“वृक्ष माता” यानि सालूमरदा थीमक्का की कहानी जिन्हें मिला “पद्मश्री”

Saalumarada Thimmakka

पद्मश्री सम्मान के दौरान एक तस्वीरे वायरल होती है। इस तस्वीर में एक बूढी महिला राष्ट्रपति में माथे पर हाथ रखकर आशीर्वाद दे रही है। ये तस्वीर देखते ही देखते पूरी दुनिया में वायरल होने लगती है क्योकि ऐसी हिम्मत सबसे बस की बात नहीं। इस महिला के बारे में पता किया जाता है तो इनका नाम पता चलता है सालूमरदा थीमक्का (Saalumarada Thimmakka) जिन्हें “वृक्ष माता” के नाम से जाना जाता है। ये है इनकी कहानी-

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“वृक्ष माता” यानि सालूमरदा थीमक्का की कहानी जिन्हें मिला पद्मश्री – Saalumarada Thimmakka in Hindi

कर्णाटक से हैं वृक्षमाता:

सालूमदरा थीमक्का यानी की वृक्ष माता कर्णाटक की रहने वाली हैं। इन्होने अपने जीवन में कुल आठ हजार पेड़ लगाये हैं। इसमें चार सौ पेड़ बरगद के शामिल हैं। उन पेड़ों को लगाकर उनकी देखभाल करते हुए उन्हें बड़ा किया है और आज वो फल भी दे रहे है और प्राणवायु ओक्सिजन भी।

चार किलोमीटर के इलाके में लाइन में इन्होने इतने पेड़ लगाये हैं। उनके लिए इन्होने अपना जीवन समर्पित कर रखा है। थीमक्का सालूमदरा को अब तक कई सारे सम्मान मिल चुके हैं।

कैसे बनी वृक्षमाता:

इनके वृक्ष माता बनने की कहानी भी आसान नहीं है। इनकी शादी के कई साल बाद तक इनके घर कोई संतान नहीं हुई। इससे परेशान और मानसिक रूप से तंग आकर इन्होने आत्महत्या करने का विचार किया। ये उस समय उम्र के चौथे दशक में थी और बच्चे की उम्मीद अब पूरी तरह से छोड़ चुकी थीं।

लेकिन इन्होने कुछ और सोचा और ये फैसला कर लिया की अब वो पेड़ों को अपनी संतान बनाएगी और ऐसी हजारो संताने उत्पन्न करेगी। फिर क्या था शुरू कर दिए पेड़ लगाने और आज 107 साल की उम्र तक इन्होने आठ हजार पेड़ लगाये हैं। इनका नाम थीमक्का है जबकि इन्हें सालूमरदा की उपाधि मिली है। दरअसल सालूमरदा शब्द का अर्थ कन्नड़ भाषा में होता है “वृक्षों की पंक्ति”।

लगातार एक ही पंक्ति में कई सारे पेड़ लगाने के बाद इन्हें ये सम्मान मिला। 65 साल का ये सफ़र आज भी जारी है। इनके पति की मौत साल 1991 में हो गई थी लेकिन उसके बाद इनके अंदर और अधिक हिम्मत आ गई और इन्होने पेड़ लगाने शुरू कर दिए। इसके बाद इन्होने एक बेटा गोद लिया जिसका नाम इन्होने उमेश रखा है।

सम्मानों से भरा है घर:

ऐसा नहीं है की पहली बार थीमक्का को कोई सम्मान मिला है। हालाँकि पद्मश्री तो पहली बार ही है लेकिन इससे पहले भी उन्हें कई सारे अवार्ड मिल चुके हैं। इनका घर स्मृति चिन्हों और सम्मानों से भरा हुआ है। कर्णाटक सरकार ने इनके नाम से पर्यावरण की योजना भी चलाई हुई है।

लेकिन सरकार से अभी तक इन्हें कुछ ख़ास नहीं मिला यानी की आर्थिक सहयोग। अब भी ये वृद्धवस्था पेंशन से अपना गुजारा करतीं हैं। इन्हें पांच सौ रुपये मिलते है और उसी से इनका काम चलता है। बीती सरकारों ने इन्हें दो करोड़ रुपये नगद और जमीन देने का वादा किया था लेकिन आज तक वो बड़ा पूरा नहीं हुआ। इस बात से थीमक्का नाराज भी है।

पल बना ऐतिहासिक:

राष्ट्रपति भवन अपने प्रोटोकॉल के लिए मशहूर है। जब कोई वहां अवार्ड लेने जाता है तो उसे हजारो नियम समझाएं जाते हैं और सब फालो भी करते हैं। लेकिन एक बूढी महिला ने अपने बेटे जैसे राष्ट्रपति के माथे को छूकर उन्हें आशीर्वाद दिया तो प्रधानमंत्री समेत सभी बड़े नेता मुस्कुराते रह गए। वो पल ऐतिहासिक हो गया जो हमेशा हमेशा के लिए भारत में याद किया जाएगा।

अगर आपसे कोई पूछे की आपने जीवन में कितने पेड़ लगाये तो शायद आप कहेंगे की एक, दो या फिर दस। हो सकता है किसी ने हजार लगाये हो लेकिन इन्होने आठ हजार पेड़ लगाये हैं। उनकी देखभाल और मौसम के हिसाब से उन्हें बचाकर रखना भी इनकी जिम्मेदारी थी। ऐसे महान हस्ती को आज दुनिया सलाम कर रही है।

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"अपने बारे में ज्यादा कुछ बताने को है नहीं। एक इंजिनियर जिसने अपना पेशा बदल लिया और बन गया लेखक और पत्रकारिता की राह पकड़ ली। बाकी जब आप पढेगे तो खुद ही अंदाजा लग लेगे।"

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