राम जन्म भूमि का इतिहास | Ram Janmabhoomi History

प्रभु श्रीराम को कौन नहीं जानता श्री राम भगवान विष्णु के 7 अवतार माने जाते है। प्रभु श्री राम का जहा जन्म हुआ उस स्थान को सभी हिन्दू राम जन्मभूमि – Ram Janmabhoomi नाम से जानते है।

Ram Janmabhoomi

राम जन्म भूमि का इतिहास – Ram Janmabhoomi History

रामायण ग्रंथ में ऐसा लिखा है की जिस स्थानपर अयोध्या (उत्तर प्रदेश) में बाबरी मस्जिद थी उसी स्थान पर प्रभु श्री राम का जन्म हुआ था। और उसी धारणा के अनुसार यह भी कहा जाता है की जिस जगह पर हिंदु मंदिर था उसे मुघलो ने गिरा दिया और उसी जगह पर मस्जिद बनवाई।

लेकिन कुछ लोगों का यह भी कहना है उस जगह पर राम मंदिर था इसका कोई सबूत भी नहीं है।

इसलिए बाबरी मस्जिद और राम मंदिर के स्थान और इतिहास पर राजनितिक, ऐतिहासिक और सामाजिक-धार्मिक विवाद रहे है। हिंदु धार्मिक संघटनाए दावा करती है की 10 वी-11 वी शताब्दी में अयोध्या में राम मंदिर बनवाया गया था।

लेकिन मुस्लिम धार्मिक समूहों का मानना है सन 1528 में मुग़ल साम्राज्य का पहला बादशाह बाबर का जनरल मीर बाकि ने मूसा अशिकन के मार्गदर्शन में रामकोट के उस जगह पर मस्जिद बनवाई, और उसने उस मस्जिद को बाबर के नाम पर से नाम दे दिया।

उसने वहापर दर्शाया है मस्जिद बाबर के हुकुम पर बनाई गई है या बाबर के सम्मान में बनाई गई है।

19 जनवरी 1885 को हिंदु महंत रघुबीर दास ने पहली बार इस मामले को फैजाबाद के न्यायाधीश पण्डित हरी किशन के सामने रखा था। उस मामले कहा गया था की मस्जिद के जगह पर मंदिर बनवाना चाहिए, क्यु को वो स्थान प्रभु श्री राम का जन्म स्थान है। वो इस मामले का पहला समय था जब यह विवाद नायालय पहुच गया था।

22 दिसंबर 1949 को प्रभु श्री राम और माता सीता की मुर्तिया पहली बार बाबरी मस्जिद में दिखाई दी। उसके बाद वक्फ बोर्ड ने दावा किया की वो जमीन उनकी है। उसके विरुद्ध हिन्दू लोगों ने भी मामला दर्ज कर दिया जिसकी वजह से सरकार को उस स्थान को ‘विवादित स्थान’ घोषित करना पड़ा और उस जगह को बंद करना पड़ा।

1984 को विश्व हिंदु परिषद् और बीजेपी ने धर्म संसंद में राम जनमभूमी मंदिर बनाने के लिए एक आन्दोलन की शुरुवात कर दी।

जब देश में राजीव गांधी की सरकार चल रही थी तब 11 फरवरी 1986 को फैजाबाद जिला न्यायाधीश ने फ़ैसला सुनाया की विवादित स्थान को हिंदु लोगों के लिए खुला किया जाये।

इसलिए 1989 में विश्व हिंदु परिषद् और अन्य हिंदु संस्थाओ ने मस्जिद से 192 फूट की दुरी पर मंदिर के निर्माण की शुरुवात करा दी थी। उसके अगले ही दिन बिहार के हरिजन और कामेश्वर चौपाल ने उस काम को आगे बढाया।

इसलिए 1992 में कुछ हिन्दू राष्ट्रवादी लोगों ने बाबरी मस्जिद को गिरा दिया और वहा पर एक नए मंदिर का निर्माण किया इस घटना के कारण पुरे देश में हिंसा का माहोल बन गया और सभी तरफ़ दंगे होने लगे। और तबसे वहापर पुरातात्विक खुदाई का काम शुरू हो गया। उस खुदाई में एक बात सबके सामने आई की वहापर मस्जिद के अवशेष के निचे मंदिर होने सबूत मिले। इसका मतलब मस्जिद से पहली ही वहापर मंदिर का अस्तित्व था।

इस विवाद को सुलझाने के लिए इस राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद मामले को अब सर्वोच्च नायालय में दाखिल किया गया।

जो विवाद पिछले 60 साल से चल रहा था उस पर 28 सितंबर 2010 को सर्वोच्च नायालय ने उच्च नायालय उसका फ़ैसला सुनाने की मंजूरी दे दी। इस हिसाब से 30 सितंबर 2010 को अलाहाबाद उच्च नायालय के विशेष पीठ ने अयोध्या की अमिन का दो तिहाई हिस्सा हिंदु पक्ष को और एक तिहाई हिसा वक्फ बोर्ड को देने का फ़ैसला सुनाया।

लेकिन दिसंबर 2010 में उच्च नायालय के इस फैसले की खिलाफ हिंदु महासभा और सुन्नी वक्फ बोर्ड सर्वोच्च नायालय में मांग की। उनका कहना था की वो फ़ैसला विश्वाश पे लिया गया था ना की किसी सबूत के आधार पर।

इस पर सर्वोच्च नायालय ने मई 2011 में उच्च नायालय के जमीन को तीन हिस्से में बाटने के फैसले पर रोक लगा दी और कहा की परिस्थिति जैसी है वैसी ही बनी रहेगी।

आगे 21 मार्च 2017 को सर्वोच्च नायालय ने कहा की अयोध्या में राम मंदिर बनाना एक ‘भावुक मुद्दा’ है। इसका अर्थ है की सर्वोच्च नायालय इस मामले को हल करने में जल्द जल्द से कोशिश करेगा।

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