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तुलसीदास जी के दोहे हिंदी अर्थ सहित | Tulsidas Ke Dohe In Hindi

Tulsidas Ke Dohe

Tulsidas – तुलसीदास जी भारतीय और विश्व साहित्य में सबसे महान कवियों में गिने जाते थे। मुख्य रुप से उन्हें भक्ति काल के रामभक्ति शाखा के महान कवि के रूप में जाना जाता है। वह भगवान राम की भक्ति के लिए मशहूर थे और वे “रामचरितमानस” (Ramcharitmanas) महाकाव्य के लेखक के रूप में भी जाने जाते थे।

उन्होनें रामचरित मानस में भगवान राम का जीवन एक मर्यादा की डोर पर बांधा है। एक शानदार महाकाव्य के लेखक और कई लोकप्रिय कार्यों के प्रणेता तुलसीदास जी ने भी अपने दोहों और रचनाओं के माध्यम से लोगों को एक अलग राह दिखाई है।

यही नई उन्होंने करोड़ों लोगों को अपने उत्कृष्ट सोच और दूरदर्शी विचारों से नई ऊर्जा और सोच का अनुभव कराया है। जिन्हें अपनाकर लोग अपनी जिंदगी में कई बदलाव ला सकते हैं और जीवन जीने की कला सीख सकते हैं।

वहीं अगर आप भी अपने जीवन में कुछ करना चाहते हैं और सफलता हासिल करना चाहते हैं तो आप भी तुलसीदास जी के बेहद उम्दा ज्ञानवर्धक और जीवन को उत्कृष्ट बनाने वाले दोहे को पढ़कर सफलता हासिल कर सकते हैं।

हम आपको अपने इस लेख में महान कवि तुलसीदास के के सकारात्मक ऊर्जा से भरे और प्रेरणादायक दोहे जिसे “तुलसी दोहावली” – Tulsi Dohawali भी कहा जाता हैं उसके अर्थ समेत समझाएंगे। इसके साथ ही आपको यह भी बताएंगे कि हमें इन दोहें से क्या सीख मिलती है और वर्तमान में परिस्थतियो्ं में ये किस प्रकार शिक्षाप्रद हैं तो आइए जानते हैं तुलसीदास जी के दोहे – Tulsidas Ke Dohe के बारे में –

Tulsidas Ke Dohe In Hindi

तुलसीदास जी के दोहे हिंदी अर्थ सहित / Tulsidas Ke Dohe In Hindi

तुलसीदास जी का दोहा नंबर 1 – Tulsidas Ke Dohe 1

आज के समय में संसार में कई मनुष्य ऐसे भी हैं जो बेकसूर और निर्दोष लोगों को ठेस पहुंचाते हैं और जिनमें दयाभाव ही नहीं हैं। तो कई लोग ऐसे हैं जो अपने अभिमान में चूर होकर बुरे कामों को करते है, जिसकी वजह से कई लोगों को नुकसान पहुंचता है या फिर कई लोग तो दया करना ही नहीं जानते या फिर यूं कहें कि उनमें बचपन से ही दया का भाव नहीं पैदा किया जाता ऐसे स्वभाव वाले लोगों के लिए तुलसीदास जी ने निम्नलिखित दोहे में बड़ी शिक्षा दी है-

दोहा:

“दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान, तुलसी दया न छोडिये जब तक घट में प्राण।”

अर्थ:

तुलसीदास जी ने कहा की धर्म, दया भावना से उत्पन्न होती और अभिमान तो केवल पाप को ही जन्म देता हैं, मनुष्य के शरीर में जब तक प्राण हैं तब तक दया भावना कभी नहीं छोड़नी चाहिए।

क्या सीख मिलती है:

इस दोहे से हमें यह शिक्षा मिलती है कि, हमें हमेंशा लोगों की मद्द करनी चाहिए और सभी के प्रति दया का भाव रखना चाहिए और खुद पर कभी गुरुर नहीं करना चाहिए।

तुलसीदास जी का दोहा नंबर 2 – Tulsidas Ke Dohe 2

जो लोग मद्द के लिए आए लोगों का तिरस्कार करते हैं। उनके लिए तुलसीदास जी ने निम्नलिखित दोहे में बड़ी शिक्षा दी है –

दोहा:

“सरनागत कहूँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि, ते नर पावॅर पापमय तिन्हहि बिलोकति हानि।”

अर्थ:

जो इन्सान अपने अहित का अनुमान करके शरण में आये हुए का त्याग कर देते हैं वे क्षुद्र और पापमय होते हैं। दरअसल, उनको देखना भी उचित नहीं होता।

क्या सीख मिलती है –

तुलसीदास जी के इस दोहे से यह सीख मिलती है कि, हमें हमेशा मद्द के लिए आए लोगों की सहायता करनी चाहिए।

तुलसीदास जी का दोहा नंबर 3 – Tulsidas Ke Dohe 3

आजकल ज्यादातर युवा पीढ़ी अपने घमंड में इतने चूर है कि, मीठी बोली तो दूर सही से बात तक नहीं करते, या फिर कई लोग ऐसे भी हैं जो अपनी कड़वी बोली से दूसरे लोगों का दिल दुखाते हैं। जिसकी वजह से उन्हें कई बार इसका नुकसान भी उठाना पड़ता है। ऐसे लोगों के लिए महाकवि तुलसीदास जी ने यह दोहा लिखा है –

दोहा:

“तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ और, बसीकरण इक मंत्र हैं परिहरु बचन कठोर.”

अर्थ:

तुलसीदास जी कहते हैं कि मीठे वचन सब और सुख फैलाते हैं, किसी को भी वश में करने का ये एक मंत्र होते हैं इसलिए मानव ने कठोर वचन छोड़कर मीठे बोलने का प्रयास करे।

क्या सीख मिलती है:

महाकवि तुलसीदास जी के इस दोहे से हमें यही सीख मिलती है कि हमें हमेशा मीठी बोली
बोलनी चाहिए। कई बार मीठी बोली बोलने से बिगड़े काम भी बन जाते हैं। वहीं मीठी बोली हर किसी को अपनी तरफ मोहित करती है। इसलिए हमेशा कटु वचन बोलने से बचना चाहिए।

तुलसीदास जी का दोहा नंबर 4 – Tulsidas Ke Dohe 4

जो इंसान मंत्री, गुरु और वैद्य की  भाषा को नहीं समझते उनके लिए महाकवि तुलसीदास जी ने इस नीचे लिखे गए दोहे में बड़ी सीख दी है –

दोहा:

“सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस, राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास.”

अर्थ:

तुलसीदास जी कहते हैं की मंत्री वैद्य और गुरु, ये तीन यदि भय या लाभ की आशा से प्रिय बोलते हैं तो राज्य, शरीर एवं धर्म इन तीन का शीघ्र ही नाश हो जाता हैं।

क्या सीख मिलती है:

महाकवि तुलसीदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि मंत्री, गुरु और डॉक्टर की भाषा जल्द से जल्द समझ लेनी चाहिए नहीं तो भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

तुलसीदास जी का दोहा नंबर 5 – Tulsidas Ke Dohe 5

जो लोग आंतरिक और बाहरी  सुख चाहते हैं, उनके लिए तुलसीदास जी नीचे लिखे दोहे में कहा है कि –

दोहा:

“रम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार तुलसी भीतर बाहेर हूँ जौं चाहसि उजिआर।”

अर्थ:

मनुष्य यदी तुम भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहते हो तो मुखीरूपी द्वार की जिभरुपी देहलीज पर राम-नामरूपी मणिदीप को रखो।

क्या सीख मिलती है:

महाकवि तुलसीदास जी के इस दोहे से हमें यही सीख मिलती है कि, हमें राम का नाम जपते रहना चाहिए तभी हमें सुख की अनुभूति होती है।

तुलसीदास जी का दोहा नंबर 6 – Tulsidas Ke Dohe 6

आजकल समाज में कई ऐसे परिवार भी हैं, जिनमें परिवार के मुखिया को सही ज्ञान नहीं होने की वजह से उनके परिवार का बिखराव हो जाता है, या फिर वे परिवार के सभी लोगों को खुश नहीं रख पाते हैं, ऐसे लोगों के लिए महाकवि तुलसीदास जी ने यह दोहा लिखा है-

दोहा:

“मुखिया मुखु सो चाहिये खान पान कहूँ एक, पालड़ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक.”

अर्थ:

मुखिया मुख के समान होना चाहिए जो खाने पीने को तो अकेला हैं, लेकिन विवेकपूर्वक सभी अंगो का पालन-पोषण करता है।

क्या सीख मिलती है:

महाकवि तुलसीदास जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि – परिवार के मुखिया को विवेकपूर्ण तरीके से अपने परिवार का भरण-पोषण करना चाहिए और सभी का ध्यान रखना चाहिए, नहीं तो परिवार में बिखराव पैदा हो सकता है।

तुलसीदास जी का दोहा नंबर 7 – Tulsidas Ke Dohe 7

तुलसीदास जी ने नीचे लिखे गए दोहे में राम नाम के स्मरण करने की महत्वता का बखान किया है और उन लोगों को इस दोहे से सीख दी है जो राम का नाम नहीं लेते हैं अर्थात अपनी दुनिया में ही मग्न रहते हैं –

दोहा:

“नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। जो सिमरत भयो भाँग ते तुलसी तुलसीदास।”

अर्थ:

राम का नाम कल्पतरु (मनचाहा पदार्थ देनेवाला)और कल्याण का निवास (मुक्ति का घर) हैं, जिसको स्मरण करने से भांग सा ( (निकृष्ट ) तुलसीदास भी तुलसी के समान पवित्र हो गया।

क्या सीख मिलती है:

महान दार्शनिक कवि और भक्ति काल के महान संत के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि अगर हमें अपने चरित्र को सुधारना है और अपने जीवन में सफलता हासिल करनी है तो राम के नाम का जप करना चाहिए।

अगले पेज पर और भी दोहे हैं…

33 COMMENTS

  1. तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ और।
    बसीकरण इक मन्त्र हैं परिहरू बचन कठोर।।

  2. अनहोनी होनी नही, होनी होय तो होय
    पूरा दोहा और दोहा नंबर बताया जाय

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