वृन्द जी की जानकारी और दोहे अर्थ सहित | Vrind ke Dohe with Meaning

Vrind ke Dohe

हिन्दी साहित्य के रीतकालीन कवियों में वृन्द जी का महत्वपूर्ण स्थान है। वृन्द जी ने अपनी काव्य रचनाओं के माध्यम से लोगों के दिल में अपनी एक अलग छाप छोड़ी है।

वृन्द जी ने अपने इस दोहे के माध्यम से लोगों को जिंदगी जीने का तरीका सिखाया है कि मनुष्य को किस तरह से अपनी जिंदगी व्यतीत करनी चाहिए और किस तरह से मनुष्य का जीवन सुखमय होता है और इंसान खुशीपूर्वक किस तरह अपनी जिंदगी गुजार सकता है इस तरह की बातें वृन्द जी ने अपने दोहे के माध्यम से बताने की कोशिश की हैं।

Vrind Ke Dohe

वृन्द जी के दोहे – Vrind ke Dohe

वहीं वृन्द जी ने अपने दोहों के माध्यम से लोगों को सच्चाई के मार्ग पर चलने की सीख दी है, इसके साथ ही लोगों को मिलजुल कर रहने की भी सीख दी है।

वृन्द जी जानकारी – Vrindavan Das Information

आपको बता दें कि वृंद का जी का जन्म 1643 ईसवी में राजस्थान के जोधपुर जिले के मेड़ता नामक गांव में हुआ था। इनका पूरा नाम वृन्दावनदास था। वृन्द जी की माता का नाम कौशल्या था और पत्नी का नाम नवंरगदे था।

महज 10 साल की उम्र में वृन्द जी काशी आए थे और यहीं पर इन्होंने तारा जी नाम के एक पंडित से साहित्य, दर्शन की शिक्षा प्राप्त की थी। इसके साथ ही वृन्द जी को व्याकरण, साहित्य, वेदांत, गणित आदि का ज्ञान प्राप्त किया और काव्य रचना सीखी।

वृन्द जी ने अपनी रचनाएं सरल, सुगम, मधुर और आसान भाषा में लिखी हैं। वृन्द जी कविता करने का शौक, अपने पिता से आया। इनके पिता भी कविता लिखा करते थे। हिन्दी साहित्य के महान कवि वृन्द जी मुगल सम्राट औरंगजेब के दरबारी कवि भी थे।

वृन्द जी पहले अन्य कविता सम्मेलन में जाया करते थे और अपनी कविताएं प्रस्तुत करते थे। ये अपनी कविताएं बड़े सुंदर ढंग से प्रस्तुत करते थे। इनकी कविताओं को सुन सभा में बैठा हर व्यक्ति मंत्रमुग्ध हो जाया करता था।

वहीं वृन्द जी को उनकी कविताओं के लिए कई बार कई पुरस्कारों से भी नवाजा गया। जिसके चलते इनका मनोबल बढ़ता चला गया और यह एक प्रमुख कवि के रूप में पहचाने जाने लगे।

आपको बता दें कि वृन्द जी के नीति विषयक दोहे बहुत सुंदर हैं और काफी मशहूर भी हैं। वृन्द जी की रचनाएं भी काफी प्रसिद्ध हैं। इनकी प्रमुख रचनाओं में ‘वृंद-सतसई, ‘पवन-पचीसी, ‘श्रंगार-शिक्षा, अलंकार सतसई, भाव पंचाशिका, रुपक वचनिका, सत्य स्वरूप  और ‘हितोपदेश मुख्य हैं।

‘वृंद-सतसई कवि वृन्द जी की सबसे प्रसद्धि रचनाओं में से एक है जो नीति साहित्य का श्रंगार है। जिसमें 700 दोहे हैं, इसकी भाषा अत्यंत सरल और सुगम है जो कि आसानी से समझी जा सकती है। इन्होंने अपनी रचनाओं में कहावतों और मुहावरों का भी सुंदर ढंग से इस्तेमाल किया है।

आपको बता दें कि कवि वृन्द जी मुख्य रूप से उनकी नीति-काव्य के लिए काफी मशहूर हैं। वहीं वृन्द जी का दोहा छंद रचना में सूक्तियों को जोड़ना इनकी प्रमुखता है। कवि के नीति संबंधी दोहों ने काफी लोकप्रियता हासिल की है।

चलिए आज हम आपको कवि वृन्द जी की कुछ दोहे के बारे में जानकारी देंगे। कवि वृन्द जी ने अपने दोहों में नीति, अनुभव, संदेश और मानवीय मूल्यों का बेहद अच्छा चित्रण किया है। कवि वृन्द जी के दोहे इस तरह हैं।

वृन्द जी के दोहे अर्थ सहित – Vrind ke Dohe with Meaning in Hindi

वृन्द जी का दोहा नंबर 1 –

इस दोहे में हिन्दी साहित्य के महान कवि वृन्द जी ने उन लोगों को बड़ी सीख दी है जो कि किसी चीज को हासिल करने के लिए कोशिश ही नहीं करते हैं या फिर एक बार असफल होने पर वह काम करना छोड़ देते हैं। ऐसे लोगों के लिए कवि वृन्द जी इस दोहे के माध्यम से अभ्यास या साधना के महत्व के बारे में समझाने की कोशिश की है जो कि नीचे लिखी गई है –

दोहा –

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।

रसरी आवत जात ते सिल पर परत निशान।।

दोहे का अर्थ –

इस दोहे में कवि वृन्द जी अभ्यास करने के महत्व को समझाते हुए बताया है कि किसी भी चीज को हासिल करने के लिए अभ्यास करना या साधना करना बेहद जरूरी है क्योंकि अभ्यास या साधना करने से ही असाध्य कार्य अथवा कठिन से कठिन काम भी सिद्ध हो जाते हैं।

इस दोहे में कवि वृन्द जी ने यह भी बताया है कि निरंतर अभ्यास करने अथवा कोशिश करने से मंदबुद्धि लोग, अर्थात एक अज्ञानी पुरुष भी ज्ञानी बन जाता है। इसलिए जीवन में सफल होने के लिए साधना बेहद जरूरी है अर्थात साधना ही सफलता की कुंजी है क्योंकि बिना साधना यानि कि बना प्रयास किए कोई भी काम सिद्द नहीं होता है।

आपको बता दें कि इस दुनिया में असंभव से असंभव काम भी साधना से ही संभव हुए हैं। इस दोहे में कवि ने उदाहरण के तौर पर कुंए से पानी निकालते वक्त रस्सी का इस्तेमाल करते हुए समझाया है कि जिस तरह कुंए से पानी निकालते वक्त रस्सी का इस्तेमाल करते वक्त बार-बार घिसने से पत्थरों पर भी निशान पड़ जाते हैं, ठीक उसी तरह बार-बार प्रयास करने से मनुष्य का दिमाग चुस्त होता है। और साधना के द्धारा मंदबुद्धि, मूर्ख भी सुजान यानी समझदार बन जाता है।

क्या सीख मिलती है –

कवि वृन्द जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपनी जिंदगी में अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए तब तक की प्रयास करते रहना चाहिए जब तक कि कुछ हासिल नहीं हो जाता, क्योंकि बार-बार प्रयास करते रहने से न सिर्फ इंसान को सफलता मिलती है बल्कि उसका आत्मविश्वास भी बढ़ता है और व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

विशेषता-

महान कवि वृन्द जी ने अपने इस दोहे में अभ्यास करने की महत्वता को एक पत्थर की लकीर से बेहद सुंदर ढंग से समझाया है जिससे कवि की महान और दूरदर्शी सोच का अंदाजा लगाया जा सकता है। अर्थात कवि की इस तरह की व्याख्या वाकई तारीफ-ए-काबिल है।

वृन्द जी का दोहा नंबर 2 –

जो लोग अपनी हालत देखकर काम नहीं करते हैं, अर्थात अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च करते है और फिर बाद में इसको लेकर परेशान रहते हैं। ऐसे लोगों के लिए वृन्द जी ने अपने इस दोहे के माध्यम से बड़ी सीख दी है –

दोहा –

अपनी पहुँच बिचारि कै, करतब करिये दौर।

तेते पाँव पसारिये, जेती लाँबी सौर।।

दोहे का अर्थ –

इस दोहे में कवि वृन्द जी कहते हैं कि हर व्यक्ति को अपनी हालत देखकर ही खर्च करना चाहिए अर्थात हर किसी को अपनी स्थिति से परिचित होना चाहिए और अपनी आमदनी के मुताबिक ही खर्च करना चाहिए।

अर्थात अगर घर में किसी तरह का कोई समारोह हो, घर खर्च हो, लेन-देन हो या फिर घूमने-फिरने समेत तमाम निजी खर्च हो उन पर हर व्यक्ति को अपनी क्षमता देखकर ही कोई भी काम करना चाहिए क्योंकि जो लोग अपनी क्षमता से ज्यादा खर्च करते हैं तो बाद में उनका काफी मजाक बनता है क्योंकि कई लोग दिखावे के चक्कर में तो उस मौके पर किसी से उधार लेकर ज्यादा खर्च कर देते हैं।

लेकिन बाद में उन्हें इसके लिए काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है अर्थात ऐसे लोग अपनी ताकत से ज्यादा काम करने में सफल नहीं होते हैं।

इस दोहे में कवि ने उदाहरण देकर समझाया है कि हमें अपना पांव उतना ही पसारना चाहिए, जितनी लंबी चादर हैं और ऐसा नहीं करने पर पांव बाहर आ जाएंगे यानि कि काम सफल नहीं होगा।

क्या सीख मिलती है –

कवि वृन्द जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हर आदमी को अपनी क्षमता के अनुसार ही खर्च करना चाहिए। ऐसा नहीं करने पर इंसान को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

विशेषता-

इस सुंदर कहावत के जरिए कवि वृन्द जी ने अपने दोहे में सहज भाव भर दिया जो कि प्रशंसनीय है।

वृन्द जी का दोहा नंबर 3 –

हिन्दी साहित्य के रीतकालीन कवि वृन्द जी ने अपने इस दोहे के माध्यम से विद्या रुपी धन के महत्व के बारे में बताया है। जो लोग विद्या को महत्व नहीं देते अर्थात पढ़ाई-लिखाई में अपना मन नहीं लगाते हैं और इधर-उधर भटकते रहते हैं और मेहनत नहीं करना चाहते उन लोगों के लिए वृन्द जी नीचे लिखे गए दोहे के माध्यम से विद्या धन प्राप्ति के बारे में अद्भुत चित्रण किया है।

दोहा –

विद्या धन उद्यम बिना, कहौ जु पावै कौन।

बिना झुलाए ना मिलै, ज्यौं पंखा का पौन।।

दोहे का अर्थ –

इस दोहे में कवि वृन्द जी विद्या रुप धन की महानता का वर्णन करते हुए कहते हैं कि विद्या रूपी धन आसानी से नहीं मिलता अर्थात इसको प्राप्त करने के लिए कठोर परिश्रम करना होता है। बिना मेहनत किए कोई भी इस विद्या रूपी अनमोल धन की प्राप्ति नहीं कर सकता और न ही यह विरासत से मिलने वाली संपत्ति है।

अर्थात जो भी इस विद्या रूपी धन की चाहत रखता है उसे कठोर परिश्रम करना पड़ता है तभी यह विद्या रूपी धन-दौलत प्राप्त हो सकता है।

कवि ने इस दोहे में हाथ का पंखा हिलाने के उदाहरण से समझाया है कि जिस तरह पंखे को हिलाए बिना हवा नहीं मिलती है, हवा खाने के लिए पंखा हिलाना पड़ता है अर्थात मेहनत करनी पड़ती है ठीक उसी तरह बिना मेहनत किए विद्या रूपी अनमोल धन की प्राप्ति नहीं होती है।

क्या सीख मिलती है –

कवि वृन्द जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें सदैव मेहनत करनी चाहिए। क्योंकि मेहनत से ही अच्छी पढ़ाई-लिखाई संभव है और तभी हम अपनी जिंदगी में सफलता हासिल कर सकेंगे।

विशेषता-

इस दोहे में कवि वृन्द जी ने बेहद सुंदर ढंग से ‘परिश्रम’ की तुलना हाथ का पंखा चलाने से की है। कवि ने महद एक पंखे के उदाहरण से मेहनत के महत्व को इतने सरल तरीके से बताया है जो कि वाकई सराहनीय है।

वृन्द जी का दोहा नंबर 4 –

इस दोहे के माध्यम से कवि वृन्द जी ने उन लोगों को बड़ी शिक्षा देने की कोशिश की है जो लोग बिना सोच-समझकर बोलते हैं, जिसकी वजह से उन्हें कई बार परेशानी का भी सामना करना पड़ता है। इसलिए कवि ने इस दोहे में बात बोलने की रीति अर्थात पद्धति के बारे में बताया है –

दोहा –

बात कहन की रीति में, है अंतर अधिकाय।

एक वचन तैं रिस बढ़ै, एक वचन तैं जाय।।

दोहे का अर्थ –

इस दोहे में महाकवि वृन्द जी कहते हैं कि हर व्यक्ति की बात कहने का तरीका अलग-अलग होता है। एक तरीका वो होता है जिससे कोई व्यक्ति मोहित हो जाता है वहीं दूसरा तरीका वो है जिससे किसी को गुस्सा आ जाता है। वहीं अगर कोई व्यक्ति बिना सोच-समझकर किसी बात को करता है या फिर किसी अन्य व्यक्ति का अपनी बात से दिल दुखाता है तो इससे दूसरों का गुस्सा बढ़ जाता है।

वहीं एक ही बात को गुस्सा के साथ बोलने से दुश्मनी भी बढ़ती है और प्यार से बोलने से मित्रता बढ़ती है। इसलिए इस दोहे के माध्यम से यह समझाने की कोशिश की है कि हर व्यक्ति का बोलने का तरीका मीठा होना चाहिए क्योंकि मीठी और मधुर बोली बोलकर किसी का गुस्सा भी कम किया जा सकता है।

वहीं हमारी बातें सबको अच्छी लगने वाली और शांत करने वाली होनी चाहिए। मीठी बोली होने से न सिर्फ व्यक्ति का मधुर स्वभाव पता चलता है बल्कि आसपास का वातावरण में भी मधुरता बनी रहती है।

क्या सीख मिलती है –

महान कवि वृन्द जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें सदैव मीठी बोली बोलनी चाहिए। क्योंकि मीठी बोली बोलने से रिश्तों में तो मधुरता बढ़ती ही है साथ में बिगड़ते कामों को भी बनाया जा सकता है। मीठी बोली मित्रता बढ़ाती है और क्रोध को कम करने में हमारी मद्द करती है।

विशेषता-

इस दोहे में महान कवि वृन्द जी ने बेहद अच्छे ढंग से वचन की रीति और मीठे वचनों के महत्वता को बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है।

वृन्द जी का दोहा नंबर 5 –

जो लोग सबके सामने झूठा दिखावा करते हैं या फिर राजाओं की तरह वेष बदलकर वीर बनने की कोशिश करते हैं और अपने घमंड में चूर रहते हैं ऐसे लोगों के लिए कवि वृन्द जी ने अपने इस दोहे के माध्यम से बड़ी सीख दी है और कवि ने नकली वेष धारण के व्यर्थता का बखूबी बखान किया है –

दोहा –

भेष बनावै सूर कौ, कायर सूर न होय।

खाल उढ़ावै सिंह की, स्यार सिंह  नहिं होय।।

दोहे का अर्थ –

इस दोहे में महान कवि वृन्द जी ने नकली वेष धारण कर झूठे दिखावे पर पर बखान करते हुए कहा है कि कोई भी व्यक्ति चाहे वेष धारण कर शूर वीर बनने की कितनी भी कोशिश क्यों नहीं कर ले, लेकिन वे कभी शूर-वीर नहीं बन सकते हैं क्योंकि वीरता जन्मजात होती है, व्यक्ति के अंदर से निखरी हुई भावना होती है।

वीरता के भाव व्यक्ति के दिल से होते हैं सिर्फ वेष बदल लेने से कोई भी व्यक्ति वीर नहीं होता है। इस दोहे में कवि कह रहे हैं कि कोई भी कायर आदमी जो वेष धारण कर वीर बनने का दिखावा करते हैं वो वीर नहीं बन जाते हैं क्योंकि युद्ध भूमि में यह पता चल जाता है कि कौन वीर है और कौन कायर है।

वहीं इस दोहे में कवि वृन्द जी ने एक सियार का उदाहरण लेते हुए समझाया कि चमड़ा ओढने से कोई भी सियार, शेर नहीं बन जाता है, अर्थात उसी तरह नकली व्यक्ति अपना वेष बदलकर असली नहीं हो सकता है। अर्थात किसी भी व्यक्ति का वेष बदलकर जीना बेकार है।

क्या सीख मिलती है –

वृन्द जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कभी दिखावे पर यकीन नहीं करना चाहिए और खुद की असलियत जानकर ही फैसला करना चाहिए क्योंकि दिखावे से कोई भी मनुष्य वीर नहीं हो जाता कभी न कभी उसकी असलियत सामने आ ही जाती  है।

विशेषता-

इस दोहे में कवि ने बेहद सुंदर ढंग से कायर और वीर पुरुष की पहचान बताई है। इसके साथ ही एक वीर की तुलना शेर से और एक कायर पुरुष की तुलना सियार से की है। वृन्द जी का यह दोहा वाकई सीख देने वाला है।

वृन्द जी का दोहा नंबर 6 –

इस दोहे में कवि ने उन लोगों को बड़ी सीख दी है जो सिर्फ पैसा के पीछे भागते रहते हैं और पैसों को ही सबकुछ मानकर रिश्तों को भी अहमियत नहीं देते ।

दोहा –

धन अरु गेंद जु खेल को दोऊ एक सुभाय।

कर में आवत छिन में, छिन में करते जाय।।

दोहे का अर्थ –
इस दोहे में महान कवि वृन्द जी ने धन की लिसता के बारे में सुंदर वर्णन करते हुए कहा है कि इंसान की जिंदगी में धन, किसी खेल में गेंद के बराबर हैं क्योंकि धन और गेंद का स्वभाव एक जैसा होता है।

कवि ने इस दोहे में गेंद का उदाहरण लेते हुए यह समझाने की कोशिश की है कि जिस तरह खेल में गेंद हमारे हाथ से दूससे के हाथ में चली जाती है। ठीक उसी तरह धन भी है जो इंसान के हाथ में आता तो है लेकिन फिर वह किसी अन्य के हाथ में चला जाता है अर्थात हमारे हाथ में टिकता नहीं है।

एक पल के लिए आता है और दूसरे ही पल में चला जाता है अर्थात धन-संपत्ति भी एक जगह नहीं रहती है।

वहीं अगर हम संपत्ति को रोकने की कोशिश नहीं करेंगे तो भी दूसरे के हाथ में चली जाती है। वहीं चोर, लुटेरे, या बंधु-जन कोई न कोई उस संपत्ति को एक दिन हड़प लेते हैं। इसलिए मनुष्य के जीवन में धन अशाश्वत है और एक पल भर में लिप्त होने वाला है।

क्या सीख मिलती है –

कवि वृन्द जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें पैसों के पीछे अत्याधिक नहीं भागना चाहिए क्योंकि पैसा इंसान के हाथ में नहीं टिकता। वहीं अगर जो इंसान अपनी जिंदगी में सिर्फ और सिर्फ पैसों को महत्व देगा वह न तो बहुत अमीर ही बन पाता है और न ही उसे उतनी इज्जत मिलती है।

विशेषता-

हिन्दी साहित्य के महान कवि वृन्द जी ने अपने इस दोहे में जिस तरह धन की तुलना, खेलने वाली गेंद से की है। वो सराहनीय है क्योंकि ऐसा तो गहरी समझ रखने वाला कोई कवि ही कर सकता है, कवि की इस तरह धन और गेंद की तुलना वाकई चमत्कारिक है।

वृन्द जी का दोहा नंबर 7 –

जो लोग गरीबों की सहायता नहीं करते हैं, दीनों पर दया नहीं करते और जिनके अंदर परोपकार की भावना नहीं होती ऐसे लोगों को कवि ने इस दोहे के माध्यम से बड़ी सीख दी है और इस दोहे में दान और दवाई की प्रधानता का बेहद सुंदर ढंग से वर्णन किया है ताकि ऐसे लोग इस दोहे से सीख लेकर अपना जीवन सार्थक बना सकें।

दोहा –

दान-दीन को दीजै, मिटै दरिद्र की पीर।

औषध ताको दीजै, जाके रोग शरीर।।

दोहे का अर्थ –

कवि वृन्द जी के इस दोहे के माध्यम से यह संदेश दे रहे हैं कि हमें दीन अर्थात गरीबों लोगों की मद्द करनी चाहिए, दीनों को दान करना चाहिए ताकि उसकी गरीबी मिट सके।

वहीं कवि इस दोहे के माध्यम से यह कह रहे हैं कि हमें सिर्फ ऐसे गरीबों को दान करना चाहिए जिससे उसकी दरिद्रता दूर हो सके। वहीं दवाई सिर्फ उसी व्यक्ति को देना चाहिए जिसे औषधि की जरूरत हो अर्थात वह बीमार हो।

जिस तरह डॉक्टर लोग सही दवाई देकर किसी बीमार व्यक्ति को उसका जीवन देते हैं। उसी तरह धनी लोगों को भी जरूरतमंद लोगों और गरीबों की सहायता कर उनकी गरीबी दूर करना चाहिए।

क्योंकि अमीर लोग ही अमीर लोगों की सहायता करें तो यह निरर्थक है इसका कोई फायदा नहीं है वहीं अगर जो गरीब या जरूरतमंद लोगों की मद्द करते हैं उनका जीवन सफल होता है अर्थात ऐसे लोग अपने जीवन में कामयाबी हासिल करते हैं।

क्या सीख मिलती है –

वृन्द जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें किसी भी काम को सोच-समझकर करना चाहिए अर्थात कोई भी काम ऐसा करना चाहिए जिससे किसी को फायदा पहुंचें वहीं हमें ऐसे गरीबों की मद्द करनी चाहिए।

जिनकी सहायता करने से उनकी दरिद्रता मिट सके और वह दिल से दुआ दें क्योंकि सिर्फ दान करने से जीवन सफल नहीं हो जाता इसके लिए यह भी जरूरी है कि आपको किया दान किसके कितने काम आ रहा है तभी  हम अपनी जिंदगी में सफल हो सकेंगे।

विशेषता-

महान कवि वृन्द जी ने इस दोहे में बड़ी ही सुंदर ढंग से यह बताया है कि जरूरत मंदों की सहायता करने और उनकी सेवा करने से ही जीवन की सार्थकता है अर्थात मनुष्य का जीवन व्यर्थ है।

वृन्द जी का दोहा नंबर 8 –

इस दोहे के माध्यम से कवि ने उन लोगों को सीख दी है। जो लोग सिर्फ सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा कर लेते हैं और सच और झूठ के अंतर में फर्क ही नहीं समझते। ऐसे लोगों को कवि ने नीचे लिखे गए दोहे के जरिए सच और झूठ के बीच में फर्क समझाया है जो कि इस प्रकार है –

दोहा –

अंतर अंगुरी चार को, सांच झूठ में होय।

सब माने देखी कही, सुनी न माने कोय।।

दोहे का अर्थ –

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इस दोहे में कवि वृन्द जी कहते हैं कि सत्य और असत्य घटना के बीच अंतर होता है। वहीं अगर कोई कुछ बात बोले तो वह सच हो या फिर झूठ पहले हमें उसे सुनना चाहिए और फिर पता लगने के बाद ही सत्य या झूठ पर यकीन करना चाहिए।

इस दोहे में कवि कहते हैं कि बुद्धिमान लोग जब तक खुद नहीं देखते, तब तक नहीं मानते हैं। वहीं कवि ने यह भी कहा है कि सत्य और झूठ के बीच चार अंगुली का फर्क होता है। इसलिए सिर्फ सुनी-सुनाई बातों पर ही भरोसा नहीं करना चाहिए।

इसमें कवि कहते हैं कि कानों से सुनी बातों की बजाय आंखों से देखी बात पर यकीन करना चाहिए। इसलिए हमें हमेशा सत्य बात को ही मानना चाहिए।

क्या सीख मिलती है –

कवि वृन्द जी के इस दोहे से हमें यह सीख मिलती है कि हमें लोगों की सुनी-सुनाई बातों पर यकीन नहीं करना चाहिए और पहले सच और झूठ के बीच का फर्क समझना चाहिए।

विशेषता-

कवि ने इस दोहे में बेहद सुंदर ढंग से सत्य और असत्य का फर्क समझाया है और इसमें कवि ने सत्य और असत्य का भेद अर्थात आंख और कान की दूरी (चार अंगुली) बताया है।

निष्कर्ष-

वृन्द जी ने अपने दोहें से लोगों को कई ऐसी बड़ी बातें बताई हैं जिन्हें अपनाकर लोग अपनी जीवन में बदलाव ला सकते हैं और सफलता हासिल कर सकते हैं।

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