Kabir Ke Dohe – संत कबीर दास के दोहे अर्थ सहित

Kabir Ke Dohe

कबीर दास जी हिंदी साहित्य के महिमामण्डित व्यक्तित्व होने के साथ-साथ एक महान क्रांतिकारी संत, एक महान विचारक और समाज सुधारक भी थे। जिन्होंने अपने सकारात्मक विचारों से करीब 800 दोहों में जीवन के कई पक्षों पर अपने अनुभवों का जीवंत वर्णन किया है।

सभी धर्मों, पंथों, वर्गों में प्रचलित कुरीतियों पर उन्होंने मर्मस्पर्शी प्रहार किया है। इसके साथ ही उन्होंने धर्म के वास्तविक स्वरुप को भी उजागर किया हैं। हिन्दी साहित्य में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता, उनकी रचनाएं और दोहे बहुत प्रसिद्ध हैं।

आपको बता दें कि महान संत कबीर दास जी अनपढ़ थे लेकिन कबीर ने पूरी दुनिया को अपने जीवन के अनुभव से वो ज्ञान दिया जिस पर अगर कोई मनुष्य अमल कर ले तो इंसान का जीवन बदल सकता है। कबीर जी के दोहे  को पढ़कर इंसान में सकारात्मकता आती है और प्रेरणात्मक विचार उत्पन्न होते हैं। आइए जानते हैं कबीर दास जी के दोहों – Kabir Ke Dohe के बारे में –

संत कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित – Kabir Ke Dohe in Hindi with meaning

Jin Khoja Tin Paiyan - Kabir Doha
Jin Khoja Tin Paiyan – Kabir ke Dohe

संत कबीर दोहा नंबर 1 – जिन खोजा तिन पाइया (Jin Khoja Tin Paiyan)

वर्तमान समाज में कई ऐसे लोग हैं जो सफलता तो हासिल करना चाहते हैं लेकिन इसके लिए प्रयास ही नहीं करते या फिर उन्हें लक्ष्य को नहीं पा पाने और असफल हो जाना का डर रहता है। ऐसे लोगों के लिए महान संत कबीर दास ने अपने इस दोहे में बड़ी शिक्षा दी है –

दोहा-

“जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ, मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।”

अर्थ-

जीवन में जो लोग हमेशा प्रयास करते हैं वो उन्हें जो चाहे वो पा लेते हैं जैसे कोई गोताखोर गहरे पानी में जाता है तो कुछ न कुछ पा ही लेता हैं। लेकिन कुछ लोग गहरे पानी में डूबने के डर से यानी असफल होने के डर से कुछ करते ही नहीं और किनारे पर ही बैठे रहते हैं।

क्या सीख मिलती है-

महान संत कबीर दास जी के इस दोहे से हमें सीख मिलती हैं तो हमें  अपने लक्ष्य को पाने के लिए लगातार प्रयास करते रहना चाहिए, क्योंकि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती और एक दिन वे सफल जरूर होते हैं।

संत कबीर दोहा नंबर 2 – कहैं कबीर देय तू

आज के जमाने में कई लोग ऐसे हैं जिनके पास सब कुछ होने के बाद भी कुछ दान नहीं करते या फिर लोगों की सहायता नहीं करते और कई लोगों में परोपकार की भावना ही नही है, उन लोगों के लिए महान संत कबीरदास जी ने इस दोहे में  बड़ी शिक्षा दी है –

दोहा-

“कहैं कबीर देय तू, जब लग तेरी देह। देह खेह होय जायगी, कौन कहेगा देह।”

हिन्दी अर्थ-

कबीर दास जी कहते हैं जब तक देह है तू दोनों हाथों से दान किए जा। जब देह से प्राण निकल जाएगा। तब न तो यह सुंदर देह बचेगी और न ही तू फिर तेरी देह मिट्टी की मिट्टी में मिल जाएगी और फिर तेरी देह को देह न कहकर शव कहलाएगा।

क्या सीख मिलती है-

कबीर दास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें गरीबों पर और जरूरतमंद लोगों की अपने जीवन में मद्द करते रहना चाहिए। इसका फल भी अच्छा होता है।

संत कबीर दोहा नंबर 3 – या दुनिया दो रोज की

आज के समय में कई लोग मायारूपी संसार के मोह में बंधे रहते हैं, या फिर पैसा कमाने की होड़ में वे बाकी चीजों को महत्व ही नहीं देते हैं। उन लोगों के लिए कबीर दास जी का यह दोहा काफी शिक्षा देने वाला है।

दोहा-

“या दुनिया दो रोज की, मत कर यासो हेत। गुरु चरनन चित लाइये, जो पुराण सुख हेत।”

अर्थ-

इस संसार का झमेला दो दिन का है अतः इससे मोह सम्बन्ध न जोड़ो। सद्गुरु के चरणों में मन लगाओ, जो पूर्ण सुखज देने वाले हैं।

क्या सीख मिलती है-

कबीर दास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें मायारुपी संसार से मोह नहीं करना चाहिए बल्कि अपना ध्यान गुरु की वंदना में लगाना चाहिए।

Aisi vani boliye, man ka aapa khoye. - Kabir Das Doha
Aisi vani boliye, man ka aapa khoye. – Kabir Das Doha

संत कबीर दोहा नंबर 4 – ऐसी बानी बोलिए (Aisi Vani Boliye)

आज के समय में अक्सर लोग अपनी कड़वी भाषा से दूसरे का मन दुखाते हैं या फिर ऐसे बोल बोलते हैं जो नकारात्मकता फैलाती है ऐसे लोगों के लिए कबीर दास जी का यह दोहा शिक्षाप्रद है –

दोहा-

“ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करै, आपौ शीतल होय।”

हिन्दी अर्थ-

मन के अहंकार को मिटाकर, ऐसे मीठे और नम्र वचन बोलो, जिससे दुसरे लोग सुखी हों और स्वयं भी सुखी हो।

क्या सीख मिलती है-

कबीरदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपने घमंड में नहीं रहना चाहिए और अक्सर दूसरों से मीठा ही बोलना चाहिए, जिससे दूसरे को खुशी मिल सके और सकारात्मकता फैल सके।

संत कबीर दोहा नंबर 5 – धर्म किये धन ना घटे (Dharm Kiye Dhan na Ghate)

समाज में कई ऐसे चतुर मनुष्य हैं तो यह सोचते हैं कि वे अगर गरीबों की मद्द के लिए दान-पुण्य करेंगे तो उनके पास धन कम बचेगा या फिर वह सोचते हैं कि दान-पुण्य से अच्छा है उन पैसों का इस्तेमाल बिजनेस में करो, ऐसी सोच वालों के लिए कबीरदास जी का यह दोहा काफी शिक्षा देने वाला है –

दोहा-

“धर्म किये धन ना घटे, नदी न घट्ट नीर। अपनी आखों देखिले, यों कथि कहहिं कबीर।”

अर्थ-

कबीर दास जी कहते हैं कि धर्म (परोपकार, दान सेवा) करने से धन नहीं घटना, देखो नदी सदैव बहती रहती है, परन्तु उसका जल घटता नहीं। धर्म करके स्वयं देख लो।

क्या सीख मिलती है-

महाकवि कबीरदास जी के दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें हमेशा अपने जीवन में दूसरी की मद्द के लिए तत्पर रहना चाहिए और दान-पुण्य करते रहना चाहिए।

संत कबीर दोहा नंबर 6 – कहते को कही जान दे

आज के समय में कई ऐसे लोग मिल जाएंगे जो किसी  न किसी बात को लेकर अक्सर दूसरे पर आरोप लगाते हैं या फिर अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं ऐसे लोगों के लिए कबीर दास जी का यह दोहा काफी शिक्षा देने योग्य हैं-

दोहा-

“कहते को कही जान दे, गुरु की सीख तू लेय। साकट जन औश्वान को, फेरि जवाब न देय।”

अर्थ-

उल्टी-पल्टी बात बकने वाले को बकते जाने दो, तू गुरु की ही शिक्षा धारण कर। साकट (दुष्टों)तथा कुत्तों को उलट कर उत्तर न दो।

क्या सीख मिलती है-

महान विचारक कबीरदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमसे अगर कोई बुरे वचन बोल रहा है तो उसे नजरअंदाज कर देना चाहिए और अपने मुख से कभी बुरे वचनों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए  और गुरुओं से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए।

संत कबीर दोहा नंबर 7 – कबीर तहाँ न जाइये (Kabira tahan na jaiye)

समाज में कई ऐसे लोग हैं जहां उनको महत्व नहीं मिलता लेकिन फिर भी वह मुंह उठाकर चले जाते हैं उन लोगों के लिए कबीरदास जी का यह दोहा काफी सीख देने वाला है –

दोहा-

“कबीर तहाँ न जाइये, जहाँ जो कुल को हेत। साधुपनो जाने नहीं, नाम बाप को लेत।”

अर्थ-

गुरु कबीर साधुओं से कहते हैं कि वहाँ पर मत जाओ, जहाँ पर पूर्व के कुल-कुटुम्ब का सम्बन्ध हो। क्योंकि वे लोग आपकी साधुता के महत्व को नहीं जानेंगे, केवल शारीरिक पिता का नाम लेंगे ‘अमुक का लड़का आया है।

क्या सीख मिलती है-

परिवार वालों को कभी आपके गुणों का महत्व नहीं होता है। इसलिए साधुओं को अपने महत्व को परिवार वालों के सामने नहीं बताना चाहिए।

संत कबीर दोहा नंबर 8 – जैसा भोजन खाइये (Jaisa Bhojan Kijiye)

समाज में कई ऐसे लोग हैं जो गलत संगत में पढ़कर खुद का ही नुकसान कर बैठते हैं, या फिर बहकावे में आकर अपने ही कुल का नाश कर देते हैं। उन लोगो के लिए कबीर दास जी ने इस दोहे में बड़ी सीख दी है –

दोहा-

“जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय। जैसा पानी पीजिये, तैसी बानी सोय।”

अर्थ-

‘आहारशुध्दी:’ जैसे खाय अन्न, वैसे बने मन्न लोक प्रचलित कहावत है और मनुष्य जैसी संगत करके जैसे उपदेश पायेगा, वैसे ही स्वयं बात करेगा। अतएव आहाविहार एवं संगत ठीक रखो।

क्या सीख मिलती है-

कबीर दास जी के इस दोहे से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें सदैव अच्छे लोगों की संगत करनी चाहिए। इससे हमारे अंदर सकारात्मक ऊर्जा पैदा होती है और अपने लक्ष्यों को पाने में सफलता हासिल होती है।

संत कबीर दोहा नंबर 9 – कबीर तहाँ न जाइये

घमंडी लोगों के यहां जाने वालें के लिए कबीर दास जी ने निम्नलिखित दोहे में शिक्षा दी है –

दोहा-

“कबीर तहाँ न जाइये, जहाँ सिध्द को गाँव। स्वामी कहै न बैठना, फिर-फिर पूछै नाँव।”

अर्थ-

अपने को सर्वोपरि मानने वाले अभिमानी सिध्दों के स्थान पर भी मत जाओ। क्योंकि स्वामीजी ठीक से बैठने तक की बात नहीं कहेंगे, बारम्बार नाम पूछते रहेंगे।

क्या सीख मिलती है-

हमें ऐसे घमंडी लोगों के घर जाने से बचना चाहिए जहां पर सम्मान नहीं मिलता है। यहां तक कि वे बार-बार आपके नाम के बारे में ही पूछते रहते हैं।

संत कबीर दोहा नंबर 10 – इष्ट मिले अरु मन मिले

आज की दिखावे की दुनिया में कई लोग ऐसे हैं, जिनके आंतरिक मन नही मिलते हैं लेकिन सिर्फ दिखावे के लिए वे, एक-दूसरे के खास बने रहते हैं उन लोगों के लिए कबीर दास जी ने नीचे लिखे गए दोहे में बड़ी सीख दी है –

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दोहा-

“इष्ट मिले अरु मन मिले, मिले सकल रस रीति। कहैं कबीर तहँ जाइये, यह सन्तन की प्रीति।”

अर्थ-

उपास्य, उपासना-पध्दति, सम्पूर्ण रीति-रिवाज और मन जहां पर मिले, वहीँ पर जाना सन्तों को प्रियकर होना चाहिए।

क्या सीख मिलती है-

कबीरदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमारे जहां दिल मिले और मन मिले, उन्हीं से दोस्ती रखनी चाहिए। सिर्फ दिखावे लिए ही मित्र नहीं बनना चाहिए, जो मन को अच्छा लगे उनसे ही दोस्ती करनी चाहिए।

अगले पेज पर और भी दोहे हैं…

54 COMMENTS

  1. Kabir ji ne apne doho me jyadatar yahi kaha he ki Guru ki baat mano, guru koi mamuli insan nahi hota bhagwan se bade hote he, ye sabko pata he, lekin aaj kal itne baba log guru banke bethe sachhe ko pahchanne ka ek hi sadhan he Geeta ji me jo guru ki pahchan batai he wo kispe fit bethti he.
    Geeta adyay 15 slok 1 se 4 jarur dekhe or Sant Rampal Ji Maharaj se tulna kare

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