क्या आप जानते हैं आख़िर क्या हैं हरित क्रांति?

Green Revolution

भारत जो की एक कृषि प्रधान देश है। भारत कृषि के क्षेत्र में दुनिया भर में 15 वें स्थान पर आता है। इसका श्रेय किसी न किसी रूप में हरित क्रांति को भी जाता है। हरित क्रांति के फलस्वरूप देश के कृषि क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रगति है। हरित क्रांति  से कृषि उत्पादन में एक बहुत बड़ा बदलाव आया है।

Green Revolution

क्या आप जानते हैं आख़िर क्या हैं हरित क्रांति – Green Revolution

कृषि में परम्परागत तरीकों से हट कर उसकी जगह नवीनतम तरीके अपनाये गए जैसे आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल किया जाने लगा, कीटनाशक दवाइयों प्रयोग में आई, उन्नत बीजों का समावेश किया गया, विस्तृत सिंचाई परियोजनाओं आदि के प्रयोग को बढ़ावा मिला। हरित क्रांति  से एक नये युग का निर्माण हुआ है। हरित क्रांति  के आने से उत्पादकों में भी काफी वृद्धि हुई साथ ही अधिक मात्रा में बेहतरीन गुणवत्ता के साथ उत्पादन किया जाने लगा।

हरित क्रांति की शुरुआत – Green Revolution in India

1947 में देश आजाद होने के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भी कृषि क्षेत्र में बढ़ोतरी के लिए काफी प्रयास किया था। लेकिन उस समय भी किसानों को खेती पुराने तरीकों से करनी पड़ रही थी जिसके परिणाम नकारात्मक ही निकल रहे थे।

कृषि क्षेत्र उस दौर में इस कदर कमज़ोर था की कई फसलों को आयात भी करना पड़ता था। उस समय में गेंहु की फसल को बढ़ाना एक बहुत बड़ी चुनौती थी और इसकी बहुत जरूरत भी थी।

हरित क्रांति के दौरान 1965 में कृषि मंत्री सी सुब्रमण्यम थे। सुब्रमण्यम ने नई किस्म के अनाज के लिए 18 हज़ार बीज आयात किये और कृषि को चरम सिमा तक ले जाने के लिए कई सुधार किये सिंचाई के लिए नहरें बनवाई, किसानों को उनके द्वारा उत्पादन माल का उचित मूल्य देने का वादा किया और सबसे मुख्य अनाज को सुरक्षित रखने के लिए गोदाम बनवाये।

इन सब प्रयासों के बहुत बढ़िया परिणाम निकले फलस्वरूप भारत अब पहले की तुलना में अधिक मात्रा में फसल करने लगा था।

भारत में हरित क्रांति की शुरुआत वर्ष 1966 -67 में हुई थी। हरित क्रांति का प्रारम्भ नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर नारमन बोरलॉग द्वारा किया गया था। हरित क्रांति से तात्पर्य देश के कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति से है।

हरित क्रांति के सफल परिणाम – Results of Green Revolution

उन्नतशील बीज: हरित क्रांति  के तत्पश्चात अब फसलों के लिए उन्नत बीजों का प्रयोग किया जाने लगा और नई व बेहतरीन बीजों की किस्मों की खोज की जाने लगी। इन बीजों से अनाज में सबसे ज्यादा सफलता प्राप्त हुई।

सिंचाई में सुविधा: हरित क्रांति से पूर्व किसानों को फसलों में पानी देने के लिए काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। परन्तु बाद में देश में सिंचाई सुविधाओं का तेजी के साथ विस्तार किया गया।

कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग: हरित क्रांति के कारण अब किसानों द्वारा कीटनाशक दवाइयों का इस्तेमाल किया जाता था। जिससे किसानों को अब कीड़ों की वजह से फसल खराब होने का डर नही सताता था।

आधुनिक मशीनों का चलन: हरित क्रांति के तहत अब कृषि के लिए आधुनिक मशीनों का प्रयोग किया जाने लगा था। जैसे ट्रैक्टर, थ्रेसर, हार्वेस्टर, बिजली के पम्पसेटों आदि ने सबसे ज्यादा योगदान दिया। इनका प्रयोग करने से कृषि में काफी वृद्धि हुई है।

व्यवसायिक दृष्टि: भारत जहां हरित क्रांति  से पहले कुछ फसलों का आयात करना पड़ता था पर इस क्रांति  के बाद अब वो ही भारत फसलों का निर्यात करने वाला देश बन चूका था। किसानों में व्यवसायिक साहस को बढ़ाने के लिए देश में कृषि सेवा केंद्र स्थापित किये गए।

ग्रामीणों में निर्धनता की कमी: किसानों के लिए हरित क्रांति किसी वरदान से कम नही थी। मानो इसके आने से सारे पाप धूल गये हों। पहले जहां घरों में खाने के लिए दाने भी नसीब नही होते थे वहाँ हरित क्रांति  के आने से भरपेट भोजन बनने लगा था। अब ग्रामीण आर्थिक स्तर पर मजबूत होने लगे थे।

हरित क्रांति  के नकारात्मक परिणाम – Negative results of Green Revolution

विषमता उत्पन्न: हरित क्रांति  के कारण अंतर प्रादेशिक व अतः प्रादेशिक विषमता उत्पन्न हुई है। हरित क्रांति  का लाभ केवल हरियाणा, पंजाब जैसे राज्य ही ले पाये और अन्य राज्य जैसे ओडिशा, बिहार इसके लाभ से अछूत रहे।

मुख्य फसलें हुई लाभकारी: हरित क्रांति  का प्रभाव सभी फसलों पर नही हुआ केवल कुछ ही फसलें इस से लाभान्वित हो पाई जैसे अनाज और चावल।

आर्थिक नजरिया: हरित क्रांति  का मुख्य लाभ केवल आर्थिक स्तर से मजबूर किसान ही ले पाये हैं। गरीब किसानों को इससे कुछ ख़ास लाभ नहीं हुआ था।

हरित क्रांति के चरण – Impact of Green Revolution

हरित क्रांति को दो चरणों में विभाजित किया गया है। पहला चरण 1966- 67 से 1980 – 81 तक व दूसरा चरण 1980 – 81 से 1996 – 97 है। इन दोनों चरणों का मुख्य उद्देश्य कृषि का बढ़ चढ़कर विकास करना ही था। दूसरी हरित क्रांति के ठोस नतीजे सामने आये हैं और पूर्वी भारत में 2011 -12 के खरीफ सत्र में 70 लाख टन अतिरिक्त धान का उत्पादन हुआ है।

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