध्ययन करते थे। बचपन से ही जयशंकर प्रसाद जी का रुझान साहित्य  की तरफ था, वे साहित्यिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। और बाद में इन्होंने भारतीय हिन्दी साहित्य में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और कई ऐसी कृति लिखीं जिससे उनका नाम हिन्दी साहित्य के मुख्य कवियों में गिना जाने लगा। आपको बता दें कि जयशंकर प्रसाद ने वेद, इतिहास पुराण और साहित्य का भी गहन अध्ययन किया था।

जयशंकर प्रसाद का वैवाहिक  जीवन – Jaishankar Prasad Life History in Hindi

हिन्दी साहित्य के प्रख्यात लेखक जयशंकर प्रसाद जी का वैवाहिक जीवन भी काफी संघर्ष में बीता। दरअसल, 1906 में बड़े भाई की मौत के बाद उनका विवाह उनकी भाभी विंध्यवाटिनी से करवा दिया गया। लेकिन उनके साथ भी वे बहुत दिन नहीं रह सके क्योंकि विंध्यवाटिनी टीबी की बीमारी से पीड़ित थी, जिसके चलते 1916 में उनकी मौत हो गई। जिसके बाद वे इतने टूट गए कि उन्होंने जीवन भर अकेले रहने का ही मन बना लिया।

लेकिन परिवार की जिद के चलते उनकी दूसरी शादी कमला देवी से करवाई गई। इसके बाद दोनों ने एक बेटे को जन्म दिया जिसका नाम रत्नशंकर रखा गया।

जयशंकर प्रसाद का साहित्यिक योगदान –

जयशंकर प्रसाद के परिवार में हुई घटनाओं ने उन्हें बेहद कठोर बना दिया था, वहीं ऐसी विकट परिस्थितियों में ही उन्होंने अपने कवि व्यक्तित्व को उभारा था। छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक महान लेखक के रूप में प्रख्यात जयशंकर प्रसाद जी ने अपनी रचनाओं में भारत की परंपरा, संस्कृति और दर्शन समेत केन्द्रीय मानव संस्कृति के विकास का भावनात्मक और मार्मिक वर्णन किया है।

इनकी ज्यादातर रचनाएं इतिहास और कल्पना के समन्वय पर आधारित हैं और इनकी रचनाओं में शिल्प के स्तर पर भी मौलिकता के दर्शन होते हैं। इसके साथ ही आपको बता दें कि जयशंकर जी की रचनाओं की भाषा बेहद सहज और सुगम हैं जो कि पाठकों को आसानी से समझ में आ जाती है, इसलिए इन्हें भाषाओं का पंडित भी कहा जाता है।

छायावाद युग प्रवर्तक और एक अच्छे कवि होने के अलावा यह एक प्रसिद्ध नाटककार, उपन्यासकार और कथाकार भी थे जिन्होंने अपने उपन्यास, नाटक, कहानी, निबंध आदि साहित्यिक क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

इसके अलावा इन्होंने अपने लेखन शैली के माध्यम से अपनी पूरी रचनाओं का बेहद सुंदर तरीके से श्रंगार भी किया है। वहीं इनकी रचनाएं मानवीय रुप से जुड़ी हुई हैं जिनमें प्रेम और सौन्दर्य का उल्लेख बहुत बड़े स्तर से मिलता है। इनकी रचनाओं के बारे में नीचे दिया गया है।

जयशंकर प्रसाद जी के काव्य संग्रह  – Jaishankar Prasad Poems in Hindi

  • कामायनी  – Kamayani
  • आँसू – Aansoo
  • झरना – Jharna
  • कानन-कुसुम  –
  • लहर

काव्य-संग्रह – Jaishankar Prasad ki Kavita in Hindi

  • कामायनी –

          जयशंकर प्रसाद जी की यह सबसे प्रसिद्ध महाकाव्य है, जो कि साल 1936  में प्रकाशित किया गया।  इसमें इन्होने मनुष्य को श्रद्धा एवं मनु के माध्यम से ह्रदय एवं ज्ञान के समन्वय का सन्देश दिया है। इनकी इस रचना पर इन्हे मंगलाप्रसाद पारितोषिक सम्मान मिला।

  • आंसू –

        जयशंकर प्रसाद जी का 1925 में प्रकाशित यह एक सर्वश्रेष्ठ गीतकाव्य है, जो कि इनके दुखों से भरी कहानी पर उधृत रचना है, जैसा की इसके नाम से स्पष्ट है कि इसमें वियोग रस का समावेश है।

  • लहर –

      1933 में प्रकाशित, जयशंकर प्रसाद जी की यह मुक्तक रचनाओं का संग्रह हैं, जिसमें मन के भावों को प्रकट करती हुई तथा लक्ष्य पर बने रहने की प्रेरणा हमें इससे प्राप्त होती है।

  • प्रेम पथिक-

यह हिन्दी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले कवि का ब्रजभाषा स्वरूप है जिसका प्रकाशन  साल 1909 में सबसे पहले ‘इन्दू’  ने किया था।

  • चित्राधार-

 जयशंकर प्रसाद की इस रचना को साल 1918 में प्रकाशित किया गया। आपको बता दें कि इसमें  अयोध्या का उद्धार, वनमिलन और प्रेमराज्य तीन कथाकाव्य इसमें संगृहीत हैं। 

  • झरना –

महाकवि जयशंकर प्रसाद की 1918 में प्रकाशित इस रचना में  छायावादी शैली में रचित कविताएँ इसमें संगृहीत की गई हैं।

  • कानन कुसुम-

1918 में प्रकाशित कानन कुसुम  खड़ीबोली की कविताओं का प्रथम संग्रह है।

  • महाराणा का महत्त्व – 

1914 ई. में ‘इन्दु’ में प्रकाशित हुआ था। यह भी ‘चित्राधार’ में संकलित था, लेकिन 1928 ई. में इसका स्वतन्त्र प्रकाशन हुआ। इसमें महाराणा प्रताप की कथा है।

जयशंकर प्रसाद जी की रचनाएँ – Jaishankar Prasad ki Kavita in Hindi

  • चित्राधार
  • आह ! वेदना मिली विदाई
  • बीती विभावरी जाग री
  • दो बूँदें
  • प्रयाणगीत
  • तुम कनक किरन
  • भारत महिमा
  • अरुण यह मधुमय देश हमारा
  • आत्‍मकथ्‍य
  • सब जीवन बीता जाता है
  • हिमाद्रि तुंग शृंग से

जयशंकर प्रसाद का कहानी संग्रह  – Jaishankar Prasad Stories in Hindi

छाया, आकाशदीप, अंधी, इंद्रजाल, प्रतिध्वनी।

जयशंकर प्रसाद के उपन्यास – Jaishankar Prasad ki kahaniya

कंकाल, तितली, इरावती

जयशंकर प्रसाद के नाटक  – Jaishankar Prasad ke Natak in Hindi

सज्जन, प्रायश्चित, राज्यश्री, कल्याणी परिणय, कामना, जन्मेजय का नागयज्ञ, विशाख, स्कंदगुप्त, चन्द्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, एक घूंट, करुणालय, अज्ञातशत्रु, जनमेजय  का नागयज्ञ, कामना।

जयशंकर प्रसाद की भाषा शैली – Jaishankar Prasad ki Bhasha Shaili

हिन्दी साहित्य के महान कवि और छायावादी युग प्रवर्तक जयशंकर प्रसाद जी ने अपनी रचनाएं, काव्य संग्रह, नाटक और निबंध लेखन में निम्नलिखित शैलियों का इस्तेमाल किया है –

1.भावात्मक शैली

हिन्दी के प्रख्यात कवि जयशंकर प्रसाद जी की रचना प्रक्रिया नाटक से काव्य लेखन की तरफ उन्मुख हुई है। इसलिए नाटक संयोजन पात्र योजना, भावात्मक, मनोभावों की अभिव्यक्ति भावात्मक शैली में हुई है।

2.चित्रात्मक शैली –

प्रसाद जी ने जहां वस्तुओं, स्थानों और व्यक्तियों के शब्द चित्र में उपस्थित किए हैं वहां उनकी शैली चित्रात्मक हो गई है।

3.अलंकारिक शैली-

हृदय की प्रधानता के कारण महाकवि जयशंकर प्रसाद जी के गद्य में भी अलंकारों का सही इस्तेमाल मिलता है जिसमें अलंकारिक रूप मिलते हैं।

4.संवाद शैली –

प्रसाद के उपन्यास कहानी और नाटकों में संवाद शैली का इस्तेमाल पात्र अनुकूल किया है।

5.वर्णनात्मक शैली –

विषय वस्तु का प्रतिपादन घटनाओं और वस्तुओं के चित्र में वर्णनात्मक शैली का इस्तेमाल मिलता है।

जयशंकर प्रसाद की मृत्यु – Jaishankar Prasad Death

हिंदी साहित्य के महान लेखक जयशंकर प्रसाद अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में टीबी की बीमारी से पीड़ित हो गए थे। जिससे वह लगातार कमजोर होते चले गए। हालांकि इस दौरान उन्होंने अपनी रचनाएं लिखना नहीं छोड़ा, इन दिनों उन्होंने अपने जीवन की सबसे प्रख्यात रचना “कामायनी” को लिखा. जिसे  हिंदी साहित्य की अमर कृति भी माना जाता है।

आपको बता दें कि उनकी रचना कामायनी में उनकी जिंदगी से जुड़े हर भाव दुःख, सुख, वैराग सभी शामिल थे. जो कि मानवता की हर अनुभूति का एहसास करवाते हैं।

15 नवम्बर 1937 के दिन जयशंकर प्रसाद ने अपनी जिंदगी की आखरी सांसे ली और इस तरह हिन्दी साहित्य का एक सितारा हमेशा-हमेशा के लिए सो गया। आपको यह भी बता दें कि वे अपने जीवन के आखिरी क्षणों  में अपनी एक रचना इरावती पर काम कर रहे थे जो कि अधूरी ही रह गई।

इस तरह छायावादी युग के महान लेखक जयशंकर प्रसाद जी ने हिन्दी साहित्य में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके द्धारा लिखे गए तितली, कंकाल और इरावती जैसे उपन्यास और आकाशदीप, मधुआ और पुरस्कार जैसी कहानियाँ उनके गद्य लेखन की अपूर्व ऊँचाइयाँ हैं। 

महज 48 साल के अल्प जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध आदि लिखकर उन्होंने हिन्दी साहित्य को एक नई दिशा प्रदान की और हिन्दी साहित्य का संवार सजाया। इसके अलावा अपने नाटकों के माध्यम से वे भारतीय इतिहास के गौरवपूर्ण चरित्रों को भी सामने लाते रहे हैं।

इस तरह कथा साहित्य के क्षेत्र में उनकी देन अति महत्वपूर्ण है, जिन्हें युगो-युगांतर याद रखा जाएगा। उनकी रचनाओं को पाठक आज भी उतने से उत्सुकता से पढ़ते हैं, इस तरह अपनी खूबसूरत कृतियों के द्धारा वे पाठकों के दिल में आज भी जीवंत हैं।

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4 thoughts on “महान कवी जयशंकर प्रसाद की जीवनी”

  1. Agar Kisi ko bhi jai shankar Prasad ji ki mother ka naam pata ho to wo plz batane ki kripa karega.

  2. जयशंकर प्रसाद जी के जीवनी और उनकी रचनाओं के बारेमें जानकारी देने के लिये बहोत धन्यवाद् , हिन्दी साहित्य में रूचि रखने वाले लोगों को आपका ये लेख काफी फायदेमंद होंगा उन्हें जरुर पसंद आयेंगा

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