भारतीयों की आस्था का प्रतीक मानसरोवर यात्रा….

Kailash Mansarovar Yatra

भारतीय संस्कृति में आस्था का क्या महत्व है ये हम सभी जानते है। और यही वजह है कि भारतीयों की यही आस्था उन्हें सीमा पर जाने के लिए भी प्रेरित कर देती है। ऐसा इसलिए क्योंकि जो भाग आज हमारे पड़ोसी देशों का हिस्सा है वो कभी अखण्ड भारत का हिस्सा हुआ करते थे। इन्ही में से एक तिब्बत भी है जो भारत का हिस्सा था। और आज चीन के आधीन है।

तिब्बत की पहाड़ियों में भारतीयों की आस्था का प्रतीक मानी जाने वाली मानसरोवर झील है। इस झील के उत्तर में कैलाश पर्वत स्थित है जिसे भगवान शिव का निवास स्थल माना जाता है। इस झील की ऊंचाई समुद्र तल से 4556 मीटर है। यानी की मानसरोवर झील तक पहुंचना किसी के लिए भी आसान नहीं है लेकिन फिर भी हर साल हजारों भारतीय श्रद्धालु मानसरोवर यात्रा – Kailash Mansarovar Yatra पर जाते है। पर ऐसा क्यों है चलिए आपको बताते है।

Kailash Mansarovar Yatra
Kailash Mansarovar Yatra

भारतीयों की आस्था का प्रतीक मानसरोवर यात्रा – Kailash Mansarovar Yatra

मानसरोवर यात्रा पर जाने की इच्छा तो हर भारतीय श्रद्धालु के मन में है लेकिन यहां जाने का मौका नसीब वालो को ही मिलता है। क्योंकि मानसरोवर यात्रा चीन के आधीन क्षेत्र तिब्बत में है। जहां जाने के ले चीन की अनमुति लेनी पड़ती है यही कारण है कि ये एकलौती धार्मिक यात्रा है जिसे भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित किया जाता है।

भारत के अलावा चीन का विदेश मंत्रालय भी इस धार्मिक यात्रा को आयोजित करता है। और मानसरोवर यात्रा के लिए Tourist Company नए नए पकेज – Kailash Mansarovar Yatra Packages तैयार करती हैं। और भारत की टुरिस्ट कंपनीया भी मानसरोवर यात्रा का टूर पकेज – Kailash Mansarovar Tour Package भी आपको बनाकर देती हैं, ताकि आपकी मानसरोवर यात्रा और आसान हो जाएँ।

मानसरोवर यात्रा के लिए इस यात्रा के लिए श्रद्धालु की उम्र कम से कम 18 साल और अधिकतम 70 साल होनी चाहिए। इसके अलावा किसी बिमारी से ग्रस्त लोगों को इस यात्रा में जाने की अनुमति नहीं दी जाती है। इस यात्रा पर जाने के लिए हर साल लाखों श्रद्धालु रजिस्ट्रेशन कराते है।

लेकिन इनमें से कुछ ही लोगों को लकी ड्रा द्वारा चुनकर इस यात्रा पर भेजा जाता है। मानसरोवर की यात्रा पर कम से कम एक श्रद्धालु पर डेढ़ लाख का खर्च आता है। मानसरोवर यात्रा के लिए भारत से दो रास्ते है पहला रास्ता उत्तराखंड के लिपुलेख से होते हुए और दूसरा सिक्किम के नाथुला दर्रे से होते हुए जाता है। मानसरोवर यात्रा हेलीकॉप्टर – Kailash Mansarovar Yatra by Helicopter से भी आप पूरी कर सकते हो।

हालांकि पिछले कुछ सालो में डोकलाम विवाद के चलते नाथुला दर्रे से यात्रा बंद कर दी गई थी। लेकिन इस साल इस रास्ते को फिर से खोल दिया गया है।  शायद इसलिए क्योंकि भारतीयों की आस्था का ये स्थान कहीं ना कही चीन के पर्यटन को भी बढ़ावा देता है। जिसे चीन खोना नहीं चाहता।

मानसरोवर झील में भारतीयों की आस्था – Mansarovar Lake

अगर हिंदु पौराणिक कथाओं की माने तो मानसरोवर झील हिदुंओ के देवता ब्रह्मा के मन में उत्पन्न हुई थी। जिस वजह से इसे मानसरोवर यानी मन का सरोवर कहा जाता है।

हालांकि हिंदु धर्म के अलावा बौद्ध, जैन और सिख धर्म की भी इसमें अपनी – अपनी अलग आस्था है। इस झील के किनारे भगवान शिव और सती का निवास माना जाता है। ऐसा इसलिए क्यों कि माना जाता है कि जब भगवान विष्णु ने माता सती के देह शरीर के अंगो को अलग किया था। तो माता सती का दयां हाथ यहां पर गिरा था। जिस वजह से ये शक्ति पीठों में से एक माना जाता है और यहां पर माता सती को पाषाण शिला के नाम से पूजा जाता है।

इस झील का पानी काफी पवित्र माना जाता है। जिसमें स्नान करने से मनुष्य के सभी रोग दूर हो जाते है। यानी आस्था के नजरिए से ही नहीं अगर आप विज्ञान की नजर से भी इस झील को देखें तो ये काफी महत्व रखती है क्योंकि इस झील का पानी इतना साफ है कि इसे त्वचा संबंधी सभी रोग ठीक हो जाते है।

वहीं मानसरोवर झील का संबंध उत्तराखंड के नैनीताल स्थित नैनीताल झील से भी है। कथाओं के अनुसार नैनीताल में पहले कोई झील नहीं हुआ करती थी जिस वजह से कुछ ऋषि जो नैनीताल में तप करने आए थे उन्होनें यहां पर गड्ढा खोदकर मानसरोवर झील से पानी लाकर इस खड्ढे को भरा था। बाद में इसी झील में माता सती की एक आँख गिरी थी इसलिए वो भी एक शक्तिपीठ है। और नैनीताल झील के नाम से मशूहर है।

मानसरोवर को दुनिया की सबसे खूबसूरत झीलों में से एक कहा जा सकता है सिर्फ इसलिए नहीं क्योंकि इससे करोड़ो भारतीयों की आस्था जुड़ी है बल्कि इसलिए भी क्योंकि मानसरोवर झील प्राकृतिक खूबूसूरती का एक ऐसा अनोखा तोहफा है जो दो देशों को आपस मे जोड़ता है।

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