पल्लिपुरम् किले का इतिहास | Pallipuram Fort History

पल्लिपुरम् किला – Pallipuram Fort

केरल का यह प्रसिद्ध पल्लिपुरम् किला काफी बड़ा किला है। बहुत सारे किले जमीन की सतह से बहुत बड़ी उचाई पर बनवाये जाते। मगर पल्लिपुरम् किले की सबसे गजब बात यह है की यह किला जमीन से काफी उचा नहीं।

यह किला जमीन से केवल 5 फीट की उचाई पर स्थित है। पल्लिपुरम् किले की एक और खास बात यह है की इस किले में एक बडासा कुवा भी बनवाया गया है। ऐसा कहा जाता है की इस कुवे का जल काफी ठंडा रहता है।

Pallipuram Fort

पल्लिपुरम् किले का इतिहास – Pallipuram Fort History

शुरुवात में पोर्तुगीज इस किले को पेरियार से अरबी समदु तक जाने आनेवाले जहाजो पर नजर रखने के लिए इस्तेमाल करते थे। पल्लिपुरम् किले के तहखाने में बारूद रखा जाता था। इस किले के नजदीक में लोगो के घर, चर्च, अस्पताल और अन्य महत्वपूर्ण इमारते भी पायी गयी है।

सन 1662 में डच ने इस पल्लिपुरम् किले पर हमला कर दिया था और किले को खुद के कब्जे में ले लिया था। पल्लिपुरम् किला काफी महत्वपूर्ण जगह पर स्थित होने के कारण अन्य शासनकर्ताओ की भी कड़ी नजर इस किले पर थी। मैसूर के बादशाह भी इस किले को डच से खरीदना चाहते थे लेकिन उनके बिच में ईस्ट इंडिया कंपनी की दखलंदाजी की वजह से किला ख़रीदा नहीं गया।

लेकिन इस किले को खरीदने की इच्छा यही ख़तम नहीं हुई। त्रावनकोर के राजा ने सन 1789 में कोत्ताप्पुरम किले को खरीदने के साथ साथ इस पल्लिपुरम् किले को भी खरीद लिया था।

मैसूर के बादशाह का राज्य ख़तम होने के कारण मालाबार का सारा इलाका इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी के कब्जे में चला गया था। समय के साथ साथ इस पल्लिपुरम् किले का महत्व भी कम होता गया और आखिरी में सेना ने भी इसमें रहना छोड़ दिया।

सन 1909 में इस किले के सामने त्रावनकोर सरकार का स्मारक भी बनवाया गया। सन 1964 में इस किले को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया और तब से पल्लिपुरम् का किला पुरातत्व विभाग के देखरेख में है।

कोची का यह किला विरासत की जगह होने की वजह से पूरी दुनिया के पर्यटक इसे देखने के लिए आते है। यह किला प्राचीन संस्कृति का प्रतिक है और यह इसके गौरवशाली इतिहास की याद दिलाता रहता है। इस किले को ‘अयिकोत्ता’ और ‘अलिकोत्ता’ नाम से भी जाना जाता है। इस किले को छे कोनो की संरचना में बनाया गया है।

पल्लिपुरम् किले के नाम के पीछे छिपी कहानी – Pallipuram Fort Story

पल्लिपुरम् किले का नाम इसके नजदीक में स्थित मंजुमाथ चर्च के नाम से रखा गया है। और इस चर्च को भी पोर्तुगीज ने ही बनवाया था। जिस समय यह चर्च बनाया जा रहा था उस वक्त पल्लिपुरम् का किला भी बन रहा था।

मलायलम में’ चर्च’ को ‘पल्ली’ बोलते है जिसकी वजह से इस किले को पल्लिपुरम् नाम दिया गया था।

यहाँ के चर्च के साथ एक और कहानी भी जुडी है। कहा जाता है की जब टीपू सुलतान ने कोची पर हमला कर दिया था तो उसने इस चर्च को ख़तम करने की पूरी कोशिश भी की थी।

लेकिन जब उसने हमला किया तो उस वक्त वहापर कोहरा छा गया जिसके कारण टीपू सुलतान चर्च को ठीक से देख नहीं पाया था और उसी कोहरे की वजह से चर्च छुप सा गया था।

पल्लिपुरम् किले की वास्तुकला – Pallipuram Fort Architecture

पल्लिपुरम् किले को छे कोनो के आकार में बनवाया गया है इसीलिए इस किले को ‘अयिकोत्ता’ या फिर ‘अलिकोत्ता’ नाम से भी जाना जाता है। यह किला जमीन से केवल 5 फीट की उचाई पर स्थित है। इस किले में पिने का पानी का कुवा भी है। इस किले के सभी दरवाजे, सरदल और प्रवेशद्वार मेहराबदार में बनाये हुए है।

पल्लिपुरम् किले की एक और खास बात यह है की इस किले में अलग अलग तरह की डिजाईन देखने को मिलती है। पल्लिपुरम् किले में एक तरफ़ पर्यटक चलता जाए तो वो किले की सतह पर रहता तो दूसरी और पर्यटक अगर उत्तर की दिशा में आगे जाए तो वो किले के तहखाने तक पहुच जाता है। एक समय में इस तहखाने में बारूद रखा जाता था।

ऐसा भी कहा जाता था की यहाँ के बंदरगाह में एक सुरंग थी जो सीधे कोदुन्गल्लुर के चेरामन मस्जिद तक पहुचती थी।

इस भव्य किले को बनवाने में लेटराइट, चुनम और लकड़ी का इस्तेमाल किया गया था। इस किले की सभी दीवारे बनाने में मोर्टार का इस्तेमाल किया गया था और इस किले के सभी दरवाजे ग्रेनाइट से बनाये गए है। लेकिन अब इस किले की सभी दीवारों पर छोटे मोटे पौधे नजर आते है।

पल्लिपुरम् किले तक कैसे पहुचे? – How to Reach Pallipuram Fort

सबसे नजदीक रेलवे स्टेशन: एर्नाकुलम जंक्शन यह से केवल 1 किमी की दुरी पर है। वहा से कोई भी जेटी नाव से विपिन द्वीप तक पंहुचा जा सकता है।

सबसे नजदीक हवाई अड्डा: कोचीन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा एर्नाकुलम से केवल 20 किमी की दुरी पर है और यहाँ से कोई भी पर्यटक विपिन द्वीप तक पहुच सकता है।

पल्लिपुरम् के इस किले को कब्जे में करने के लिए टीपू सुलतान ने भी हमले किये थे। मगर काफी कोशिश करने के बाद भी टीपू सुलतान इस किले को हासिल नहीं कर सका। व्यापार की दृष्टि से इस किले को इतिहास में काफी महत्व था।

इसी वजह से कई सारी राजा और बादशाहों की नजर इस ऐतिहासिक किले पर थी। इस किले में एक सुंरग भी थी। उस सुरंग का इस्तेमाल किसी महत्वपूर्ण काम के लिए ही किया जाता था। कुछ लोगो का कहना था की यह सुरंग किसी मस्जिद में जाने का रास्ता थी।

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