“पानीपत का युद्ध” इस युद्ध से जुडी सारी बातें आपको पता होनी चाहियें!

First Battle of Panipat

आपने भारत में मुगलों की कई कहानियों ओर युद्धों के बारे में पड़ा है। मुगल भारत के मूल निवासी नहीं थे वो बाहर से आए थे जिन्होनों दिल्ली और उसके आसपास के इलाके को हथाया लिया था हालांकि इसके बाद मुगल भारतीय इतिहास का अहम हिस्सा बन गए।

क्योंकि मुगलों ने भारत पर काफी लंबे समय तक राज किया लेकिन क्या आप जानते है इसकी शुरुआत कहां से हुई यानी की मुगलों ने किस युद्ध में दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों को जीता था और अपने साम्राज्य की नींव रखी थी वो था पानीपत का युद्ध – First Battle of Panipat इस युद्ध से जुडी सारी बातें आपको पता होनी चाहियें इसलिए आज का ये लेख।

First Battle of Panipat
First Battle of Panipat

“पानीपत का युद्ध” इस युद्ध से जुडी सारी बातें आपको पता होनी चाहियें – First Battle of Panipat

First Battle of Panipat – पानीपत का युद्ध मुग़ल साम्राज्य का पहला शासक बाबर और दिल्ली के उस समय के सुल्तान इब्राहिम लोदी के बीच लड़ा गया था। माना जाता है कि इस युद्ध में बाबर की सेना इब्राहिम लोदी की सेना से काफी छोटी थी। बाबर के जहां 15 हजार सैनिक थे वहीं इब्राहिम लोदी के पास 1,30,000 सैनिक थे। लेकिन बाबर ने इस युद्ध में अपनी खास रणनीतियों का इस्तेमाल किया था।

बाबर ने पानीपत के युद्ध में तुलुगमा नीति जिसमें सैनिकों को युद्ध की रणनीति के हिसाब से ख़ड़ा किया जाता है वहीं दूसरी अराबा यानी सैनिकों को बचाने के लिए खास तरह की ढाल रणनीति का इस्तेमाल किया था। वहीं इब्राहिम लोदी के सैनिकों के बीच एकता के अभाव और फूट ने इब्राहिम लोदी को ये जंग हरा दी थी। ये जंग इब्राहिम लोदी और उसके सैनिकों की मौत के साथ खत्म हुई। और इस युद्ध के साथ ही दिल्ली सहित आसपास के सभी इलाकों पर बाबर ने अपना साम्राज्य स्थापित किया।

हालांकि अभी भी दिल्ली पर कई राजपूतों की नजर थी। ऐसा इसलिए क्योंकि आक्रमणकारियों से पहले दिल्ली पर राजपूतों का ही राज था। इसी कारण पानीपत युद्ध के अगले ही साल 17 मार्च 1527 को बाबर ने खानवा का युद्ध लड़ा जो मेवाड़ के राजा राणा सांगा और बाबर के बीच हुआ। इसमें राजपूतों की सेना बाबर से बड़ी थी।

लेकिन हमेशा की तरह बाबर की फूटनीति काम आ गई। कई तोमरों ने युद्ध के बीच ही राणा सांगा का साथ छोड़ दिया और राणा सांगा को घायल अवस्था में युद्ध छोड़ना पड़ा। इसके बाद दिल्ली पर किसी ओर की सत्ता पनपने की आशंका खत्म हो गई।

लेकिन बाबर ज्यादा लंबे समय तक दिल्ली पर शासन नहीं कर पाया क्यों कि 26 दिसम्बर साल 1530 को बाबर की मौत हो गई। कई लोगों का मानना है कि बाबर अपने बेटे हुमांयू की सेहत को लेकर काफी परेशान रहता था। और जब हुंमायू की तबीयत ज्यादा बिगड़ी तो उसने दुआ मांगी की उसके बेटे की बिमारी उसे मिल जाए और इसी के बाद उसकी मौत हो गई।

बाबर की मौत के बाद हुंमायु को उत्तराधिकारी बनाया गया। बाबर की इच्छा थी कि उसके शव को काबुल में दफनाया जाए। लेकिन से उस समय बाबर को आगरा में दफनाया गया था। बाबर की मौत के 9 साल बाद उनके शव को हुमायूं ने काबुल में दफनाया था।

बाबर दारा दिल्ली में मुगल वंश की स्थापना ने दिल्ली को एक नया रंग दिया। लेकिन कहीं ना कही दिल्ली के असल रंग को भी उसे छीना। खैर इतिहास में जो – जो घटनाएं हुई उसने भारत की संस्कृतिक विविधता को ओर भी दिलचस्प ओर खूबसूरत बनाया। जिसे नकारा नहीं जा सकता। इनमें से एक सीख शायद ये भी थी कि अगर राजपूतों में आपसी फूट न होती तो शायद दिल्ली को इतने आक्रमण न सहने पड़ते।

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