जानिए चिपको आन्दोलन का इतिहास और पूरी जानकारी | Chipko Movement History

Chipko Movement History

पर्यावरण के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि हमारा जीवन पूरी तरह से पर्यावरण पर ही आश्रित है, वहीं अगर हमारी जलवायु में थोड़ासा भी बदलाव होता है तो इसका सीधा असर हमारे शरीर पर पड़ता है। इसलिए पर्यावरण को संरक्षित करना हम सभी का कर्तव्य है।

इसलिए हमें पेड़ों की अंधाधुंध कटाई को रोकने और जंगलों के दोहन के लिए उचित कदम उठाने चाहिए, लेकिन क्या आप जानते हैं कि, प्रकृति की रक्षा के लिए चिपको आंदोलन – Chipko Movement चलाया गया था।

जिसमें पेड़ों की हो रही कटाई का विरोध किया गया था, वहीं इस आंदोलन की खास बात यह थी कि महात्मा गांधी जी का अहिंसा का मार्ग अपनाते हुए इस आंदोलन को शांतिपूर्ण तरीके से किया गया था। वहीं कब हुई चिपको आंदोलन की शुरुआत, इस आंदोलन से क्या प्रभाव पड़ा और क्या रहीं इस आंदोलन की उपलब्धियां समेत तमाम जानकारी हम आपको अपने इस आर्टिकल में देंगे, लेकिन सबसे पहले हम आपको चिपको आंदोलन के स्लोगन – Chipko Movement Slogan के बारे में बताएंगे –

क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।

मिट्टी, पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार।

इसी स्लोगन को चिपको आंदोलन के दौरान आधार बनाया गया। इसके साथ ही पर्यावरण को मानव जीवन से जोड़ते हुए, चिपको आंदोलन की शुरुआत की गई।

Chipko Movement
Chipko Movement

जानिए चिपको आन्दोलन का इतिहास और पूरी जानकारी – Chipko Movement History

चिपको का मतलब है ‘चिपकना’ इसलिए चिपको आंदोलन – Chipko Movement का सांकेतिक अर्थ है कि पेड़ों से चिपक जाना या गले लगाना और पेड़ों को बचाने के लिए प्राण दे देना। इसके साथ ही चिपको आंदोलन से मतलब इस बात से भी है कि किसी भी हाल में प्राकृतिक संपदा पेड़ को नहीं काटने देना है। अर्थात जान की परवाह किए बिना पेड़ों की रक्षा करना है।

क्या है चिपको आंदोलन? – What is Chipko Movement

चिपको आंदोलन एक ‘ईको-फेमिनिस्ट’ आंदोलन था, जिसका पूरा ताना-बाना महिलाओं ने ही बुना था। पर्यावरण की रक्षा के लिए चलाए गए आंदोलन को चिपको आंदोलन कहा गया। पेड़ो की अंधाधुंध कटाई और लगातार नष्ट हो रही वन संपदा के विरोध में उत्तराखंड के चमोली जिले के किसानों ने यह आंदोलन चलाया था।

दरअसल जब ये आंदोलन चलाया गया था तब उत्तराखंड के वन विभाग के ठेकेदार वनों की कटाई का विरोध कर रहे थे और उन पर अपना परम्परागत अधिकार जता रहे थे।

इसके बाद इस आंदोलन की जड़े पूरे भारत में तेजी से फैल गईं। शांति की मार्ग पर चलकर  चिपको आंदोलन शुरु किया गया था। पेड़ों की रक्षा करने और वन संपदा को नष्ट होने से बचाने के लिए उत्तराखंड के लोग काफी बड़ी संख्या में सामने आए और पेड़ों की कटाई का जमकर विरोध किया।

आपको बता दें कि चिपको आंदोलन में लोग पेड़ों की काटने  से बचाने के लिए इससे चिपक जाते थे या फिर लिपट जाते थे और कहते थे कि पेड़ों को काटने से पहले उनके प्राण लिए जाएं फिर पेड़ों को काटा जाए। वहीं ये आंदोलन यह प्रकृति और मानव के बीच के  प्रेम का भी प्रतीक बना और इसे “चिपको ” की संज्ञा दी गई।

चिपको आंदोलन की शुरुआत किसने की? – Who Started Chipko Movement

इस तरह पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रमुख रूप से इस आंदोलन को चलाया गया था। इसके साथ ही आपको ये भी बता दें कि चिपको आंदोलन में गौरा देवी, सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट ने मुख्य भूमिका निभाई थी। इसी वजह से गौरा देवी को हम ‘चिपको विमन’ और सुंदरलाल बहुगुणा को वृक्षमित्र  के नाम से भी जाना जाता है।

चिपको आंदोलन की शुरुआत कब हुई ? – When Started Chipko Movement

पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के विऱोध में शुरू हुआ चिपको आंदोलन को अहिंसक, सामाजिक और पारिस्थितिक आंदोलन भी कहा जाता है। इस आंदोलन को ग्रामीण इलाकों में मुख्य रूप से महिलाओं ने चलाया था।

पेड़ों की रक्षा के लिए इस आंदोलन का पूरा ताना-बाना महिलाओं ने ही बुना था।  इस आंदोलन की शुरुआत उत्तराखंड के चमोली जिले में साल 1973 में हुई थी। इस दौरान जंगल में करीब ढाई हज़ार पेड़ों को काटने की नीलामी हुई थी।

तभी गौरा देवी नामक महिला ने अन्य महिलाओं के साथ इस नीलामी का विरोध किया था। इसके बावजूद सरकार और ठेकेदार के फैसले में कोई बदलाव नहीं गया। लेकिन जब ठेकेदार के आदमी पेड़ काटने पहुंचे, तो गौरा देवी और उनके 21 साथियों ने उन लोगों को समझाने की कोशिश की।

जब उन्होंने पेड़ काटने की जिद की तो महिलाओं ने पेड़ों से चिपक कर उन्हें ललकारा कि पहले हमें काटो फिर इन पेड़ों को भी काट लेना। इसके बाद पेड़ काटने आए ठेकेदारों को वापस जाना पड़ा था, स्थानीय वन विभाग के अधिकारियों के सामने इन महिलाओं ने अपनी बात रखी। फलस्वरूप इस गांव का जंगल नहीं काटा गया। इस तरह यहीं से “चिपको आंदोलन” की शुरुआत हुई।

कैसे उपजा चिपको आंदोलन ?

उत्तराखण्ड के तीन जिलों उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ की सीमा चीन से लगती है। वहीं चमोली और उसके आस पास के इलाके के लोगों की रोजी-रोटी के प्रमुख साधन मुख्य रुप से मवेशी पालन और लघु वन उपज – जड़ी-बूटी, गोंद, शहद, चारे के लिए घास फूस, कृषि सम्बन्धी छोटे-मोटे औजार बनाना आदी थे।

जबकि इससे पहले 1962 में इस क्षेत्र के लोग तिब्बत और चीन के लोगों के साथ ऊन और कुछ हथकरघा यानि की हाथ से शिल्पकारी का व्यापार कर पैसे कमाते थे। लेकिन बाद में भारत-चीन के युद्ध के बाद यहां के लोगों का तिब्बत और चीन के साथ व्यापार खत्म हो गया।

नतीजतन यहां के लोग पूरी तरह से वनों पर निर्भर हो गए यानि कि अब सिर्फ यहां के लोगों के पास आजीविका कमाने का एकमात्र साधन बचा।

वहीं इस दौरान सरकार को भारत-चीन सीमा की सुरक्षा को लेकर कई ऐसी सड़कों का निर्माण करवाना पड़ा था जिससे कि यहां के लोगों को किसी तरह का कोई खतरा नहीं रहे।

इससे एक तरफ जहां सुरक्षा के तो पुख्ता इंतजाम हो गए लेकिन दूसरी तरफ  हिमालय में खड़ी अथाह वन सम्पदा सरकार, ठेकेदारों, माफियाओं की नजर में आ गयी. जिसके बाद हिमालय में पेड़ों की ठेकेदारी प्रथा से अंधाधुंध कटाई के साथ-साथ असुरक्षित खनन, सड़क निर्माण, जल विद्युत परियोजनाएं और पर्यटन समेत अन्य विकास कार्यों से वनों का विनाश होना शरू हो गया, जिसका बुरा प्रभाव हिमाचल के पर्यावरण पर पड़ा और यहां के लोगों को जीवन में भी इसका खतरा मंडरा गया।

दरअसल पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और जंगलों के दोहन की वजह से साल 1970 में यहां विनाशकारी बाढ़ आई। जिससे यहां के लोगों का जीवन में संकट के बादल छा गए। वहीं ये महाविनाश प्राकृतिक नहीं था, बल्कि मानव निर्मित था, क्योंकि पर्यावरण को नष्ट करने की वजह से भूस्खलन और बाढ़ जैसी आपदा के लिए रास्ता खुला।

इस महाप्रलय के बाद यहां के लोगों की जिंदगी खतरे में आ गई। इन्ही सबको को देखते हुए यहां के लोगों ने वन संरक्षण का महत्व समझा और जाना कि पर्यावरण को बचाना उनके लिए कितना जरूरी है।

इसलिए जब बाद में 1970 के दशक में एक बार फिर से पेड़ों की कटाई हो रही थी तो बड़ी संख्या में लोग वन संपदा को बचाने के लिए आगे आए और पेड़ों को गले लगाकर, पेड़ों की कटाई का जमकर विरोध किया जो कि चिपको आंदोलन के नाम से जाना गया।

चिपको आंदोलन का विस्तार

पर्यावरणविद् और गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता चंडीप्रसाद भट्ट जिनका चिपको आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने साल 1964 में गांव के लोगों के लिए रोजगार उपलब्ध कराने के लिए कुछ स्थानीय संसाधनों का इस्तेमाल कर एक सहकारी संगठन दशाओली ग्राम स्वराज संघ की स्थापना की। जिससे यहां के लघु उद्योगों को बढ़ावा भी मिला।

वहीं जब सरकार ने सामान बनाने वाली कंपनी के लिए एक बड़ी जगह दे दी तब गांव वालों ने कृषि उपकरण बनाने के लिए पेड़ों को काटने से मना कर दिया और जब गांव वालों की इस अपील को स्वीकार नहीं किया गया, तब चंडीप्रसाद भट्ट, ग्रामीणों के समर्थन में उतर आए और जंगल में आ गए ताकि वे लोग पेड़ नहीं काट सकें।

बहुत दिनों तक वे लोग इसका विरोध करते रहे, जिसके बाद सरकार ने कंपनी को पेड़ काटने के परमिट को रद्द कर दिया और डी जी एस एम द्वारा जारी मूल आवंटन को मंजूरी दी।

इस तरह पूरे मंडल में पेड़ों को बचाने में सफल हुए डीजीएसएम कर्मचारियों और स्थानीय पर्यावरणवादी सुंदरलाल बहुगुणा ने अन्य गांवों के लोगों के साथ भी चिपको की रणनीति को शेयर करना शुरू कर दिया।

आपको बता दें कि पेड़ों की रक्षा के लिए एक बड़ा प्रदर्शन साल 1973 में  उत्तराखंड के चमोली गांव में किया गया। जहां 2000 से ज्यादा पेड़ों की कटाई की जानी थी।

लेकिन इस समय वन संपदा नष्ट होने से होने वाली हानि को समझते हुए गौरा देवी सामने आई और गांव की अन्य महिलाओं के साथ मिलकर वन विभाग के ठेकेदारों को पेड़ नहीं काटने दिया और वे पेड़ों से लिपट गईं और पेड़ काटने वाले ठेकेदरों को नसीहत दी कि पहले उन्हें काटे और फिर पेड़ों को इस तरह बाद में ठेकेदारों को बिना पेड़ काटे ही वापस लौटना पड़ा और 2000 से ज्यादा पेड़ों को संरक्षित कर लिया गया। और यहीं से चिपको आंदोलन की शुरुआत की गई।

जो कि वन अधिकारों के लिए एक किसान और महिला आंदोलन के रूप में उभरकर सामने आया। वहीं इसके बाद सरकार ने अलकनंदा घाटी में वनों की कटाई की जांच के लिए एक कमेटी की स्थापना की और इस तरह 10 साल तक पेड़ काटने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

हालांकि चिपको आंदोलन को महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन की तरह  शांतिपूर्वक किया गया। उदाहरण के तौर पर समाझाएं तो बहुगुणा जी ने वन नीति के विरोध में 1974 में दो हफ्ते के लिए व्रत रखा था। जबकि स्थानीय महिलाएं वृक्ष के आस-पास पवित्र धागे की तरह चिपक कर खड़ी हो गई।

आपको बता दें कि 1972 और 1979 के बीच 150 से ज्यादा गांवों को चिपको आंदोलन में एक साथ शामिल किया गया था। जिसके परिणामस्वरूप उत्तराखंड में 12 मुख्य विरोध प्रदर्शन और कई छोटे-मोटे टकराव भी  हुए थे।

साल 1980 में उत्तराखंड में चिपको आंदोलन को बड़ी सफलता हासिल की थी। इस आंदोलन के बाद पर्यावरण का मुद्दा केन्द्रीय राजनीति में भी शामिल हो गया।  क्योंकि इस आंदोलन के बाद भी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने प्रदेश के हिमालयी वनों में वृक्षों की कटाई पर पूरे 15 सालों के लिए रोक लगा दी।

इसके बाद यह इस आंदोलन का तेजी से विस्तार होता चला गया। आपको बता दें कि यह आंदोलन पूर्व में बिहार, पश्चिम में राजस्थान, उत्तर में हिमाचल प्रदेश, दक्षिण में कर्नाटक और मध्य भारत में विंध्य तक फैल गया था।

उत्तराखंड में प्रतिबंध के अलावा यह आंदोलन पश्चिमी घाटी और विंध्य पर्वतमाला में पेड़ों की कटाई को रोकने में भी सफल रहा था। इसके साथ ही चिपको आंदोलन पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरूक करने के मकसद से भी चलाया गया था। दूसरे शब्दों में कहें तो पर्यावरण के महत्व को समझाने में भी चिपको आंदोलन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

चिपको आंदोलन में महिलाओं का रोल – Role of Women in the Chipko Movement

पेड़ो को बचाने के लिए चलाया गया चिपको आंदोलन को महिला आंदोलन भी कहा जाता है। क्योंकि इस आंदोलन में ज्यादातर महिलाएं शामिल थी। वहीं गौरा देवी के नेतृत्व में इस आंदोलन को आगे बढ़ाया गया, इसलिए गौरा देवी को चिपको आंदोलन का जनक भी कहा जाता है।

वहीं आपको बता दें कि जब उत्तराखंड के चमोली गांव में राज्य के वन विभाग के ठेकेदार पेड़ काटने आए थे। उस दौरान घरों में पुरुष मौजूद नहीं थे। तब गौरा देवी के नेतृत्व में बड़ी संख्या में महिलाओं की भीड़ इकट्ठी हुई और उन्होंने कुल्हाड़ी लेकर आये ठेकेदारों को यह कह कर जंगल से भगा दिया कि यह जंगल हमारा मायका है। हम इसे कटने नहीं देंगे।

इससे साफ है कि महिलाओं का जंगलों से अटूट संबंध है। पेड़ से ही घर-गृहस्थी के लिए जरूरी सभी चीजों का निर्माण होता है। रोजगार दिलवाने में भी पेड़ अहम भूमिका निभाते है इसलिए महिलाओं ने इस बात को समझते हुए बड़े स्तर पर महिलाएं पेड़ों को बचाने के लिए आगे आईं।

आपको बता दें कि चिपको आंदोलन के दौरान उस समय महिलाओं नें अपना अहम रोल निभाया जब राज्य के वन विभाग के अधिकारी पेड़ काटने आए तब महिलाएं पेड़ से लिपट गईं और कहा कि वे पेड़ नहीं काटने देंगी।

पेड़ काटने से पहले उन्हें काटना होगा। जिसके बाद पेड़ काटने आए लोगों को मजबूरी में पीछे हटना पड़ा। इस तरह महिलाओं नें चिपको आंदोलन में जीत हासिल की। ऐसा नहीं है कि चिपको आंदोलन में मुख्य किरदार निभाने वाली महिलाओं को विरोध का सामना नहीं करना पड़ा।

आपको बता दें कि, जब महिलाओं ने 9 फरवरी, 1978 को नरेन्द्र नगर में होने वाली वनों की नीलामी का विरोध किया तो पुलिस ने महिलाओं को गिरफ्तार कर जेल में बंद कर दिया।

इसके बाद 25 दिसम्बर, 1978 को मालगाड़ी क्षेत्र में करीब 2500 पेड़ों की कटाई रोकने के लिए जन आंदोलन की शुरुआत की। जिसमें हजारों महिलाओं ने हिस्सा लेकर पेड़ कटवाने के सभी कोशिशों को नाकाम साबित कर दिया और महिलाओं ने शांतिपूर्वक इस आंदोलन को आगे बढ़ाया।

वहीं इस जंगल में 9 जनवरी, 1978 को सुदूरलाल बहुगुणा ने 13 दिनों का व्रत रका। जिसके बाद सरकार ने तीन जगहों पर वनों की कटाई रोकने के आदेश दे दिए।

यही नहीं चिपको आंदोलन के दौरान ज्यादातर महिलाओं ने पर्यावरण को संरक्षित करने और पेड़ों को बचाने में अपनी हिस्सेदारी की मांग की। इस दौरान महिलाओं ने यह तर्क दिया कि एक महिला ही  ईंधन, चारे, पानी आदि को इकट्ठा कर खाने का बंदोबस्त करती है और महिलाओं का जंगल से अटूट संबंधों के बारे में भी बताया और ये भी बताया कि किस तरह मानव जीवन- जंगलों पर निर्भर है, अर्थात बिना पर्यावऱण के मनुष्य की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती है।

इसलिए महिलाओं ने कहा कि वनों से संबंधित जो भी फैसले लिए जाएं उन सभी में महिलाओं की राय जरूर लेनी चाहिए।

इस तरह पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और लगातार नष्ट हो रही वन संपदा के खिलाफ महिलाओं ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके साथ ही उत्तराखंड में महिलाओं को इस आंदोलन  के माध्यम से अपनी क्षमता पहचानने का मौका भी मिला और इस आंदोलन में जीत हासिल करने के बाद उनके अंदर आत्मविश्वास की भावना जाग्रत हुई।

इस आंदोलन के बाद महिलाओं का पेड़-पौधे से संबंध उभकर सामने आया। चिपको आंदोलन के दौरान यह भी देखा गया कि जैसे ही पेड़ों को काटने की बात चल रही थी वैसे ही महिलाओं की तकलीफें भी लगातर बढ़ रही थीं। इसलिए चिपको आंदोलन को पर्यावरणीय आंदोलन नहीं बल्कि महिलाओं के आंदोलन की भी संज्ञा दी गई।

क्या थीं चिपको आंदोलन की मुख्य मांगे? – Main Demand of Chipko Movement

पेड़ों को बचाने के लिए चलाए गए चिपको आंदोलन के तहत लोगों ने कई तरह की मांगें की थी, जिनमें से शुरुआत मे जो मांगे थी वो आर्थिक थी। आंदोलन कर रहे लोग चाहते थे कि जंगलों और वनवासियों का शोषण करने वाली दोहन की ठेकेदारी प्रथा को खत्म किया जाए और जो लोग वनों में मजदूरी करते हैं, उनके लिए न्यूनतम मजदूरी तय की जाए।

इसके अलावा स्थानीय छोटे उद्योगों के लिए रियायती कीमत पर कच्चे माल की आपूर्ति की मांगे भी शामिल थी। चिपको आंदोलन का विरोध कई दिनों तक चला था, इसिलए धीरे-धीरे ये आंदोलन परम्परागत अल्पजीवी विनाशकारी अर्थव्यवस्था के खिलाफ स्थायी अर्थव्यवस्था-इकॉलाजी का एक सशक्त जनआंदोलन भी बन गया। इस दौरान जिन लोगों की चिपको आंदोलन में भागीदारी थी।

उन लोगों ने यह मांग की थी कि -हिमालय के वनों में पेड़ों की कटाई को रोका जाए और जब तक कि राष्ट्रीय वन नीति के घोषित उददेश्यों के मुताबिक हिमालय में कम से कम 60 फीसदी क्षेत्र पेड़ों से ढक नहीं जाता।

इसके साथ ही मृदा और जल संरक्षण करने वाले पेड़ों के रोपने की भी बात कही थी। ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग अपनी मूलभूत जरूरतों को पूरा कर सकें।

9 मई, 1974 को चिपको आंदोलन की मांगों पर विचार के लिए एक उच्चस्तरीय समिति के गठन की घोषणा की गई। जिसके बाद इसकी पूरी जांच पड़ताल की गई, जिसमे यह पाया गया कि गांव वालों ओर चिपको आंदोलन कारियों की मांगे सही हैं।

इसके साथ ही अक्टूबर, 1976 में यह सिफारिश भी गई कि 1,200 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में व्यावसायिक वन-कटाई पर 10 साल के लिए रोक लगा दी जाए। जिसके बाद इस क्षेत्र के अहम हिस्सों में वनरोपण का काम युद्धस्तर पर शुरू करने का समिति ने आदेश दिया।

जिसके बाद उत्तरप्रदेश सरकार ने इस मान लिया। हालांकि इस रोक के लागू होने की वजह से 13 हजार 371 हेक्टेयर की वन कटाई योजना वापस ले ली गई। इस तरह की चिपको आदोलन की यह बहुत बड़ी जीत थी।

चिपको आंदोलन की उपलब्धियां – Result of Chipko Movement

चिपको आंदोलन से एक तरफ जहां पर्यावरण को सुरक्षित रखने में मद्द मिली। वहीं दूसरी तरफ इस आंदोलन के माध्यम से लोग पर्यावरण के प्रति जागरूक भी हुए, क्योंकि ये आंदोलन कई मामलों में सफल रहा।

आपको बता दें कि इस आंदोलन के माध्यम से एक राष्ट्रीय वन नीति में दबाव बनाने की कोशिश की गई जो कि लोगों की जरूरतों एवं देश के विकास के प्रति ज्यादा संवेदनशील होगी। इसके साथ ही  चिपको आंदोलन से पूरे देश के लिए वन्य नीति निर्धारण की दिशा में भी मद्द मिली।

वहीं चिपको आंदोलन एक ऐसा आंदोलन था जिससे देश के विकास के आधुनिक मॉडल के समक्ष एक विकल्प पेश किया है। इसके अलावा चिपको आंदोलन से तमाम उपलब्धियां मिलीं जिनका उल्लेख नीचे किया गया है –

  • चिपको आंदोलन से यह सबसे बड़ा फायदा हुआ कि इसके बाद सरकार ने यह आदेश निकाला कि समुद्र तल से एक हजार मीटर से ज्यादा ऊँचाई वाले क्षेत्रों में 15 सालों तक पेड़ों की कोई कटाई नहीं की जाएगी। जिससे वनों के संरक्षण और विकास में सहायता मिली।
  • चिपको आन्दोलन को शांतिपूर्ण तरीके से किया गया, जिससे यह लोकहित की पूर्ति का एक उदाहरण बना। गांधी जी की तरह शांति की राह पर चलकर इस आंदोलन को किया गया।
  • इसके अलावा चिपको आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह भी रही कि इसने देश के अन्य हिस्सों में भी इस तरह के सामाजिक और आर्थिक विषयों पर आन्दोलन को प्रेरणा मिली।
  • इसके साथ ही इस आंदोलन की मुख्य उपलब्धि ये भी रही कि, इसने केंद्रीय राजनीति के प्रमुख मुद्दों में पर्यावरण को भी शामिल किया। वहीं जानकारों की माने तो भारत में 1980 का वन संरक्षण अधिनियम और यहां तक कि केंद्र सरकार में ‘पर्यावरण मंत्रालय’ का गठन भी इसी आंदोलन की वजह से हुआ था।

आन्दोलन की महत्वपूर्ण गतिविधियां

  • नाटकों, रैलियों, फिल्मों के माध्यम से जनता में पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा की गई।
  • खाली जमीन पर वृक्षारोपण करना।
  • स्थानीय निवासियों को जंगली इंधन के प्रभावी और समुचित इस्तेमाल के लिए प्रेरित करना।

चिपको आंदोलन से पर्यावरण को संरक्षित रखने में काफी सफलता मिली है। इस आंदोलन के बाद ही सरकार ने हरे पेड़ों के काटने पर रोक लगा दी है। वहीं चिपको आंदोलन एक ऐसा आंदोलन था जिसने धीमे-धीमें अपनी जड़े पूरे भारत में फैलाई थी।

इसके साथ ही आपको ये भी बता दें कि 26 मार्च, 2018 को चिपको आंदोलन की सालगिरह पर गूगल ने डूडल बनाकर इस आंदोलन के प्रति सम्मान व्यक्त किया था।

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2 COMMENTS

  1. बहुत ही अच्छी article है, और आपका लिख्ने का अन्दाज़ भी काफ़ी अलग है|
    आप एक अच्छे blogger हो|
    🙂

    • धन्यवाद जी, हमें यह जानकर अच्छा लगा कि आपको हमारा यह पोस्ट पसंद आया। हम आगे भी इस तरह के पोस्ट अपलोड करते रहेंगे। कृपया आप हमारी वेबसाइट से जुड़े रहिए और हमारे पोस्ट पढ़ते रहिए।

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