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संत कबीर दास के दोहे अर्थ सहित – Sant Kabir Ke Dohe

संत कबीर दोहा– Kabir ke Dohe

आज के समय में जो लोग अपने गुरुओं की कदर नहीं करते और अपने गुरुओं को नाराज करते हैं ऐसे लोगों के लिए कवि ने इस दोहे के माध्यम से बड़ी सीख दी है।

दोहा–

‘हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर ॥’

दोहे का अर्थ-

इस दोहे के माध्यम से कवि कबीरदास जी ने कहा है कि भगवान के रूठने पर तो गुरू की शरण रक्षा कर सकती है लेकिन गुरू के रूठने पर कहीं भी शरण मिलना सम्भव नहीं है।

जिसे ब्राह्मणों ने आचार्य, बौद्धों ने कल्याणमित्र, जैनों ने तीर्थंकर और मुनि, नाथों तथा वैष्णव संतों और बौद्ध सिद्धों ने उपास्य सद्गुरु कहा है उस श्री गुरू से उपनिषद् की तीनों अग्नियाँ भी थर-थर काँपती हैं। त्रोलोक्यपति भी गुरू का गुणगान करते है। ऐसे गुरू के रूठने पर कहीं भी ठौर नहीं।

क्या सीख मिलती है-

इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें सदैव अपने गुरु की आज्ञा का पालन करना चाहिए और हमेशा वो काम करना चाहिए जो गुरु को अच्छा लगे क्योंकि अगर एक बार गुरु नाराज हो जाते हैं तो उस मनुष्य का जीवन बेकार हो जाता है क्योंकि फिर उसे कोई भी नहीं पूछता है।

संत कबीर दोहा– Kabir ke Dohe

वर्तमान परिवेश में तो अध्यात्मिक गुरु का मिलना या मिलने के बाद भी उन्हें पहचानना हमारे बस की बात नहीं है इसलिए वर्तमान में तो गुरु और गोविंद में से किसी एक को ज्यादा और कम महत्व नहीं दिया जा सकता है। फिलहाल संत कबीर दास जी ने गुरु के महत्व का वर्णन करते हुए गुरु को ही सर्वोपरि बताया है –

दोहा–

गुरू गोविन्द दोऊ खङे का के लागु पाँव।

बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो बताय।।

दोहे का अर्थ-

इस दोहे में संत कबीरदास जी कहते हैं कि गुरू और गोबिंद अर्थात भगवान दोनों एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए – गुरू को अथवा गोबिन्द को ?

कवि कहते हैं कि ऐसी स्थिति में गुरू के श्रीचरणों में शीश झुकाना उत्तम है क्योंकि गुरु ने ही भगवान तक जाने का रास्ता बताया है अर्थात गुरु की कृपा से ही गोविंद के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

क्या सीख मिलती है – कवि के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि दुनिया में सबसे पहले हमें अपने गुरु के सामने अपना सिर झुकाना चाहिए अर्थात इनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए क्योंकि गुरु ने ही भगवान तक पहुंचने का रास्ता बताया है।

संत कबीर दोहा – Kabir ke Dohas

जो लोग गुरुओं का आज्ञा का पालन नहीं करते और उनकी हर बात को नजरअंदाज करते हैं ऐसे लोगों के लिए कबीरदास ने इस दोहे में बड़ी सीख दी है –

दोहा–

गुरु को सिर राखिये,

चलिये आज्ञा माहिं।

कहैं कबीर ता दास को,

तीन लोकों भय नाहिं।।

दोहे का अर्थ-

इस दोहे में कबीरदास जी ने कहा है कि गुरु को अपना सिर मुकुट मानकर, उसकी आज्ञा मैं चलना चाहिए। जो लोग ऐसा करते हैं उनके लिए कवि कह रहे हैं कि ऐसे  शिष्यों को अथवा सेवक को तीनों लोकों से कोई डर नही हैं। अर्थात वह हमेशा ही सही मार्ग पर चलेगा और अपनी जिंदगी में तरक्की हासिल करेगा।

क्या सीख मिलती है-

कबीरदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपने गुरुओं के कहने के आधार पर चलना चाहिए क्योंकि गुरु हमेशा अपने शिष्यों को सही मार्ग दिखाता है और उनके सफल जीवन के लिए निरंतर प्रयासरत रहता है।

संत कबीर दोहा – Kabir ke Doha

इस दोहे में कबीरदास जी ने उस लोगों को बड़ी सीख दी है जो लोग गुरु का ज्ञान नहीं लेते हैं और इस मायारूपी संसार में जकड़े रहते हैं।

दोहा –

गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरू बिन मिलै न मोष।

गुरू बिन लखै न सत्य को गुरू बिन मिटै न दोष।।

दोहे का अर्थ-

इस दोहे में कबीर दास जी कहते हैं – संसारिक प्राणियों। बिना गुरू के ज्ञान का मिलना असम्भव है। तब तक मनुष्य अज्ञान रूपी अंधकार में भटकता हुआ मायारूपी सांसारिक बन्धनों मे जकड़ा रहता है जब तक कि गुरू की कृपा प्राप्त नहीं होती। मोक्ष रूपी मार्ग दिखलाने वाले गुरू हैं। बिना गुरू के सत्य एवं असत्य का ज्ञान नहीं होता। उचित और अनुचित के भेद का ज्ञान नहीं होता फिर मोक्ष कैसे प्राप्त होगा? अतः गुरू की शरण में जाओ। गुरू ही सच्ची राह दिखाएंगे।

क्या सीख मिलती है-

इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें गुरुओं के पास ज्ञान प्राप्त करने के लिए जाना चाहिए क्योंकि गुरु के बिना सत्य और असत्य की पहचान करना मुश्किल है क्योंकि गुरु ही हमें सच्चाई और सफलता के मार्ग पर चलना सिखाता है।

कबीर की साखियाँ – Kabir ki Sakhiyan

इस दोहे में कबीर दास जी ने गुरु की तुलना चन्द्रमा से की है –

दोहा–

गुरु मूरति गति चन्द्रमा,

सेवक नैन चकोर।

आठ पहर निरखत रहे,

गुरु मूरति की ओर।।

दोहे का अर्थ-

इस दोहे में कबीरदास जी कहते हैं कि गुरु की मूर्ति  चन्द्रमा के समान है और सेवक के नेत्र चकोर के सामान हैं। अर्थात आठो पहर गुरु है – मूर्ति की ओर ही देखते रहो।

क्या सीख मिलती है-

इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपने गुरुओं का आदर करना चाहिए और उनके दिए ज्ञान का अनुसरण करना चाहिए तभी हमारे जीवन का उद्धार संभव है।

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