थिरुथानी मुरुगन मंदिर | Thiruthani Murugan Temple

Thiruthani Murugan Temple – थिरुथानी मुरुगन मंदिर भारत के तमिलनाडु राज्य के थिरुत्तनी की पहाडियों में बना एक मंदिर है। साथ ही यह भगवान मुरुगन के छः पवित्र निवासस्थानो में से एक है। थिरुथनी चेन्नई से 87 किलोमीटर (54 मीटर) की दुरी पर स्थित है।
Thiruthani Murugan Temple

थिरुथानी मुरुगन मंदिर – Thiruthani Murugan Temple

दुसरे हिन्दू मंदिरों की तरह इस मंदिर का मूल भी पुरातनता में दफ़न हो गया है। इस मंदिर का उल्लेख संगम कालीन कार्यो में भी किया गया है। विजयनगर के शासको और स्थानिक सरदार और जमींदारो ने यहाँ पर शासन किया है। हाथी को ही भगवान मुरुगन का मुख्य पशु वाहन माना जाता है, जबकि मुरुगन का पशु वाहन मोर है। सफ़ेद हाथी को शक्तिशाली, हड़ताली और आतंकी जानवर भी माना जाता है। भगवान मुरुगन के शास्त्रों को दो ही जगहों पर बरकरार रखा गया है, जिनमे मुख्यतः तिरुत्तनी मुरुगन मंदिर और थिरुथानी मुरुगन मंदिर शामिल है।

किंवदंतियों के अनुसार देवताओ के राजा इंद्र ने अपनी पुत्री देइवयनै का विवाह स्कंद के साथ करवाया और दहेज़ के रूप में ऐरावत हाथी को भी भेज स्वरुप दे दिया। ऐरावत के जाते ही इंद्रा को महसूस हुआ की उनके धन और समृद्धि में गिरावट आ रही है। सुब्रमंयर ने इन्द्र को सलाह भी दी थी के वह उपहार स्वरुप दिए गये सफ़ेद हाथी को वापिस बुला ले लेकिन इंद्र ने उपहार स्वरुप दिए गये हाथी को पुनः मांगने से इंकार कर दिया।

थिरुथानी मुरुगन मंदिर का धार्मिक महत्व – Religious Importance of Thiruthani Murugan Temple:

पौराणिक महत्त्व होने के साथ-साथ संत अरुनागिरी ने भी इस पहाड़ी की सराहना की है और इसी स्थान को उन्हें देवताओ की पूजा करने के लिए चुना और साथ ही उनके अनुसार संतो के लिए तपस्या करने के लिए यह एक सर्वश्रेष्ट जगह है। इस पर्वत की तुलना उन्होंने शिवलोक से की है और उनके अनुसार यह पर्वत दुनिया की सबसे पवित्र जगहों में से एक है। माना जाता है की 200 साल पहले रहने वाले श्री मुथुस्वामी दिक्षितर को जब मंदिर की सीढियों पर भगवान मिले और उन्हें मंदिर का प्रसाद खिलाया तभी उन्हें यहाँ से प्रेरणा मिली और इसी घटना पर ही उन्होंने अपनी पहली कृती की रचना की है। मंदिर के शीर्ष को स्वर्ण ढंका गया है।

थिरुथानी मुरुगन मंदिर के उत्सव – Festivals of Thiruthani Murugan Temple:

हजारो लोगो को आकर्षित करने वाले मासिक कृत्तिकैस के अलावा यहाँ दो वार्षिक महोत्सव भी मनाए जाते है। जिनमे आदिकृत्तिकैस और 31 दिसम्बर को मनाया जाने वाले नववर्ष महोत्सव शामिल है। नाव का उत्सव आदि के माह में, ब्रह्मोत्सव मास माह में, इसी माह में आठवे दिन वल्लीकल्याणं और तमिल माह ऐप्पसी में स्कंद शक्ति उत्सव मनाया जाता है।

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